क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
१० क्षेमकुतूहलम्
हिंगु, तैल, लवण, जल तथा अन्य वस्तुये अनुक्त (अवर्णित)- परम्परागत तथा
आप्त निर्देशानुसार विभिन्न पदार्थों को समस्त प्रकार के व्यंजनों (आहारयोग्य निर्माण
एवं खाद्य) मे डालना चाहिए (आवश्यकतानुसार)।।३८ १/२।।
दलितं खण्डितं कृत्तं पौलितं तु विवेचितम् ॥ ३९ ॥
वान्रारितं शोधितं च खण्डः पयार्यवचकाः।
भर्जितं तपितं भ्रष्टं तान्दूरं ताविकं तथा ॥ ४० ॥
शालिक्यं तलितस्यैते शब्दाः पर्यायवाचकाः।
१. दलित ५. विवेचित
२. खण्डित ६. वान्रारित (यह समस्त अष्ट (आठ) पर्यायवाची
३. कृत्त ७. शोधित (क्रियाबोधक) शब्द होते हैं)
४. पौलित ८. खण्ड
आहार पाक- पर्यायवाची (क्रियाबोधक) शब्द-
१. भर्जित ५. ताविक
२. तर्पित ६. शालिक्य
३. भ्रष्ट ७. तलित
४. तान्दूर
वर्णकरणम्
वर्णस्य करणे देयं कुङ्कुमं रक्तचन्दनम् ॥ ४१ ॥
ताम्बूलं यत्र यद्युक्तं तच्च तत्र प्रयोजयेत्।
कुंकुम (केशर), रक्तचन्दन एवं ताम्बूल, इन समस्त द्रव्यों को जो कहाँ उपयुक्त
(आवश्यक) हो, वहाँ (आहार द्रव्यों के निर्माणार्थ/पाकार्थ) के वर्ण-करण (रंगीन
बनाने) हेतु प्रयोग में लाना वांछनीय है।।४१ १/२।।
वेसवार निर्माण
हिङ्गवार्द्रमरिचं जीरं हरिद्रा धान्यकं तथा ॥ ४२ ॥
क्रमेण वर्धितं सर्वं वेसवारमिदं शुभम्।
स्तोकेन वारिणा सर्वं वण्टितं वस्त्रगालितम् ॥ ४३ ॥
मात्रया व्यञ्जने देयं कासमर्द च तत्स्मृतम्।
प्रथमोत्सवः ११
तत्सनेहे पचेत्पूर्व वेसवारकसंज्ञकम् ॥ ४४ ॥
पाकप्रापितसौरभ्यं करालं सूपकैर्मतम्।
क. हिंगु, आर्द्रक, जीरक, मरिच, हरिद्रा, धान्यक- इन द्रव्यों को क्रमशः वृद्धि
करके (मिलाकर) निर्मित द्रव्य को 'वेसवार' कहा जाता है- यह 'वेसवार' की
मूलतः परिभाषा (मसाला आदि अन्य प्रचलित नाम) है।
ख. इस वेसवार को किंचित् जल देकर, शिलापिष्ट (सील पर पीसकर) तथा
वस्त्रगालित (कपड़े से छानकर) करके के पाकार्थ, आहार व्यंजनो में प्रयोग
करना चाहिए एवं उपयुक्त है।
ग. वेसवार कासमर्द भी कहा जाता है। इस वेसवार को सर्वप्रथम उष्ण घृत तथा
तैल में पाक करते हैं, तदुपरान्त सुगंध आने पर (उग्र गंध) उनम निर्मित
'वेसवार' मानना चाहिए। ऐसा मत पाक निर्माताओं (सौरम्य, कराल तथा रूपक
आदि) का है।।४२-४४ १/२।।
दाडिमी रस निर्माण
दाडिमे घृतसंतप्ते तक्रं तत्र विनिःक्षिपेत् ॥ ४५ ॥
ततः पक्वं पटे पूतमिति स्याद्दाडिमीरसः।
दाडिमे के बीज (अनारदाना) निष्कासित कर घृत में पाक करते हैं, फिर उसमें
तक्र (मट्ठा) डालकर भलीप्रकार पाक करते हैं- इसको वस्त्रगलित (कपड़े से छान लेते
हैं) करके निर्माण करते हैं- इसे 'दाडिमी रस की संज्ञा दी जाती है।।४५ १/२।।
उद्धूलन निर्माण
एलालवङ्गकर्पूरकस्तूरीमरिचत्वचम् ॥ ४६ ॥
चूर्णमुद्धूलनं देयं भोज्ये क्षीरेक्षुसम्भवे।
व्यञ्जनेषु च सर्वेषु शाकजेष्वन्नजेषु च ॥ ४७ ॥
मांसमत्स्यभवेष्वेवं प्रलेहतलनादिषु।
आदावेव पचेत्स्नेहं ततो हिङ्ककं क्षिपेत् ॥ ४८ ॥
वेसवारं सलवणं क्षिप्त्वा तत्पिशितं पचेत्।
अर्धस्विन्ने क्षिपेत्क्रमथवा दाडिमीरसम् ॥ ४९ ॥
सिद्धपाके च दातव्यं चूर्णमुद्धूलनस्य च।
१२ क्षेमकुतूहलम्
क. एला, लवंग, कर्पूर, कस्तरी, मरिच तथा त्वक्- इन समस्त द्रव्यों के चूर्ण
(जिसे 'उद्धूलन' कहा गया है) को दुग्ध तथा इक्षुनिर्मित भोज्य पदार्थों में
डालना चाहिए।
ख. शाक, मांस तथा मत्स्य निर्मित समस्त आहार द्रव्यों (व्यंजनों) में इसे छोड़ते है।
इसी प्रकार प्रलेह, तलन आदि पाक निर्माण करते समय, सर्वप्रथम स्नेह पाक
करते है तथा बाद में हिंगु आदि के उदक को डालते हैं फिर वेसवार तथा लवण
(स्वादानुसार) डालकर, मांस पाक प्रारम्भ करें 'अर्धायभाव ही जाने पर तक्र या
दाडिमी रस डालते है, सम्पूर्ण पाक सिद्ध हो जाने पर, उद्धूलन चूर्ण से मिला
देते है।।४६-५०१/२।।
मान परिभाषा
द्रोणी द्रोणाढकं प्रस्थः कुडवश्च पलं पिचुः ।।५०।।
शाणको माषकश्चैव यथापूर्वं चतुर्गुणम्।
१. द्रोणी ६. पल
२. द्रोण ७. पिचु इन नव (नौ) मान की इकाइयों में
३. आढक ८. क्षाणक क्रमशः पूर्व में चतुर्गुण (चौगुने) होते है।
४. प्रस्थ ९. माषक (यथापूर्वं चतुर्गुणम्)।
५. कुडव
टिप्पणी- मान (वजन या तौल) के मागधमान, कालिंग मान आधुनिक
मान तथा प्रचलित मान होते हैं, इनकी तुलनात्मक अवलोकन किया जा सकता
है।।५०१/२।।
अग्नि का मान
प्रपाच्यं सकलं द्रव्य वह्निना स्वल्पहेतिना ।।५१।।
विना भक्तं विना क्वाथं न क्षीरं बहुवह्निना।
विभिन्न प्रकार के भस्म पदार्थों/द्रव्यों/व्यंजनों आदि में विभिन्न प्रकार
(मान/माप या समय) की अग्नि देने का विधान है- (प्रपाच्यं सकलं द्रव्य
वह्निना)
भक्त (भात) तथा क्वाथ (काढ़ा) उनको छोड़कर सभी पदार्थों को मन्द अग्नि
प्रथमोत्सवः १३
(हल्की आग या आँच) में आवश्यकतानुसार पाक किया जाने निर्देश है। दुग्ध (क्षीर)
को मन्द आदि में गर्म करना (उबालना) चाहिए।।५११/२।।
माप-परिभाषा
जल (उदक)
भक्तपाके जलं देयं तण्डुलेभ्यश्चतुर्गुणम् ।।५२।।
सूपस्य त्रिगुणं तोयं प्रदातव्यं हि मुद्गतः।
माषसूपे जलं किञ्चित्तदधिकं मुद्गसूपतः ।।५३।।
कृशरायां जलं किञ्चिद्धीनं तु मुद्गसूपतः।
व्यञ्जनानां प्रभूतानां तोयसंस्था त्वनेकधा ।।५४।।
स्वभावकठिनं किञ्चित्किञ्चिन्मृदुतरं स्मृतम्।
कठिनं बहुतोयेन मृदु स्वल्पेन पच्यते ।। ५५ ।।
क. आहार द्रव्यानुसार-
भात (चावल) का भात पकाने हेतु - चावल (ताण्डुक) से चतुर्गुण
(चौगुना) जल
माष (उड़द) पकाने हेतु - तीन गुना मूंग से (दाल से) त्रिगुण
(तिगुना) जल
कृशदा (खिचड़ी) पकाते हुए - मूँग की दाल से कुछ अधिक कम
जल (किञ्चिद्धीनम्)
ख. सामान्य जल माप- विभिन्न प्रकार के आहार-द्रव्यों (व्यंजनों) के लिए जल
की मात्रा अनेक प्रकार की रखी जाती है। कुछ द्रव्य स्वभाव से कठिन अथवा
मृदु होते है- अतः जल की मात्रा उसी प्रकार से (सम्यक्) पाक हो जाये) रखी
जाती है।
मांसपकार्थ स्नेह परिमाण निर्देश-
दिक्सङ्ख्यपलमांसस्य स्नेहमात्र पलं स्मृता।
लवणाद्यपलं देयं वेसवारं पिचु स्मृतम् ।।५६ ।।
टङ्कमुद्धूलनं च स्यादेतन्मानं तु रथ्ने।
सपादं मत्स्यमांसस्य द्रव्यं देयं तु मांसतः ।।५७।।
क्षे. कु. २
[पृष्ठ १४]
१४ क्षेमकुतूहलम्
षड्विधानां तु शाकानां द्रव्यं देयं तु मांसवत्।
अन्नजेष्वथ भक्ष्येषु किञ्चिद्धीनं तु मांसतः॥५८॥
क. दशपल मांस को पकाने हेतु, एक पल (लेह द्रव), लवण (अर्ध पल), एक
पिच्छु (एक कर्ष) वेसवार, उद्घूलन (एक टंक) की मात्रा लेनी चाहिए।
ख. मत्स्य मांस को पकाने के लिए, उपकरण द्रव्यों को मांस के व्याकरण के चौथाई
(सपाद) भाग देना चाहिए।
ग. मांस पदार्थों (अन्न निर्मित) में उपकरण द्रव्यों की मात्रा मांस से कुछ कम
(किञ्चिद्धीनं तु मांसतः) होनी चाहिये॥५६-५८॥
शिखरिणी निर्माण
शुभ्रशर्करया योज्यं निर्नीरं द्विगुण दधि।
उक्तमुद्धूलनं देयं रसालायां बुधैः स्मृतम्॥५९॥
क. शुभ्रशर्करा, दधि (द्विगुण) दो भाग जलरहित- इनका मिश्रण करके 'शिखरिणी'
का निर्माण कर लेते हैं।
ख. रसाला निर्माण हेतु शिखरिणी कथित उद्घूलन का चूर्ण मिश्रित करते हैं।
ग. यह पाकशास्त्र के विभिन्न ज्ञाताओं का मत है॥५९॥
पानक निर्माण
भूरूहाणां फलेऽम्लत्वे स्वल्पाधिक्यं हि दृश्यते।
तस्मात्तु शर्कराभागो नैकःपानेषु कथ्यते॥६०॥
सामान्यतो मयाऽप्युक्ता परिभाषाऽत्र भोजने।
न्यूनाधिका च कर्तव्या सर्वो भिन्नरुचिर्जनः॥६१॥
वृक्ष के फलों में अम्लता के परिमाण में अनार रहता है, अतः शर्करा की मात्रा
तदनुसार (बिना निर्देशनुसार) डाली जानी चाहिए।
इस प्रसंग में, परिभाषाओं (आहार सम्बन्धी) का उल्लेख किया गया है,
जिसमे न्यूनाधिक परिवर्द्धन, आहार योग्य पदार्थ सुरुचि के अनुसार, उपकरण
द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिए। यह सर्वपाक शास्त्रियों का सामान्य मत (निर्देश)
है॥६०-६१॥
[पृष्ठ १५]
प्रथमोत्सवः १५
प्रथमोत्सनेपसंहार
इष्टदेवनमस्कारः प्रथमे वंशकीर्तनम्।
द्रव्याणां परिभाषा च, पाकरक्षा त्वथोच्यते॥६२॥
क. क्षेमकुतूहल के प्रथम उत्सव (प्रकरण) में इष्टदेव, नमस्कार, ग्रन्थरचयिता का
वंश परिचय तथा पाक द्रव्यों की विभिन्न की परिभाषाओं का वर्णन किया
गया है।
ख. आगामी (अध्याय- द्वितीय उत्सव) में पाकरक्षाविधि का वर्णन किया
जायेगा॥६२॥
अथ द्वितीयोत्सवः
(प्रकरण द्वितीय)
पुरुषार्थ चतुष्टय-अग्निपाक
धर्मार्थकाममोक्षाणां शरीरं साधनं बुधैः।
अत एवैककल्पेन सर्वैरेवाभिधीयते ॥ १ ॥
तच्च भूतमयं तानि पच्यन्ते स्वाग्निनाऽनिशम्।
देहे गच्छति गच्छन्ति सदाहारं पाञ्चभौतिकम् ।
नानाविधरसं भोक्तुमात्मा समभिकाङ्क्षति ॥ ३ ॥
तेन पूरितकोष्ठस्तु सौहित्ये सुखमाप्नुयात् ।
क. पुरुषार्थ चतुष्टय- धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष- का साधन का नाम शरीर है,
ऐसा समस्त बुद्धिमान व्यक्ति एक स्वर से कहते हैं। (अतः एवैककल्पेन सर्वे
देवाभिधीयते)।
ख. यह भूतमय (पंचामहाभूतों से निर्मित-जित-जपन्न्र) है। इनभूतों का परिपाक
जठराग्नि द्वारा निरन्तर (अवधामति) से होता रहता है। विशेषतः समस्त
देहगतभूतों का भी परिपाक होता रहता है। आहार पाँचभौतिक होता है- क्योंकि
इन भूतों का आधार आहार द्रव्यों में रहता है।
ग. आहार कर्त्ता व्यक्ति (भोक्ता) की आत्मा अनेक प्रकार के रसों की आकांक्षा करती
हैं, इन रसों से कोष्ठ की पूर्ति हो जाने पर, उस (भोक्ता) को। तृप्ति का अनुभव
होता है, जिससे सुख की अनुभूति होती है॥१-३१/२॥
रसाधिष्ठान
स्वादुत्वं षडसादीनां तेषां प्रायोऽन्नमाश्रयः ॥ ४ ॥
तच्च शाल्यादिविविधं मांसक्षीरफलादिकम् ।
किंतु व्यक्तरसं प्रायो बहुधैवोपजायते ॥ ५ ॥
आत्मा की तृप्ति कारक रों का अधिष्ठान प्रायः अन्न ही होता है, जो
द्वितीयोत्सवः १७
विभिन्न प्रकार के अन्न (शाल्यादि) तथा मांस, दुग्ध तथा फल आदि होता है,
परन्तु व्यक्त रस का ही ज्ञान प्रायः भोक्ता को होता है (किन्तु व्यक्त रस प्रायो
बहुधैवोपजायेत)॥४-५॥
योगक्षेम- नृपाहार
अन्नपानं विषाद्रक्षेद्विशेषेण महीपतेः ।
योगक्षेमौ तदायत्तौ धर्मांश्च प्रभवन्ति हि ॥ ६ ॥
महीपत (राजा) के आहार योग्य पदार्थों की सावधानी से विष से तथा करना
आवश्यक है, क्योंकि राजा के अधीन योगक्षेम होता है। अप्राप्त वस्तुओं की प्राप्ति
योग है तथा प्राप्त वस्तुओं संरक्षण को क्षेम कहते हैं- इससे धर्म का पालन भी
होता है॥६॥
भोजनगृहम्-स्वरूपवर्णन
गौरीमतादिलिखिताखिलपाकसंपद्-
व्यापारितौदनिकसंभ्रमपदर्शनीयम् ।
स्वप्नेऽपि वैरिजनगोचरतामयातं
चन्द्रद्रवैः सुरभितं भुजिकर्मधाम ॥ ७ ॥
आग्नेय्यां दिशि कर्तव्यमावासस्य महानसम् ।
गवाक्षजालमार्गाढ्यमर्धभित्त्युपलेपितम् ॥ ८ ॥
चुल्ली तत्र प्रकर्तव्या पूर्वपश्चिममायता ।
क. गौरीमत तथा अन्य पाकशास्त्र सम्बन्धी साहित्य (प्राचीन) में, समस्त पाक
सामग्री (वस्तुएँ/पदार्थों) तथा तत्परता से पाक-कार्य में संलग्न पाचक (रसोई
बनाने वाले) तथा स्वप्न में भी शत्रु दृष्टि से प्रतिरक्षण, कर्पूर आदि (सुगन्धित
द्रव्य) से सुगन्धित (चन्द्र द्रवैः सुरभितं) छिड़कते से भोजनालय का निर्माण
करने का निर्देश किया गया है।
ख. आग्नेय कोण भोजनालय की स्थापय की जाये; भोजनालय मे जालीदार
(गवास) खिड़की तथा अर्धनिर्मित्ति लिपी हुई (उपलेषितम्) रखी जाये। इस
भोजनालय (महानस) में पूर्व से पश्चिम की ओर मुल्ली (लम्ब चूल्हा) का
निर्माण किया जाना चाहिए॥७-८१/२॥
क्षेमकूतूहलम् द्वितीयोत्सवः १९
१८
भोजन पाक पात्र विवरण
मृन्मयादीनि भाण्डानि क्षालितानि च वारिण ॥ ९॥
तेषु यत्पच्यते द्रव्यं गुणवत्सर्वसंमतम्।
मृदभावे पचेल्लौहे चक्षुर्र्शोविकारनुत् ॥ १० ॥
कांस्यजे पाचितं यद्धि तद्धितं मतिदं शुचि।
यच्च ताम्रमये सिद्धं न रुच्यं त्वम्लपित्तकृत् ॥ ११ ॥
सौवर्णे राजते पाच्यमाढ्यभूमिभृतां गृहे।
तत्पात्रं सर्वदोषघ्नं धिषणोत्सवदायकम् ॥ १२ ॥
१. मृत्तिकापात्र (क्षलितानि वारिणा- : भोजन रुचिकर तथा अनेक गुणवान्
जल से धोते हुआ)
२. मृत्तिका पात्र के अभाव में लौह : वेग रोग तथा अर्श अशुरु
(धातु) का पात्र
३. कांस्य पात्र में पक्व आहार : हितकारी, बुद्धिप्रदाता एवं पवित्र
(मतिदं शुचि)
४. ताम्रपात्र में पक्व आहार : अरुचिजनक, अम्लपित्त कारक (न रुच्यं
स्वम्लपित्तकृत्)
५. धतिक तथा राजा के गृह/प्रसार) : (चूर्ण-रजत पात्र में भोजन पाक हितकारी।
में भोजन पाक सर्वदोषहार एवं बुद्धि प्रदाता (धिषणोत्सव
दायकम)।।९-१२।।
संकीर्णे पात्रसंसारे मार्गे वा ग्रामवर्जिते।
स्थापयेद्गुणवान् सूदः सिद्धान्नं पात्रकान्तरे ॥ १३॥
भक्तः स्वपात्रके स्थाप्यो न स्थाप्यः पात्रकान्तरे।
घृतं काष्ठायसोः स्थाप्यं मांसं मांसभवं रसम् ॥ १४ ॥
स्थापयेद्राजते हैमे पात्रे लोहेऽथ काष्ठजे।
पत्रादिषड्विधं शाकंर स्थाप्यं काष्ठाश्मलोहजे ॥ १५ ॥
पक्वान्नं पिष्टजं भक्ष्यं स्थाप्य कांस्येऽथ दारुजे।
धारजेत्सुश्रुतं क्षीरं पार्थिवे वाऽथ काष्ठजे ॥ १६ ॥
पानीयं पायसं तक्रं मृन्मयेष्वेव धारयेत्।
काचजे स्फटिके वाऽथ वैदूर्यादिविचित्रिते ॥ १७ ॥
धारयेत्सर्वदा पात्रे रागखाडवसट्टकान्।
उक्तपात्रान्तरे स्थाप्यं यद्द्रव्यं तद्रुजापहम् ॥ १८ ॥
सर्वदा सुखदं हृद्यमन्यथा दोषमर्हति।
क. जब भोजन पक जाये, तब संकार्ण पात्र समूह वाले, ग्रामवर्जित म्यान मे
गुणवान् पाचक का पक्व (सिद्ध) अन्न की अन्य (दूसरे) पात्र में रख रखना
चाहिए।
संकीर्ण पात्र समूह, ग्रामवर्जित (मार्गाविरुद्ध) स्थान में गुणवान् पाचक पक्व
(सिद्ध) अन्न को अन्य (उपयुक्त) पात्र में स्थान्तरित करते (सर्वदते) है। भक्त
(चावल के भात को) पृथक् पात्र में रखने की आवश्यकता नही होती। घृत के
लिए काष्ठ या लौह पात्र अनुक्त है। मांस या मांस रस के लिए रजत, सीसक,
स्वर्ण, लौह तथा काष्ठ का पात्र उचित है। पत्र कन्द आदि यह प्रकार (षष्ठ
शाको) को काष्ठ, पाषाण तथा लौह पात्र में रखना उपयुक्त है।
ख. पिष्टण पक्वान्न (पिट्ठी से निर्मित सिद्ध अन्न आहार प्रेरण) पदार्थों को कांस्य एवं
काष्ठ, पात्र में रखना उपयुक्त है। उष्ण (तप्त) दुग्ध मृत्तिका या काष्ठ पात्र मे
रखते है। जल, क्षीरिका (खीर), तक्र आदि मृत्तिका पात्र मे (मृन्मय) रखा जाता
है। राग, खाडव एवं सट्टक आदि पदार्थों को कांच कांस्य (सीसक) स्फटिक,
वैदूर्य से निर्मित पात्रों में रखना उपयुक्त है।
ग. इस रीति से दूसरे-उपयुक्त पात्रों में स्थान्तरित (रखा गया) आहार योग्य पदार्थों
से रोगों का नाश होता है (सर्वदा रुजापहम् सुखदं हृद्यं दोषमर्हति) सुखकारक
एवं हृदय के लिए लाभकारी होता है, परन्तु विपरीत क्रम (शास्त्र मे वर्णित
विधि के विरुद्ध) पक्वान्त पदार्थ (देखकर)- भोजन करने से, शरीर मे दोषो
की उत्पत्ति करके विभिन्न प्रकार के रोग का कारण बनते है।।१३-१९'/२।।
महानस उपकरण स्थापन
वस्तूनि भोजनाहीणि विविच्यानि पुनः पुनः ॥ १९ ॥
सर्वाणि गुणयुक्तानि स्थापितानि महानसे।
दास्यासामार्जनी वाटी, पूतहण्डी सुकूर्चिका ॥ २० ॥
'? Look at 'प्रौ': 'प' + '्र' + 'ौ' = प्रौ!
Wait, let's look at the letter: could it be 'कपिर्ह्रीयते' printed as 'कपिर्प्रौयते' or is it actually printed as 'कपिर्ह्रीयते'?
Let's look at:
Line 50:
रौति क्रौञ्चो विसृजति कपिर्[ ? ]यते नीलकण्ठः
Wait, what does क्रौञ्च विसृजति?
Wait! Does it say:
"रौति क्रौञ्चो विसृजति" ???
Wait! Look at the meter:
This verse is in Sragdharā meter!
Let's check the meter:
Line 1:
एणो रौति ( -- -- ) स्खलति गमने ( u u u u u - ) राजहंसश्चकोर- ( - u - - u - - )
Total syllables of Sragdharā: 21 syllables!
Let's count:
ए-णो-रौ-ति-स्ख-ल-ति-ग-म-ने-रा-ज-हं-स-श्च-को-र- (17 syllables so far)
Line 2:
स्या-क्षि-द्व-न्द्वं-वि-र-ज-ति-त-रां-वा-न्ति-कृ-त्की-र-प-त्री (wait
२२ क्षेमकुतूहलम्
चाहिए। इस प्रयोजन की पूर्ण किरणे के लिए मृग, हंस, चकोर, शुक, क्रौंच,
प्लवंग, नीलकण्ठ, वध्रु प्रभृति जन्तुओं (पक्षी आदि सहित) को पाल कर
रखना चाहिए। यह धनिकों के लिए व्यवस्था है- धनियों को कोई भी वस्तु
संसार मे दुर्लभ नहीं है (किं श्रीमतां जगति दुर्लभमस्तिकञ्चित्)।
ख. यदि मृग को विषाक्त अन्न खाने को दिया जाये, तो वह शब्द करता है। या होता
है (रीति) राजहंस का विषाक्त खाने पर वह चलते (हुए) गिर जायेगा (स्खलति)।
चकोर दोनों नेत्रों को नचाता है (अक्षिद्वन्द्वं विरजतितराम्); शुक (कीरकौंची)
वमन करता है (वान्ति)। क्रौञ्च पक्षी रुदन करता है (रौति क्रौञ्च)। कपि अन्न का
पदित्याग कर देता है (विसृजति कपि), नीलकण्ठ मृत्यु को प्राप्त करता है
(ध्रीयते)। मुर्गा (दक्षवभ्रू) तथा नेवला प्रिय शब्दों (शब्द प्रीतिं सपदि सूजहाँ
दसवभ्रू विषेण)। करें बोलते लगता है।।२६-२७।।
सविषान्न-परीक्षा
ओदनो विषवान् सान्द्रो याति वैवर्ण्यमाशु हि।
चिरेण पच्यते पक्को भवेत्पर्युषितोपमः ॥ २८ ॥
विषाक्त अन्न की परीक्षा का विधान
विष मिश्रित सान्द्र (गाढ़ा) भक्त (भात) शीघ्र ही विवर्ण हो जाता है; यह पक्व
(सिद्ध) होने में सामान्य से अधिक समय होता है तथा पयुषित (वासीभात) के समान
हो जाता है।।२८।।
मयूरकण्ठतुल्योष्मा मोहमूर्च्छा विकारकृत्।
हीयते वर्णगन्धाद्यैः क्लद्यते चन्द्रिकाङ्कितः ॥ २९ ॥
मयूर कण्ठ के समान उष्ण होता है तथा मोहमूर्च्छा आदि विकारों को उत्पन्न करता
है; वह वर्ण तथा गन्ध रहित हो जाता है। चन्द्रिका के समान चिह्न युक्त हो जाता है।।२९।।
व्यञ्जानान्याशु शुष्यन्ति श्यामक्वाथानि तत्र च।
हीनातिरिक्तविकृता छाया दृश्यते नैव वा ॥ ३० ॥
विषम्मिश्रित व्यंजन तथा श्याम वर्ण के क्वाय, शुष्क हो जाते हैं; इसमें
न्यूनाधिक विकृति हो जाती है। यह छाया कम विकृति होने पर दृश्यमान होती है,
परन्तु अधिक विकृति होने पर छाया अदृश्य हो जाती है।।३०।।
द्वितीयात्सवः २३
फेनोर्ध्वराजिसीमन्ततन्तुबुद्बुदसंभवः ।
विच्छिन्ना विरसा रागाः खाडवाः शाकमामिषम् ॥ ३१ ॥
नीला राजि रसे ताम्रा क्षीरे दध्नि च दृश्यते।
श्यावा पीता सिता तक्रे घृते पानीयसन्निभा ॥ ३२ ॥
मस्तुन्यपि कपोताभा राजी कृष्णा च सूपके।
काली गव्ये तथा क्षौद्रे हरिन्नैलेऽरुणोपमा ॥ ३३ ॥
विषमिश्रित अन्न में फेन, उर्ध्वराजि, सीमन्त, तन्तु तथा बुद्बुद की उत्पत्ति हो
जाती है। राग, खाडव, शाक तथा मांस छिन्न-भिन्न तथा रस रहित (विरस) हो जाते हैं।
रस में नीलमणि (देखा या लकीर), दुग्ध-दधि में ताम्रवर्ण की राजि हो जाती
है। तक्र में श्याव, पीत वर्ण तथा श्वेत वर्ण की राजि (देखा); घृत में पानी के समान
राजि-मस्तु में कपोताभा राजि, सूप (दाल) में कृष्ण वर्ण की राजि, गव्य (दधि)
में कृष्ण रेखा तथा मधु में हरित वर्ण तथा तैल में अरुण वर्ण की राजि (रेखा) हो जाती
है।।३१-३३।।
पाकः फलानामामानां पक्वानां च विशीर्णता।
द्रव्याणामाद्र्रशुष्काणां वैपरीत्यं तु जायते ॥ ३४ ॥
मृदुनां कठिनानां च भवेत्स्पर्शविपर्ययः ।
माल्यस्य स्फुटिताग्रत्वं म्लानिर्गन्धान्तरोद्भवः ॥ ३५ ॥
श्याममण्डलता वस्त्रे सादनं तन्तुपक्ष्मणाम्।
धातुमौक्तिककाष्ठाश्मरत्नादिषु मलाकृतिः ॥ ३६ ॥
स्नेहे स्पर्शप्रभाहानिः सप्रभत्वं तु मृन्मये।
क. आम फल (कच्चे) फल पक्व हो जाते हैं, पक्व फल विदीर्ण हो जाता है
(गल)। शुष्क तथा आर्द्र द्रव्यो मे विपरीत स्थिति आ जाती है मृदु द्रव्य कठोर
तथा कठोर द्रव्य मृदु हो जाते हैं।
ख. पुष्पमाला के अग्रभाग स्फुटित हो जाते हैं, मलिनता तथा गंध उत्पन्न हो जाती
है। वस्त्र में श्याम वर्ण के मण्डल (धब्बे) तथा तन्तुओं के पक्ष्म (लोभ) शिथिल
हो जाते हैं।
ग. धातु, मुक्ता, काष्ठ, पाषाण एवं रत्न आदि तथा इनसे निर्मित पात्रो मे मलिनता
आ जाती है। स्नेह में स्पर्श तथा प्रभा की हानि हो जाती है, मृत्तिका पात्र मे
२४ क्षेमकुतूहलम्
चमक (प्रभा) आ जाती है। इन वस्तुओं का विष से सम्पर्क होने पर विभिन्न
अप्राकृतिक लक्षण प्रतीत होते हैं॥३४-३६१/२॥
विषदलक्षणानि
विषदः श्यावशुष्कास्यो विलक्षो वीक्षते दिशः ॥ ३७॥
स्वेदवेपथुमान् स्तब्धो भीतः स्खलति जृम्भते।
प्राप्यान्नं सविषं वह्निरेकावर्तः स्फुटत्यपि ॥ ३८ ॥
शिखिकण्ठाभधूमार्चिरनर्चिश्चोग्रगन्धता ।
म्रीयते मक्षिकाः प्राश्य काकः क्षामस्वारो भवेत् ॥ ३९ ॥
विषदाता के लक्षण
विषदाता का मुख श्याम वर्ण तथा शुष्कता लिये हो जाता है, व्यर्थ में इधर-
उधर देखता है (विलसो वीक्षते दिशा); शरीर में स्वेद, कम्पन, जड़ता (स्थिरता),
भयभीत स्खलन नृम्भन प्रति लक्षण होते हैं। विषयुक्त अग्नि अन्न सम्पर्क में आने से
एकावर्त चटकना प्रारम्भ कर देती हैं। मोरकण्ठ के समान ज्योति तथा उग्रगंध आने
लगती है। इस विषक्ति अन्न को भक्षण करने से मक्षिका मृत्यु को प्राप्त करती है
म्रीन्यते) तथा काक क्षाम स्वर (क्षीण आवाज) हो जाते हैं॥३७-३९॥
पाकरक्षा मया प्रोक्ता तस्य स्थानं च शोभनम्।
अधातः प्रोच्यते वैद्यसूपकारगुणागुणाः ॥ ४० ॥
इति नवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्मविरचिते क्षेमकुतूहलग्रन्थे
महाननसोपयोग्योपकरणप्रशंसनं नाम द्वितीयोत्सवः।
उपसंहार 'क्षेमकुतूहम्'
इस द्वितीय अध्याय में पाक करना की विधि तथा उत्तम स्थान (शोभनम्) का
वर्णन किया गया है। आगामी अध्याय (तृती उत्सव) में वैद्य तथा सूपकार के गुण-
दुर्गुण को परिचय कराया जायेगा॥४०॥
अथ तृतीयोत्सवः
(प्रकरण तृतीय)
अथ वैद्यसूपकारप्रशंसा
राजा राजगृहासन्ने प्राणाचार्यं निवेशयेत्।
सर्वदा स भवत्येवं सर्वत्रैवाप्रमादवान् ॥ १॥
अन्नपानं विषाद्रक्षेद्विशेषेण महीपतेः।
यस्माच्च चेतोऽनित्यत्वमश्ववत्प्रथितं नृणाम्।
न विश्वसेदतो राजा कदाचिदपि कस्यचित् ॥ २॥
क. वैद्य (प्राणाचार्य) को राजा राजगृह के समीप (राजगृहासन्न) निवास की जाना
देनी चाहिए। वह सदैव प्रत्येक स्थान पर प्रमादरहित होकर (सर्वदा) इन निर्देशों
के अनुसार कार्य करे।
ख. वैद्य राजा के अन्नपान की दशा सावधानी पूर्वक प्रमादरहित होकर (शंका के
(समाधान सहित) करें। मनुष्य का चित्त (मन के समान) चंचल रहता है, राजा
किसी का विश्वास नही करे (न विश्वेषेण राजा कदाचित्)॥१-२॥
आयुर्वेदकृताभ्यासः सर्वत्र प्रियदर्शनः।
युक्तिहेततसमायुक्त एष वैद्यो विधीयते ॥ ३॥
क्रोधपारुष्यमात्सर्यमायालस्यविवर्जितम् ।
जितेन्द्रियं दयावन्तं शीलशौचक्षमान्वितम् ॥ ४॥
महानसिक वैद्यः गुणावली
१. आयुर्वेद कृतम्भास ६. दयालु
२. सर्वत्र प्रिदर्शन ७. शीतवान्
३. युक्तिवेत्ता ८. शुचियुक्त
४. क्रोध-निष्ठुर वचन-मात्सर्य आलस्य रहित ९. क्षमावान्
५. जितेन्द्रिय
[पृष्ठ २६]
क्षेमकुतूहलम्
वैद्य के गुण
कुलीनं धार्मिकं स्निग्धं सुव्रतं सन्मते स्थितम्।
अलुब्धमशठं भक्तं कृतज्ञं प्रियदर्शनम्॥५॥
मेधाविनमसम्भ्रान्तमनुरक्तं हितैषिणम्।
पटुं प्रगल्भं निपुणं दक्षमालस्यवर्जितम्॥६॥
सर्ववैद्यगुणैर्युक्तं नित्यं सन्निहितागदम्।
महानसे प्रयुञ्जीत वैद्यं तद्विद्यपूजितम्॥७॥
| १. कुलीन | ९. कृतज्ञ | १७. शाख निपुण |
| २. पवित्र | १०. प्रियदर्शक | १८. कार्यदक्ष |
| ३. स्निग्ध | ११. बुद्धिमान | १९. आलस्यरहित |
| ४. सुनियमपालक | १२. असम्भ्रान्त | २०. वैद्य गुणों (शास्त्रों) में पारंगत |
| ५. सुविचारशील | १३. अनुरक्त | २१. विभिन्न कर्म दर्शिता |
| ६. निर्लोभ | १४. हितैषी | २२. सर्वथा औषध युक्त |
| ७. शठतारहित | १५. चतुर | २३. अन्य गुण-विशेषतायें |
| ८. भक्त | १६. निहद |
इन गुणों/वैशिष्ट्य। कार्मिक श्रेष्ठता में युक्त वैद्य महानस (भोजन पाक गृह) में नियुक्ति के योग्य होता है, क्योंकि इस प्रकार का वैद्यपूजित माना गया है॥५-७॥
वैद्यः पुरोहितो मन्त्री दैवज्ञश्च चतुर्थकः।
प्रातरेव हि द्रष्टव्या नित्यं स्वश्रेय इच्छता॥८॥
राजा द्वारा प्रातःदर्शनीय महापुरुष
१. वैद्य
२. पुरोहित
३. मन्त्री
४. ज्योतिषी
इन चार व्यक्तियों का दर्शन राजा के लिए कल्याणकारी होता है॥८॥
दैवज्ञो मन्त्रविद्वैद्यश्चतुर्थश्च पुरोहितः।
एते राज्ञासदा पोष्याः कृच्छ्रेणापि स्त्रियो यथा॥९॥
पालनार्थ राजा का कर्तव्य
इन चारों सम्मानीय व्यक्तियों (श्लोक ८) का पालन-पोषण अपनी स्त्री की भांति (कष्ट से भी) राजा को करना चाहिए॥९॥
[पृष्ठ २७]
तृतीयाेत्सवः २७
वैद्यविद्वज्जनामात्या यस्य राज्ञः प्रियंवदाः।
आरोग्यधर्मकोशाश्च प्रहीयन्ते हि सर्वदा॥१०॥
प्रियता राजा हेतु अहितकर
राजा के सम्पर्कता (राज्य मुख्यालय) में वैद्य, विद्वान तथा मन्त्री- सभी प्रियवादी हैं। (प्रियंवदाः), उस राजा का स्वास्थ्य, धर्म तथा कोश (धन-भण्डार) क्षीण होना प्रारम्भ हो जाता है॥१०॥
गतश्रीर्गणकान् द्वेष्टि गतायुश्च चिकित्सकान्।
गतश्रीश्च गतायुश्च ब्रह्मणान् द्वेष्टि भारत॥११॥
लक्ष्मी (गतश्री) नष्ट होने वाला व्यक्ति ज्योतिषी से द्वेष करता है, तथा आयु क्षीण होने पर चिकित्सक से द्वेष करने लगता है। अर्जुन, दोनों व्यक्तिगतश्री तथा गतायु ब्राह्मणों से द्वेष प्रारंभ कर देते हैं॥११॥
क्वचिद्वित्तं क्वचिन्मित्रं क्वचिद्धर्मः क्वचिद्यशः।
क्वचिदभ्यासयोगश्च नाफलं हि चिकित्सितम्॥१२॥
चिकित्सा की सर्वदा सफलता
चिकित्सक को कहीं धन, कहीं मित्र, कहीं धर्म, कहीं यश तथा कहीं चिकित्सा कर्माभ्यास- इस रीति से चिकित्सा कार्य कभी असफल नहीं जाता॥१२॥
चिकित्सितशरीरं हि न निष्क्रीणाति यो नरः।
तेन यत्क्रियते पुण्यं तत्फलं भिषगश्नुते॥१३॥
जब रोगी मनुष्य चिसित्सक को पर्याप्त पुरस्कार, (जैसे शरीर को क्रय करके) तब तक किसी भी पुण्य कार्य का फल नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में फल चिकित्सक को प्राप्त होता है॥१३॥
संचयं च प्रकोपं च प्रसरं स्थानसंश्रयम्।
व्यक्तिं भेदं च यो वेद दोषाणां स भवेद्भिषक्॥१४॥
वैद्य का दोषस्थिति ज्ञान
दोषों की संचय, प्रकोप, प्रसर, स्थान साम्प्रय तथा व्यक्ति- इन दोषो से अवस्थाओं के ज्ञाता को वैद्य कहा जाता है॥१४॥
पृष्ठ २८
२८ क्षेमकुतूहलम्
व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं वेदनायाश्च निग्रहः।
एतद्वैद्यस्य वैद्यत्वं न वैद्यः प्रभुरायुषः॥ १५॥
वैद्य का ज्ञान
व्याधि (रोग के लक्षणों का ज्ञान) तथा उसको निवारण का ज्ञान होना ही वैद्य
का वास्तविक ज्ञान है (कर्तव्य वास्तविक रूपसे)। वैद्य आयु का स्वामी नहीं, बल्कि
आयु की रक्षा-विशेषरूप से गतायु की रक्षा वैद्य के वश में नहीं रहता॥१५॥
कुचैलः कर्कशो दीनो ग्रामीणोः स्वयमागतः।
पञ्च वैद्या न पूज्यन्ते धन्वन्तरिसमा अपि॥ १६॥
पंच निन्दनीय चिकित्सक
१. कुचैला, २. स्वयं आहत, ३. कठोर, ४. दीन, ५. अव्यवहारिक- यह
पाँच प्रकार के वैद्य धन्वन्तरि के समान होने पर भी सम्मान के योग्य नहीं हैं॥१६॥
सुश्रुतं न श्रुतं ये हारीतं येन हारितम्।
नालोकि चरकं येन स वैद्यो वैद्यनिन्दितः॥
सुश्रुतं न श्रुतं येन किमन्यैर्बहुभिः श्रुतैः॥ १७॥
वैद्यौं में निकृष्ट (निदनीय)
१. सुश्रुत संहिता का श्रवण नहीं किया
२. हारीत संहिता का अध्ययन नहीं किया
३. चरकसंहिता का अवलोकन नहीं किया
४. सुश्रुत संहिता को अध्ययन के बिना आयुर्वेद का ज्ञान परिपूर्ण नहीं
है॥१८॥
श्रुतचरितसमृद्धे कर्मदक्षे दयालौ
भिषजि निरनुबन्धे देहभारं निवेश्य।
भवति विपुलतेजाः स्वस्थकीर्तिप्रभावः
स्वकुशलफलभोगी भूमिपालश्चिरायुः॥ १८॥
स्वदेह के संरक्षण का भार शास्त्रानुसार आचरण करने वाले, चिकित्सा कार्य में
कुशल दयालु, निरनुबन्धन निर्दोष वैद्य के हाथों में देकर, विपुल तेज युक्त, स्वास्थ्य
पृष्ठ २९
तृतीयोत्सवः २९
एवं यश से प्रभावित, एव कल्याण कारक फलों को उपभोग करने वाला राजा चिरायु
होता है॥१८॥
भोजनसमये राजानं प्रति वैद्यस्यानुशासनम्
पारंगतः सकलवैद्यकसंहितानां
सत्पाकशासनबुधो गुरुवत्प्रगल्भः।
ब्रूयादिदं नरपतेः परिवेशकाले
धन्वन्तरिप्रतिभटो भिषजां वरेण्यः॥ १९॥
राजा का भोजन काल- वैद्य का कर्तव्य
समस्त आयुर्वेद संहिताओं के कुशल ज्ञाता (पारंगत) पाकशास्त्र में रस, गुरु के
समान प्रभावशाली, धन्वन्तरि समान श्रेष्ठ चिकित्सक को चाहिए कि भोजन परोसने के
समय (परिवेशकाले) सम्बोधनात्मक वाक्यों को वैद्य को प्रयोग करना चाहिए॥१९॥
देवावधारय शुभौदनसूपसर्पिः
पटोलकं दृढफलं मृदु पर्पटं च।
मांसं च शाकसहितं शुचि पिष्टमन्नं
पक्वान्नपानकयुतं क्वथितं पयश्च॥ २०॥
हे राजन ! आपके सम्मुख विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थ (आहार भक्षण पदार्थों
के नाम) प्रस्तुत (परिवेशित) हैं, इनको आप (राजा) ग्रहण करें॥२०॥
मधुरादि रसक्रमेण भोजनस्य नियन्त्रणम्
मधुरमधुरमादौ मध्यतोऽम्लैकभावः
कटुकटुकमथान्ते तिक्ततिक्तं तथैव।
यदि सुखपरिणामं वाञ्छसि त्वं हि राजन्
त्यज खलजनसङ्गं भोजनं मा कदाचित्॥ २१॥
रसानुसार भोजन नियम
प्रारम्भ में मधुर पदार्थ, मध्य मे अम्ल पदार्थ तथा अन्त मे कटु एवं तिक्त रस
युक्त पदार्थों को भोजन में ग्रहण करे। यदि सुखकारक फल चाहते हैं। तब दुर्जनो की
संगतिका परित्याग कर दें, परन्तु भोजन की कभी उपेक्षा कही करनी चाहिए (त्यज
भोजनं मा कदाचित्)॥२१॥
क्षे. कु. 3
३० क्षेमकुतूहलम्
भोजनकाले फलभक्षणविधिः
फलमादौ ही चाश्नीयाद्भोजनस्य नरोत्तम।
बिना मोचफलं तद्वर्जनीया च कर्कटी ॥ २२ ॥
भोजनकाल में फल ग्रहण
हे नरोत्तम ! भोजन के समय (भोजन से पहले) फल भक्षण करना श्रेयस्कर है,
परन्तु मोचफल (केला) तथा कर्कटी नहीं खाना चाहिए॥२३॥
भोजनकालनिरूपणम्
याममध्ये न भोक्तव्यं यामयुग्मं न लङ्घयेत्।
याममध्ये रसोद्वेगो युग्मेऽतीते बलक्षयः ॥ २३ ॥
भोजनकाल
प्रातःकाल एक प्रहर के मध्य भोजन न करे तथा भोजन करने में दो प्रहर नहीं
व्यतीत होने दें। एक प्रहर के मध्य भोजन करने रसोद्वेग होता हैं। दोपहर के बाद भोजन
करने से बल का क्षय हो जाता है॥२३॥
मात्रापूर्वकभोजनस्य फलम्
मात्राशी सर्वकालं स्यान्मात्रा ह्यग्नेः प्रवर्त्तिका।
मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते गुरूण्यपि लघूनि च ॥ २४ ॥
अर्धं गुर्वन्नमश्नीयाल्लघुच्चन्नं नातितृप्तितः।
मात्राप्रमाणमादिष्टं सुखं येन विजीर्यते ॥ २५ ॥
भोजनं हीनमात्रं तु न बलोपचयौजसे।
सर्वेषां वातरोगाणां हेतुतां च प्रपद्यते ॥ २६ ॥
अतिमात्रं पुनः सर्वमाशु दोषं प्रकोपयेत्।
शाकं नवान्नभूयिष्ठं शीतमुष्णीकृतं त्यजेत् ॥ २७ ॥
मात्रापूर्वक भोजन
क. सदैव मात्रा पूर्वक भोजन करना चाहिए (मात्रासी सर्वकालम्)। इससे अग्नि
प्रदीप्त होती हैं। मात्रा का निर्धारण गुरु एवं लघु गुण युक्त भोज्य पदार्थों के
अनुसार होता है।
ख. गुरु अन्न सामान्य मात्रा में होना चाहिए, परन्तु लघु अन्न अधिक तृप्ति
कारक होने पर भी कुछ कम भक्षण करे।
तृतीयोत्सवः ३१
ग. मात्रा का उचित प्रमाण वही है, जिससे सुखपूर्वक अन्न का परिपाक हो
सके- यही उत्तम मात्रा है। हीन मात्रा का भोजन बल एवं ओज की वृद्धि
नहीं करता, तथा सर्ववात रोगों का कारण है।
घ. अधिक मात्रा में भोजन शीघ्र ही सभी दोषों का प्रकोप करता है।
ङ. नवीन जल अथवा कदन्न के साथ शाक का सेवन उष्णीकृत (गर्म किया अन्न
खाना हितकर नहीं होता॥२५-२७॥
अतिभोजनस्य दोषाः
अनात्मवन्तः पशुवद्बुञ्जने येऽप्रमाणतः।
रोगानीकस्य ते मूलमजीर्णं प्राप्नुवन्ति हि ॥ २८ ॥
अतिभोजन जनित दोष
जो व्यक्ति (अनात्मवन्त) असंयमवश भोजन लौल्य के कारण पशु वत् (पशुवद्बुञ्जने)
प्रमाणरहित (मात्रा की उपेक्षा करके) आहार का भक्षण करते हैं, वह रोगानीक (रोगों
के समूह) के मूल अजीर्ण से पीड़ित हो जाते हैं॥२८॥
आहारं पचति शिखी दोषानाहारवर्जितः पचति।
दोषक्षयेऽपि धातून् पचति च धातुक्षये प्राणान् ॥ २९ ॥
बुभुक्षितो न योऽश्नाति तस्याहारेन्धनक्षयात्।
मन्दो भवति कायाग्निर्यथा चाग्निरनिन्धनः ॥ ३० ॥
आहार का अग्निपाचन नियम
भक्षित आहार का पाचन जाठराग्नि द्वारा होता है, तदनन्तर दोषों का पाचन
करती है, फिर धातुओं का पाचन करके प्राण को पचाती है (धातुओं के क्षीण हो जाने
पर)। बुभुक्षा (भूख) से ग्रस्त व्यक्ति यदि पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं करता है, (ईंधन
समाप्त होने पर) भोजन मिलने के कारण जठराग्नि मन्द पड़ जाती है, जैसे ईंधन के
अभाव में अग्नि में मन्दता आ जाती है॥२९-३०॥
अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नमनम्बुपानाच्च स एव दोषः।
तस्मान्नरो वह्निविवर्धनाय मुहुर्मुहुर्वारि पिबेदभूरि ॥ ३१ ॥
भुक्तादौ सलिलं पीतं कार्श्यमन्दाग्निदोषकृत्।
मध्येऽग्निदीपनं श्रेष्ठमन्ते स्थौल्यकफप्रदम् ॥ ३२ ॥
३२ क्षेमकुतूहलम्
जलपान विधान
क. अधिक जलपान करने से अन्न का पाचन नहीं होता, या किंचित् जलपान करने से भी
पाचन ठीक प्रकार से नहीं हो पाता- इससे दोष का पाचन प्रारम्भ हो जाता है, अतः
आहार का खाते समय, थोड़ा-थोड़ा (मुहुर्वारि पिबेत्) पानी पीते रहना चाहिए।
ख. भोजन करने से पूर्व जलपान करने से, कृशता एवं मन्दाग्नि दोष हो जाता है,
भोजन के बीच (मध्य) पानी पीने से जाठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है भोजन के
अन्त में जलपान से स्थूलता तथा कफ वृद्धि हो जाती है।।३१-३२।।
तृषितस्तु न चाश्नीयात्क्षुधितो न पिबेज्जलम्।
तृषितस्तु भवेदगुल्मी क्षुधितस्तु जलोदरी॥३३॥
भोजन करने तथा जलपान करने का क्रम में व्यतिरेक होने से हानि होती है।
तृषित प्यासा (व्यक्ति) को भोजन नहीं करना चाहिए तथा क्षुदित व्यक्ति (भूखे) को
जलपान करना निषिद्ध है। तृषित व्यक्ति के भोजन करने पर गुल्म रोग की संभावना हो
जाती है; इसी प्रकार क्षुधित (भूखा) व्यक्ति यदि जलपान करता है, तब जलोदर रोग
हो जाता है।।३३।।
अत्युष्णान्नं बलं हन्ति शीतं शुष्कं च दुर्जरम्।
अतिक्लिन्नं ग्लानिकरं युक्तियुक्तं बलप्रदम्॥३४॥
अत्युष्ण भोजन जनित हानि
बहुत अधिक गर्म भोजन करने से, बल नाश होता है। शीतल तथा शुष्क अन्न
दुर्जर (देर से पचने वाला) होता है। अति आर्द्र अन्न खाने से ग्लानि (आहार में रुचि
न होना) हो जाती है। अतः युक्तियुक्त (साधारणतया समशीतोष्ण अर्थात् आवश्यकतानुसार
ठंडा या गर्म भोजन बलदायक होता है।।३४।।
तृषितो मोहमायाति मोहात् प्राणान् विमुञ्चति।
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु न क्वचिद्वारि वार्यते॥३५॥
जलपान के अभाव से हानि
तृषित (प्यासा व्यक्ति) यदि जल (पानी) पान नहीं करेगा। तब मोह (मूर्च्छा) से
पीडित हो जायेगा। मूर्च्छा होने से प्राण का विमोचन (नाश) हो जायेगा। अतः सभी
अवस्थाओं जलपान निषिद्ध नहीं हे।।३५।।
तृतीयोत्सवः ३३
चयप्रकोपोपशमा वायोग्रीष्मादिषु त्रिषु।
वर्षादिषु च पित्तस्य श्लेष्मणः शिशिरादिषु॥३६॥
ऋतु तथा दोषों की स्थिति
ग्रीष्म आदि तीन ऋतुएं में क्रमशः वायु का संचय, प्रकोप एवं उपशम होता है,
वर्षा आदि तीन ऋतुओं में पित्त तथा शिशिर आदि तीन ऋतुओं में कफ का संचय,
प्रकोप एवं उपशम होता है। इसके अनुसार वर्षा ऋतु में पित्त का संचय, शरद में प्रकोप
तथा हेमन्त में उसका उपशम होता है। शिशिर में कफ का संचय, वसन्त में प्रकोप
तथा ग्रीष्म में उपशम होता है। यह दोषों की तीनों अवस्थाओं (संचय-प्रकोप-उपशमन)
का विभिन्न ऋतुओं में सामान्यत स्थिति रहती है, जिससे स्वास्थ्य एवं विकार दोनों
प्रभावित होते हैं।।३६।।
राजन्नध्यशनं त्याज्यं त्याज्यं च विषमाशनम्।
त्यजेद्विरुद्धामाहारं तत्सर्वं दोषकारकम्॥३७॥
क. अध्यशन ] हे राजन! आहार की तीन श्रेणियां निषिद्धाहार के अन्तर्गत
ख. विषमाशन ] हैं, क्योंकि ये दोषकारक या रोगोत्पाद हैं। इन तीनो प्रकार के
ग. विरुद्धाशन ] आहार का त्याग कर देना चाहिए।
विद्यादध्यशनं भूयो भुक्तस्योपरि भोजनम्।
अकाले बहु चाल्पं वा भुक्तं तु विषमाशनम्॥३८॥
वल्लीफलैरम्लकुलत्थशाकैर्मत्स्यैः सुरामांसतिलैः करीरैः।
पिण्याकजम्बूलवणैश्च दध्ना व्यस्तैः समस्तैश्च पयो विरोधि॥३९॥
घृतं धान्यं च तक्रेण दधिमद्यैश्च कुक्कुटाः॥४०॥
कपिञ्जलो तित्तिरिलावकौ च गोधामयूराबुरुबूकतैलैः।
यथाविरुद्धाश्च तथा कपोतास्तैलेन भृष्टा अपि सार्षपेण॥४१॥
अध्यशन- भोजन करने के बार पुनः भोजन हेतु बैठ जाना, यह अध्यशन की
परिभाषा है।
विषमाशन- असमय में कभी अल्प-कभी अधिक भोजन करना, यह विषमाशन
की परिभाषा हे।
विरुद्धाहार- (क) बल्ली फल, अम्ल पदार्थ, कुलत्थ, शाक, मत्स्य, सुरा,
पृष्ठ ३४
३४ | क्षेमकुतूहलम्
मांस, करीर, पिण्याक, जम्बू, लवण, दधि- इन पृथक् द्रव्यों या एक साथ मिश्रित
द्रव्यों के साथ दुग्ध विरुद्धाहार माना गया है।
कपिजंल, तित्तिर, लावा, गोधा तथा मयूर मांस को एरण्ड तैल में पकाना विरुद्ध
है। कपोत मांस को सर्षप तैल में पकाना विरुद्धाहार है।
एक साथ अनेक जन्तुओं के मांस परस्पर विरुद्ध हैं। मधु, घृत, वसा, तैल तथा
जल का यथाक्रम से विरुद्धाहार की श्रेणी में रखा जाता है॥३८-४१॥
एकध्यं बहुमांसानि विरुद्ध्यन्ते परस्परम्।
मधुसर्पिर्वसातैलपानीयानि यथाक्रमम्॥४२॥
अशीतेनाम्भसा स्नानं पयःपानं नवाः स्त्रियः।
एतद्धि मानवाः पथ्यं स्वल्पं स्निग्धं च भोजनम्॥४३॥
भोजनंबलकृत्सद्यः प्राणिनां देहधारणम्।
आयुस्तेजःस्वरोत्साहधृतिस्मृतिसुखप्रदम् ॥४४॥
पथ्य (हितकर) आहार-विहार
१. अशीति (समशीतोष्ण) जल स्नान
३. नव स्त्रिया
२. दुग्धपान
४. अल्प-स्निग्ध भोजन
भोजन से लाभ- बलवृद्धि, शीघ्र प्राणियों की रक्षा, आयु-तेज-स्वर-उत्साह-
धृति, स्मृति तथा सुखकारक॥४१-४४॥
भुक्त्वोपविशतस्तुन्दं बलमुत्तानशायिनः।
आयुर्वामकटिस्थस्य मृत्युर्धावति धावतः॥४५॥
भोजनोपरान्त कर्म
भोजन करने के बाद उपविशन (बैठने) से तुन्दीकरण (कुदर-तोंद) निकला,
उतान सोने से बल की वृद्धि तथा वामशायी (बांयी करवट) सोने से आयु वृद्धि तथा
धावन (दौड़ने) से मृत्यु भी साथ पीछा करती है॥४५॥
उपयुक्ता यत्र वयं तत्ते राजन् कदाचिदपि माभूत्।
जितशत्रोरपि नृपतेर्वद कस्यन वल्लभाः करिणः॥४६॥
पृष्ठ ३५
तृतीयोत्सवः | ३५
राजा को आवश्यकता
ऐसा नहीं भी न हो, जहाँ हम लोगों को आवश्यकता पड़े (शत्रुओं से जीते हुए
हस्ति किस राजा को प्रिय नहीं होते। राजा के यहाँ सभी सहकारी प्रिय होते हैं॥४६॥
अथ सूपकारप्रशंसा
पितृपैतामहो दक्षः शास्त्रज्ञो मिष्टपाचकः।
शौचयुक्तोऽथ भक्तश्च सूपकारः स शस्यते॥४७॥
भवेयुर्धार्मिका स्निग्धाः सूपकाराः क्रमागताः।
कृतोष्णीषाश्च शुचयस्तथा वैद्यवशस्थिताः॥४८॥
सूपकार के प्रशंसनीय लक्षण
१. पितृ-पितामह से सूपकार वृत्ति (वंशपरम्पदानुसार पाचक का व्यवसाय)
२. चतुर पाकशास्त्र विज्ञाता-स्वादुपाकी-पवित्रता से युक्त
३. स्वामिभक्त
इन गुणों तथा क्रियाशीलता से युक्त सूपकार उत्तम माना गया है।
ख. धार्मिक, कामलस्वभावी वंश परम्परागत, उष्णीष धारी, शुचिवान् तथा महानस
वैद्य के वश में स्थित (वश/ अधीनता के अन्तर्गत कार्यरत)॥४७-४८॥
अन्येऽपि तत्र ये केचिच्चरन्ति परिचारकाः।
तेऽपि चैवंविधा एव तदध्यक्षोऽपि तादृशः॥४९॥
सूदकारपरिस्तत्र प्रायो वैद्यगुणान्वितः।
तन्त्रयजनतत्त्वज्ञस्तत्प्रशासनतत्परः ॥५०॥
अन्य महानस-कर्मचारी (परिचारक)
महानस में कार्यरत अन्य कार्यकर्ता (परिचारक) पाचक के गुणो से युक्त हो।
सूपकार पति (पाचकों का स्वामी), प्रायः वैद्य-गुण युक्त तथा परिचारक के भावों का
ज्ञाता तथा अनुशासन नियन्त्रक होना चाहिए॥४९-५०॥
अन्नस्य प्रशस्तिः
जीवनं जीवनामन्नममृतं विधिपाचितम्।
तदेवाविधिना भुक्तं परिणामे विषोपमम्॥५१॥
३६ क्षेमकुतूहलम्
ऋतूनां लक्षणं ज्ञात्वा ततस्तद्विधिमाचरेत् ।
अत एव प्रवक्तव्यं तच्चिह्नं तद्धिताहितम् ॥ ५२ ॥
अन्न का गुणानगुण
ऋतु के अनुसार तथा विधिपूर्वक पक्व अन्न प्राणियों का जीवन है। आहार विधि
विरुद्ध अन्न का सेवन परिणाम में विष के समान होते है।
ऋतुओं के लक्षण जानकर, आहार विधि के अनुसार आचरण करें, तथा ऋतुओं
के हिताहित का विचार करते हुए, आहार का सेवन करना श्रेयस्कर है॥५१-५२॥
अथ चतुर्थोत्सवः
(प्रकरण चतुर्थ)
ऋतुभेदाः
शिशिरः पुष्पसमयो ग्रीष्मो वर्षा शरद्धिम्ः ।
माघादिमासयुग्मैः स्युर्ऋतवःषट् क्रमादिमे ॥ १ ॥
उत्तरायणमाद्यैस्तैरन्यै स्याद्दक्षिणायनम् ।
आद्यमुष्णं बलहरं तत्रान्यद्बलदं हिमम् ॥ २ ॥
ऋतुओं का चक्र
ऋतु मास
१. शिशिर माघ-फाल्गुन
२. वसन्त चैत्र-वैशाख
३. ग्रीष्म ज्येष्ठ-आषाण
४. वर्षा श्रावण-भाद्रपद
५. शरत् आश्विन-कार्तिक
६. हेमन्त मार्गशीर्ष-पौष
उत्तरायण काल- शिशिर, वसन्त एवं ग्रीष्म - उष्ण, बलहारक
दक्षिणायन काल- वर्षा, शरद एवं हेमन्त - शीतल, बलदायक
तुषारजालैः पिहितानि यत्र सवाष्पनीराणि मुखानि भानुः।
प्रातः प्रसन्नानि करैः करोति दिशां वधूनामिव खण्डितानाम् ॥ ३ ॥
प्रियङ्गुपुन्नागकरोध्रेणुर्ब्रजर्नभो वाति हिमार्द्रवायुः।
आच्छादयन् धूमवितानलीढं विद्यादृतुं तं हिमनामधेयम् ॥ ४ ॥
हेमन्त ऋतु- लक्षण
तुषार कणों से आवृत्त, वाष्प-जलयुक्त दिशाओं से मुख को प्रातःकाल किरणो
क्षेमकुतूहलम् - चतुर्थोत्सवः (पृष्ठ ३८)
३८ क्षेमकुतूहलम्
से (खण्डित ईर्ष्या से क्रुद्धनायिका के, मुख के समान) प्रसन्न करने वाला; प्रियंगु-
पुन्नाग- लोध्ररजकणों से युक्त हिमार्ड्र वाए, आकाश आच्छादक अपने मार्ग से बहता
रहता है- धूम समूह से आच्छादित काल को हेमन्त ऋतु कहा जाता है।।३-४।।
नीहारानिलसंस्पर्शाद्द्बलवान् मारुतो यतः।
अतो हेमन्तसमये सेव्या शुण्ठ्या हरीतकी ॥ ५॥
तिलतैलेन शिरसो गात्रस्याभ्यङ्गमाचरेत् ।
सेवेतादित्यकिरणान्निर्धूमकहुताशनम् ॥६॥
आच्छादयेच्च कौशेयं प्रावारं चित्रमम्बरम् ।
कार्पासकं नवं सेव्यं गृहं चागुरुधूपितम् ॥ ७ ॥
हेमन्तचर्या
तुषारयुक्त वायु के स्पर्श से वात बलवान हो जाता है, अतः शुण्ठी के साथ हरीत
की सेवन का विधान है; धूम रहित अग्नि का सेवन, तिलतैल का शिर एवं शरीर पर
अभ्यंग, सूर्यताप (किरण) से ऊष्मा लाभ लेते हैं। उपयुक्त वस्त्रों से शरीर का आच्छादन,
धूप आदि सुगंधि नवीन निवास स्थान में वास करना चाहिए।।५-७।।
हेमन्ते कुटुतिक्तोष्णमम्लक्षारघृतं दधि।
गोधूमतिलमापेक्षुविकारान् भक्षेद्वहून ॥ ८ ॥
औदकानूपमांसानि कौलब्रध्रप्रलेहितान्।
हेमन्ते सेवयेन्नित्यमाशु शीतार्तिशान्तये ॥ ९ ॥
हेमन्त आहार
कटु-तिक्त-अम्ल रसयुक्त, उष्ण पदार्थ, क्षार, घृत, दधि, गोधूम तिल, माष
तथा इक्षुविकार (पकवान) का सेवन हितकर है। शीतजन्य कष्ट निवारणार्थ
औदक-आनूपज जन्तु मांस, नदी तट पर सूर्यप्रकाश तथा प्रलेह का सेवन करना
चाहिए।।८-९।।
कस्तूरिकागरुविमिश्रितकुङ्कुमार्ड्र-
देहां निषेव्य रमणीं रतिखेदखिन्नः ।
शेते कृती हिमविशालनिशागमेषु
तारुण्यपीनकुचयोगनिरस्तशीतः ॥ १० ॥
क्षेमकुतूहलम् - चतुर्थोत्सवः (पृष्ठ ३९)
चतुर्थोत्सवः ३९
हेमन्तचर्या
कामदेव से पीड़ित (रतिखेदखिन्नरमणी) तरुणी के कठोर स्तनों के संयोग से
शीतलता को निवारण किया हुआ, विद्वान कस्तूरी तथा अगरु मिश्रित केशर से आर्द्र
शरीर युक्तरमणी के आलिंगन सहित रात्रि को मुखपूर्वक शयन करना चाहिए।।१०।।
अथ शिशिरलक्षणचर्ये
यत्रामृतद्युतिकरव्रजसन्निकाशै-
र्व्योमा दिशश्च विदिशश्च तुषारजालैः ।
रुद्धं नभश्च हिमपीडितवच्च वह्ने-
राशामुपैति तपनः शिशिरः स कालः ॥ ११ ॥
शिशिर ऋतु
क. शिशिर ऋतु लक्षण-चन्द्रमा की किरण समूहों के समान तुषारकाल में
दिशायें, निकासों के कोण व्याप्त होकर, शीत से व्यथित जैसा आकाश अवरुद्ध हो जाता
है; सूर्य उत्तर दिशा (उत्तरायण) में पहुंच जाता है- इस काल को शिशिर ऋतु कहा जाता
है।।११।।
हिमोक्तचर्या शिशिरेऽपि कार्या पथ्या च सेव्या सह पिप्पलीभिः ।
पिष्टान्नकं सूरणशृङ्गवेरमिश्रं सदा संवटिकादिसेव्यम् ॥ १२ ॥
शिशिर ऋतुचर्या
हेमन्त ऋतु के समस्त आचरण पालनीय, हरीतकी-पिप्पली का सेवन, पिष्टान्न,
सूरण, आर्द्रक मिश्रित संवटिका आदि व्यंजनों का प्रयोग हितकर है।।१२।।
वसन्तलक्षणचर्ये
यत्रागस्त्यहरित्प्रवृत्तपवनव्याधूतचूतव्रजा-
रामोदारपरागपुञ्जपिहितं व्योमापि संराजते ।
छिन्नं रेणुचयैरिव स्मरविभोर्यत्रोद्धतैरिच्छतो
जेतुं सर्वजगन्ति स स्मरसखो ज्ञेयो वसन्तोदयः ॥ १३ ॥
वसन्त ऋतु लक्षण
अगस्त्य के पीत वर्ण हो जाने से, प्रवृत्त वायु के झोके से, आम्र के मनोहर पराग
द्वारा आच्छादित आकाश धूलिका आप्र सुशोभित होता है, तथा छिन्न सम्पूर्ण विश्व विजय
की कामना करता है, इस काल को कामदेव का मित्र (स्थिर सखा) वसन्तोदय मानना
चाहिए।।१३।।
तत्र श्लेष्मा बलोपेतो रुणद्धि जठरानलम्।
रोगान् करोति बहुशस्तेन पूर्वं कफं जयेत्॥ १४॥
हरीतकी क्षौद्रयुता च सेव्या श्रमो विधेयश्च बलानुरूपः।
भृङ्गवलीकोकिलनादरम्यरामाः सुरामासहितैर्निषेव्याः॥ १५॥
वसन्तऋतुचर्या
इस काल के बलवान् होने से, जाठराग्नि मन्द होकर, अनेक रोग जनक हो
जाता है, अतः सर्वप्रथम कफ को विजित करें। मधु-हरीतकी का सेवन, बल के
अनुसार श्रम करें, सुन्दर स्त्रियों के साथ भ्रमर तथा कोकिल शब्द-गुंजरित मनोहर
आराम (बगीचे) में विहार करना चाहिए।।१४-१५।।
तीक्ष्णं रूक्षं च कटुकं कषायं तिक्तकं लघु।
सेव्यं पुराणगोधूममुद्गशालियवादिकम् ॥ १६॥
पलं मार्गं च शाशं च लावतित्तिरादिकम्।
सेव्यं सर्वरसोपेतं सुष्ठुपस्करपाचितम् ॥ १७॥
उद्वर्तनं चरेन्नित्यं दिवास्वप्नं तु नाचरेत्।
गुरु स्निग्धं च मधुरं शीतमम्लं च वर्जयेत्॥ १८॥
श्यामां प्रसन्नशशिबिम्बमुखीं विनिद्र-
पङ्केरुहाकृतिदृशं धृतचारुवेषाम्।
आलिङ्ग्य मारुतचयं, परिचुम्ब्य पित्तं,
भुक्त्वा जयेत्कफचयं स्मरमित्रकाले ॥ १९॥
१. तीक्ष्ण-रूक्ष-कटु-कषाय-तिक्त रसयुक्त पदार्थ
२. लघु द्रव्य
३. जीर्ण (पुराण) गोधूम-युद्ध-शालि आदि धान्य
४. कक्कुट, राक्ष, लावा, तित्तिर आदि जीवों के मांसरस-अच्छे उपकरणों में पका
मांस
५. नित्य उद्वर्तन- दिवा निद्रा परित्याग
६. गुरु-स्निग्ध-मधुर-शील अम्ल पदार्थों का परित्याग।
चन्द्रमावत् बिम्ब सदृश मुखयुक्त, अर्धखिले कमल के समान नेत्र, सुन्दर वेश
धारिणी श्यामा स्त्री का आलिंगन करके, वात विकारों को विजित कफ।
भलीभाँति चुम्बन से पित्तविकारों का नाश तथा उपभोग करके विकारों को विजित
करे।।१६-१९।।
ग्रीष्मलक्षणचर्यं
यत्र प्रचण्डतरचण्डकरप्रताप-
संशोषितद्रुमलतातृणवारिपूरः।
उज्जृम्भते पवनवेगविकीर्णरेणु-
च्छन्ना भवन्ति च दिशः स निदाघकालः ॥ २० ॥
ग्रीष्मऋतु
ग्रीष्मऋतुलक्षण- इसकाल में अत्युष्ण सूर्य किरणों के संताप से वृक्ष, लता,
तृणासमूह, जलाशय शुष्क हो जाते हैं, वायु के वेग से विकीर्ण रेणु उड़ती है (आच्छन्न)
तथा दिशाओं का आच्छादन हो जाता है।।२०।।
स्निग्धच्छायां गृहं सेव्यं सेव्या पथ्या गुडान्विता।
सुधौतानि च वस्त्राणि सेव्यान्यातपशान्तये ॥ २१ ॥
ग्रीष्मऋतुचर्या
इस काल में धूप (सूर्यकिरणताप) से रक्षा हेतु स्निग्ध, छायायुक्त गृह मे निवास करे।
गुड़-हरीतकी का सेवन तथा श्वेतवस्त्रों का परिधान हितकर है।।२१।।
आरामभूरूहशिरस्तरविप्रतापा
वाप्यः प्रसन्नकमलाः कमलाकराश्च।
नद्यश्च चन्दनरसो घनसारमिश्रः
सेव्याः स्त्रजो विधुरुश्च निदाघकाले ॥ २२ ॥
भोज्यं शीतं च मधुरं फलं तृष्णाहरं मधु।
स्निग्धं द्रवं रसालादिपानकं शीतलं पिबेत् ॥ २३ ॥
पृष्ठ ४२
४२ क्षेमकुतूहलम्
सक्तूनालोडितान् शीतवारिणा शर्करान्वितान्।
भक्षयेच्छीतलं वारि पिबेत्कर्पूरवासितम्॥ २४॥
आराम (बगीचे) के वृक्षों द्वारा सूर्य तप से रहित, कभी में उत्फुल कल, कोमल
वाणी, नदी, कर्पूर मिश्रित मलयागिरि चन्दन रस पुष्प की शीतलमलया चन्द्रमा की किरणों
का सेवन हितकर है।
शीतल भोजन, मधुरफल, तृष्णाहर मधु, स्निग्ध द्रव पदार्थ, श्लेष्म रसाला,
शिखरिणी आदि पानक पान, शर्करा मिश्रित शीतल जल में सत्तू तथा कर्पूर से,
सुगन्धित जलपान लाभदायक है॥२२-२४॥
ग्रीष्मतो निषिद्धाहारविहारा:
त्यजेत् कटुकतिक्तोष्णलवणाम्लविदाहकृत्।
व्यायामं शीधुपानं च भास्करस्य च दीधितिम्॥ २५॥
निषिद्ध आहार-विहार
कटु, तिक्त, लवण-अम्ल रस युक्त आहार, उष्ण, दाहजनक पदार्थ, व्यायाम,
मद्यपान तथा सेवन कर निषेध किया जाता है॥२५॥
वर्षालक्षणचर्ये
यत्रेन्द्रनीलनिभवारिधरैर्निरुद्धाः
काष्टानभश्च विमलाः कुरुते न भानुः।
अम्भःसमीकृतमरुस्थलनिन्र्गाभिः
श्यामैस्तृणैरभिनवैः खलु सा च वर्षा ॥ २६ ॥
वर्षार्ऋतु लक्षण
नीलकान्तमणि के समान मेघों से आच्छादित दिशाओं एवं आकाश को सूर्य स्वच्छ
करने मे असमर्थ रहता है; जल से मरुस्थल एवं पर्वतीय नदियाँ समान हो जाती है; नवीन
श्यामवर्ण मे तृणों की उत्पत्ति हो जाती है- इसे वर्षा ऋतु कहते हैं॥२६॥
सशीकरमरुत्स्पर्शधरणीवाष्ययोगतः ।
सविषाविलतोयैश्च दोषाः चयस्तत्र कोपिनः॥ २७॥
जलकणों से युक्त वायु के स्पर्श तथा पृथ्वी के वाष्प के संयोग, विषयुक्त एवं
अविल (गन्दा) जल दोषों (वात-पित-कफ) का प्रकोप हो जाता है॥२७॥
पृष्ठ ४३
चतुर्थोत्सवः ४३
पथ्या सैन्धवसंयुक्ता सेव्या गेहं समुन्नतं।
शुष्कं प्रकाशवच्चित्रं सर्वतोऽगुरुधूपितम् ॥ २८॥
वर्षार्ऋतुचर्या- आहार-विहार
सैंधव लवण तथा हरीतकी का सेवन, शुष्क-प्रकाश युक्त-चित्रित सर्वत्र अगर
तथा धूप से सुगन्धित उच्च में निवास करना चाहिए॥२८॥
स्निग्धमम्लं सलवणं पलं शालियवादिकम्।
मस्तुसैन्धवसंयुक्तं पञ्चकोलावचूर्णितम् ॥ २९॥
क्वथितं च निषेवेत दिव्यं कौपं जलं पिबेत्।
भवेद्यानैकगमनः शुष्कधूपितवस्त्रवान् ॥ ३० ॥
स्निग्ध-अम्ल-लवण, शालि-भवादि, मस्तु सैन्ध, पंचकोल-चूर्ण मिलकर सेवन,
आकाश-कूप समित जलपान, शुष्क सुगन्धित वस्त्र धारण तथा अनेक गमन (सवारी
से योग्य)॥२९॥
निषिद्ध आहार-विहार
सर-नदी-वापी का जल स्नान, पान वर्जित; दिवाशयन, परिश्रम तथा घर्म (धूप)
सेवन वर्जित॥३०॥
सरोनद्यादिसलिलं स्नानपाने विवर्जयेत्।
दिवास्वप्नं श्रमं घर्मं प्रावृट्काले न सेवयेत् ॥ ३१ ॥
शरत ऋतुचर्या- आहार-विहार
नदी, वर्षाकालीन संचित पित्त शरद मे प्रकुपित; शर्करा सहित हरीतकी सेवन।
कषाय-मधुर-तिक्त रसयुक्त पदार्थ, शीतल जल, पशु मांस, शालि-मुद्ग, शर्करायुक्त
दुग्ध; आमलकी आमलकी-पटोल-गौ दधि-घृत, गुड निर्मित मिष्ठान्न, नदी जल तथा
चन्द्रमा किरणों का सेवन हितकर॥३१॥
अथ शरल्लक्षणचर्ये
यत्रोज्वला जलमुचो विकचेन्दुबिम्ब-
तारं नभो विकचनीरजकैरवाणि।
नाराणि मानसनिभानि सतां विभान्ति
काशानि कीर्तिसदृशानि च सा शरत्स्यात् ॥ ३२ ॥
४४ क्षेमकुतूहलम्
पित्तं प्रावृट्समुत्पन्नं शरत्काले प्रकुप्यति।
तेन शर्करया सार्धं सेवनीया हरीतकी ॥ ३३ ॥
कषायं मधुरं तिक्तं शीतलं जाङ्गलं पलम्।
शालिमुद्गान्नम्अश्नीयात्पिबेद्दुग्धं सशर्करम् ॥ ३४ ॥
धात्री पटोलं गव्याज्यं सर्वभिक्षुविकरजम्।
सेव्यं नदीसरोवारि करजालं च शीतगोः ॥ ३५ ॥
शरत्ऋतु लक्षण
स्निग्ध मेघ, चन्द्रोदय बिम्ब के सामान आकाश, खिले हुए कमल-कुमुदनी युक्त
मानस, सरोवर सदृश जल एवं सज्जनों के यश के समान सुशोभित- शरत् ऋतु में होता
है॥३२-३६॥
तीक्ष्णमम्लं लवणं दधि तैलासवातपम्।
दिवास्वप्नं पुरोवातं शरत्काले विवर्जयेन् ॥ ३६ ॥
शरत ऋतु- निषिद्धाहार-विहार
तीक्ष्ण-अम्ल-लवण, दधि-तैल-मद्य, सूर्य घर्म (धूप), दिन में सोना तथा पूर्वी हवा
सेवन वर्जित॥३६॥
सर्वर्तुप्रान्त्यसप्ताहाद्भाविनो विधिमाचरेत्।
ऋतोर्लक्षणसंयोगादृतुसन्धिर्यतो भवेत् ॥ ३७॥
ऋतुसंधि
सर्व ऋतु में एक सप्ताह पूर्व, आगामी ऋतु के आचरण को प्रारम्भ कर देना
हितकर है; विभिन्न (ऋतुओं के) लक्षणों का संयोग हो जाने पर, इसका काल
(संयोजित) को 'ऋतु सन्धि' संज्ञा दी जाती है॥३७॥
स्थानं मयोक्तमृत्सुसेव्ययोग्यं सर्वस्य द्रव्यस्य गुणागुणाश्च।
ऋतूक्तभोज्यमृतुलक्षणं च त्वथोच्यते प्रत्यहकृत्यकर्म ॥ ३८ ॥
ऋतु तथा ऋतुचर्या- उपसंहार
ऋतुचर्या सम्बन्धी वर्णन किया है, आगे प्रत्यह कर्मों का प्रतिपादन पंचम उत्सव
में निहित है॥३८॥
अथ पञ्चमोत्सवः
(प्रकरण पञ्चम)
अथ दिनचर्या
प्रातःकाले समुत्तिष्ठेत्स्वस्थो रक्षार्थमायुषः।
शरीरशुद्धिं निर्वर्त्य कृतशौचविधिर्नरः ॥ १ ॥
केशपाशे प्रकुर्वीत प्रसाधन्यादिशोधनम्।
मुखस्यालोकनं कुर्याद्दर्पणेन विचक्षणः ॥ २ ॥
दिनचर्या
प्रातोत्थापन-जो व्यक्ति स्वस्थ हो, वह अपनी आयु की रक्षा के उद्देश्य से
प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त्त में निद्रा को त्याग कर, उठ जाये; वह शौचादि से निवृत्त होकर,
शरीर को शुद्ध करके, केशप्रसाधन आदि से शरीर का शोधव करता है, प्रातःकाल
मुख को दर्पण में अवलोकन करता है, वह दीर्घायु होता है॥१-२॥
दन्तधावनविधिः
ततो हि दन्तनिर्लेखं प्रकुर्याद्विधिना नरः।
क्षीरितिक्तकषायाणां द्वादशाङ्गुलमायतम् ॥ ३ ॥
कनिष्ठाग्रसमस्थौल्यं ख्यातवृक्षस्य शोभनम्।
दन्तधावन
विधिपूर्वक दन्त धावन करना चाहिए (शौचाद्रि कृत्य से निवृत्त होकर)। दुग्धयुक्त,
तिक्त-कषाय रस युक्त वृक्षों की, द्वादशांगुल अथवा कनिष्ठिका अंगुलि के अग्रभाग के
समान मोटी तथ्य सुदनानिर्वेत्वती (दन्तधावन-दातून) कर उपयोगार्थ ग्रहण करते
हैं॥३१/२॥
दन्तकाष्ठग्रहणकाले वनस्पति स्तुतिः
आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च ॥ ४॥
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते।
क्षे. कु. 4
४६ क्षेमकुतूहलम्
इत्यादिस्तततिवाक्येन यद्गृहीतं वनस्पतेः ॥ ५ ॥
प्रयच्छति भृशं कर्तुरायुःश्रीधीयशःस्थितीः ।
दन्त काष्ठ ग्रहण- वनस्पति प्रार्थना (अभिमन्त्रण)
हे वनस्पति ! आप मुझे आयु, वर्ण, यश, प्रजा, पशु, धन, ब्रह्मप्रज्ञा, मेधा
(स्मृति तथा बुद्धि) प्रदान करें। इन स्तुति वाचन से प्राप्त दन्तकाष्ठ (दन्तधावन) करने
वाले व्यक्ति को अधिकतम आयु, लक्ष्मी, बुद्धि, यश तथा स्थामित्व की प्राप्ति होती
है॥४-५१/२॥
वर्णानुसारोण दन्तकाष्ठस्य प्रमाणम्
दशाङ्गुलं क्षत्रियाणां विप्राणां द्वादशाङ्गुलम् ॥ ६ ॥
अष्टाङ्गुलं तु वैश्यानां शूद्राणां तु षडङ्गुलम् ।
दन्तकाष्ठं हि गृह्णीयात् स्त्रीणां तु चतुरङ्गुलम् ॥ ७ ॥
भक्षयेद्दन्तकाष्ठाग्रं दन्तमांसान्यपीडयन् ।
जिह्वानिर्लेखनं कुर्यात् प्राङ्मुखो वा हृदङ्मुखः ॥ ८ ॥
व्रर्ण के अनुसार दन्तकाष्ठ ग्रहण
वर्ण/जाति/लिंग दन्तकाष्ठ प्रमाण
क. ब्राह्मण दश अंगुल (१०)
ख. वैश्य द्वादश अंगुल (१२)
ग. शूद्र षडांगुल (६)
घ. स्त्री चतुरंगुता (४)
इसके पश्चात् दन्तकाष्ठ के अग्रभाग का चर्वण करके, दन्त स्वच्छता करते हैं।
तथा जिह्वानिलेँखन (दन्त काष्ठ से को चीरकर, इसके दो भाग करके) करते है जिससे
जीभ पूर्णतया स्वच्छ हो जायें तथा मल कफ रहित हो जाये॥६-८॥
दन्तकाष्ठस्याभावे दन्तधावनविधिः
अलाभे दन्तकाष्ठस्य निषिद्धदिवसेषु च ।
अपां द्वादशगण्डूषैर्मुखशुद्धिर्विधीयते ॥ ९ ॥
रसनादन्तजा रोगा वैरस्य मलसंभवः ।
न भवन्ति मुखे तेन वैशद्यं लाघव भवेत् ॥ १० ॥
पञ्चमोत्सवः ४७
दन्तकाष्ठ अभाव- दन्तधावन
यदि दन्त काष्ठ न मिल सके, तथा जब मूत धावन निषिद्ध हो, ऐसी स्थिति में
द्वादश गण्डूषो से (बारह कुल्ले करके) मुख की शुद्धि कर लें। दन्तकाष्ट के स्वाद को
ग्रहण करने से, दन्तरोग, मुख विरसता तथा मल संभाव्यता मुख से निवृत्त होती है,
तथा मुख में स्वच्छता तथा लघुता आ जाती है॥९-१०॥
मण्डूषधारणस्य फलम्
ततो गण्डूषकरणं कफकण्डूमलापहम्।
गण्डूष धारण
दन्त काष्ठ (पवन) के पश्चात् कफ, कण्डू तथा मल की निवृत्ति गण्डूष (कुल्ला)
करने से हो जाती है॥१०१/२॥
मुखप्रक्षालनविधिस्तस्य फलञ्च
मुखप्रक्षालनं कार्यं पयसा शीतलेन च ॥ ११ ॥
रक्तपित्तास्यसंशोभनीलिकाव्यङ्गनाशनम् ।
कुर्याद्दृग्पि कदुष्णेन पयसाऽऽस्यविशोधनम् ॥ १२ ॥
कफवातहरं स्निग्धं मुखदोषविनाशनम् ।
औषधं चात्र सेवेत सद्द्वैद्यप्रतिपादितम् ॥ १३ ॥
जातेरोगनिवृत्त्यर्थमाग्नेयं बलवर्धनम् ।
मुख प्रक्षालन विधान
व्यक्ति को शीतल जल (ठंडे पानी) से प्रतिदिन मुखप्रक्षालन (मुँह धोना) चाहिए;
इससे दन्तपित्त रोग, नीलिका नाश होता है, तथा मुख संशोधन होता है। कटूष्ण जल
(कुछ गर्म पानी) से मुखप्रक्षालन कहते हैं। उष्ण जल (गर्म पानी) से मुख प्रक्षालन
करने से, वातनाशक, स्निग्धतादायक तथा मुखदोष नाशक प्रभाव होता है। मुखगत
दोनों के नाशार्थ सद्द्यैद्य द्वारा निर्मित औषधियो का सेवन करते है, आग्नेय औषध
बलवर्धक है॥११-१३१/२॥
ताम्बूलभक्षणविधिस्तस्य फलञ्च
ताम्बूलं भक्षयेत्पश्चाद्विजशेषं तु शोभनम् ॥ १४ ॥
तीक्ष्णोष्णं कफवातघ्नं मुखैशद्याकारकम्।
पृष्ठम् ४८
४८ क्षेमकुतूहलम्
ततोऽधिकारिणः सर्वेष्वधिकारेषु योजिताः॥१५॥
ताम्बूल भक्षण
दन्त` शेष रहे अनावश्यक पदार्थ के निष्कारनार्थ, ताम्बूल (पान) का भक्षण
(चर्वण) करना चाहिए। तीक्ष्ण-उष्ण गुणयुक्त होने से, ताम्बू कफनाशक तथा मुख
स्वच्छता कारक है। तत्पश्चात् समस्त अधिकारियों को उनके अधिकृत कार्यों हेतु नियुक्त
कर देना चाहिए॥१४-१५॥
उद्वर्त्तनाभ्यङ्गयोर्विधिः फलञ्च
ततश्चोद्वर्त्तनाभ्यङ्गं कारयेच्च यथेप्सितम्।
उद्वर्तनं कफहरं मेदःशुक्रविवर्धनम् ॥१६॥
श्रेष्ठं शोणितदं बल्यं कान्तिकृद्दोषनाशनम्।
अभ्यङ्गमाचरेत्तद्यस्तु स जराश्रमवर्जिः॥१७॥
दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुः स्वास्थ्यत्वक्पाददार्ढ्यवान्।
अद्भिः संसिक्तमूलानां तरूणां पल्लवादयः॥१८॥
वर्धन्ते हि तथा नृणां स्नेहसंसिक्तधातवः।
उद्वर्त्तनाभ्यङ्गविधान
उद्वर्तन (उबटन) तथा अभ्यंग (तैल मालिश) स्वेच्छानुसार प्रयोग करे।
उद्वर्तन- कफनाशक, मेधा-शुक्रवर्धक, रक्तवृद्धिकर, बल्य, कान्ति प्रद, दोषों
निवृत्तिकारक।
अभ्यंग- जरा-श्रमहर, नेत्रज्योतिवर्धक, पुष्टिप्रद, आयुष्य, स्वास्थ्यप्रदायक,
चर्म पाद दृढ़ता कारक। जैसे वृक्षों के पत्र (जड़ों का जल सिंचन करने से) बढ़ते हैं,
उसीप्रकार शरीर की धातु बढ़ती है॥१६-१८¹/₂॥
स्नानविधिस्तस्य फलञ्च
ततः स्नानं प्रकुर्वीत सुखोष्णेनैव वारिणा ॥१९॥
तेन गात्राभिषेकस्तु भवत्येव बलावहः।
अत्युष्णोत्तमाङ्गस्य बलहृत्केशचक्षुषाम् ॥२०॥
स्नानस्यानन्तरं सम्यग्वस्त्रेण तनुमर्दनम्।
कान्तिप्रदं शरीरस्य कण्डुत्वग्दोषनाशनम् ॥ २१॥
पृष्ठम् ४९
पञ्चमोत्सवः ४९
स्नान विधान
स्नान सुखोष्ण (कटूष्ण-हल्का गर्म) जल से करना चाहिए; यह बलवर्धक होता
है। अत्युष्णजल (बहुत गर्म पानी) से स्नान केश तथा नेत्र ज्योति नाशक है। स्नानोपरान्त
वस्त्र से भलीभाँति मर्दन (तदनुमर्दमम्), शरीर कान्ति दायक, कण्डू तथा चर्मरोग
नाशक है॥१९-२१॥
ऋतुक्रमेण वस्त्रधारणविधिस्तस्य फलञ्च
शीतकाले तु कौशेयं काषायं घर्मवासरे।
वर्षासु श्वेतवस्त्रं स्यादेवं वस्त्राणि धारयेत्॥२२॥
कौशेयं चित्रवस्त्रं वा रक्तवस्त्रं तथैव च।
वातश्लेष्महरं नृणां शीतकाले प्रधारयेत्॥२३॥
मेध्यं सुशीतं पित्तघ्नं काषायं वस्त्रमुच्यते।
तद्धारयेद् धमकाले कषायं वस्त्रं च धारयेत्॥ २५॥
ऋतु अनुसार, वस्त्रधारण
क. शीतऋतु : कौशेय (ऊर्जा-रे-शामी-गर्म कपड़े)
ख. ग्रीष्मऋतु : कषाय वस्त्र- बुद्धिवर्धक
ग. वर्षाकरण : श्वेतपत्र- सुखदायक, शीत-घर्म निवारक (न उष्ण-न शीतल-
सभी ऋतुओं में धारण योग्य)
घ. शीतकाल : कौशेय, भिन्न वस्त्र- एकवर्ण के वस्त्र कफ-वात नाशक॥२२-
२५॥
चन्दनादिलेपनविधिस्तस्य गुणाः
गन्धेनोद्वर्तनं चादौ ततो लेपं प्रकारयेत्।
कुङ्कुमं चन्दनं चैव कृष्णागुरुविमिश्रितम्॥ २६ ॥
उष्णाभावभिदं श्रेष्ठं शीतकाले तु शोभनम्।
चन्दनं चाम्बुना युक्तं कर्पूरेण विमिश्रितम् ॥२७॥
सुगन्धं च सशीलं च घर्मकाले सुशोभनम्।
चन्दनं घृसृणोपेतं मृगनाभिसमायुतम् ॥ २८ ॥
न चोष्णं न च वा शीतं वर्षाकाले प्रशस्यते।