सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 18

३० क्षेमकुतूहलम्
भोजनकाले फलभक्षणविधिः
फलमादौ ही चाश्नीयाद्भोजनस्य नरोत्तम।
बिना मोचफलं तद्वर्जनीया च कर्कटी ॥ २२ ॥
भोजनकाल में फल ग्रहण
हे नरोत्तम ! भोजन के समय (भोजन से पहले) फल भक्षण करना श्रेयस्कर है,
परन्तु मोचफल (केला) तथा कर्कटी नहीं खाना चाहिए॥२३॥
भोजनकालनिरूपणम्
याममध्ये न भोक्तव्यं यामयुग्मं न लङ्घयेत्।
याममध्ये रसोद्वेगो युग्मेऽतीते बलक्षयः ॥ २३ ॥
भोजनकाल
प्रातःकाल एक प्रहर के मध्य भोजन न करे तथा भोजन करने में दो प्रहर नहीं
व्यतीत होने दें। एक प्रहर के मध्य भोजन करने रसोद्वेग होता हैं। दोपहर के बाद भोजन
करने से बल का क्षय हो जाता है॥२३॥
मात्रापूर्वकभोजनस्य फलम्
मात्राशी सर्वकालं स्यान्मात्रा ह्यग्नेः प्रवर्त्तिका।
मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते गुरूण्यपि लघूनि च ॥ २४ ॥
अर्धं गुर्वन्नमश्नीयाल्लघुच्चन्नं नातितृप्तितः।
मात्राप्रमाणमादिष्टं सुखं येन विजीर्यते ॥ २५ ॥
भोजनं हीनमात्रं तु न बलोपचयौजसे।
सर्वेषां वातरोगाणां हेतुतां च प्रपद्यते ॥ २६ ॥
अतिमात्रं पुनः सर्वमाशु दोषं प्रकोपयेत्।
शाकं नवान्नभूयिष्ठं शीतमुष्णीकृतं त्यजेत् ॥ २७ ॥
मात्रापूर्वक भोजन
क. सदैव मात्रा पूर्वक भोजन करना चाहिए (मात्रासी सर्वकालम्)। इससे अग्नि
प्रदीप्त होती हैं। मात्रा का निर्धारण गुरु एवं लघु गुण युक्त भोज्य पदार्थों के
अनुसार होता है।
ख. गुरु अन्न सामान्य मात्रा में होना चाहिए, परन्तु लघु अन्न अधिक तृप्ति
कारक होने पर भी कुछ कम भक्षण करे।
तृतीयोत्सवः ३१
ग. मात्रा का उचित प्रमाण वही है, जिससे सुखपूर्वक अन्न का परिपाक हो
सके- यही उत्तम मात्रा है। हीन मात्रा का भोजन बल एवं ओज की वृद्धि
नहीं करता, तथा सर्ववात रोगों का कारण है।
घ. अधिक मात्रा में भोजन शीघ्र ही सभी दोषों का प्रकोप करता है।
ङ. नवीन जल अथवा कदन्न के साथ शाक का सेवन उष्णीकृत (गर्म किया अन्न
खाना हितकर नहीं होता॥२५-२७॥
अतिभोजनस्य दोषाः
अनात्मवन्तः पशुवद्बुञ्जने येऽप्रमाणतः।
रोगानीकस्य ते मूलमजीर्णं प्राप्नुवन्ति हि ॥ २८ ॥
अतिभोजन जनित दोष
जो व्यक्ति (अनात्मवन्त) असंयमवश भोजन लौल्य के कारण पशु वत् (पशुवद्बुञ्जने)
प्रमाणरहित (मात्रा की उपेक्षा करके) आहार का भक्षण करते हैं, वह रोगानीक (रोगों
के समूह) के मूल अजीर्ण से पीड़ित हो जाते हैं॥२८॥
आहारं पचति शिखी दोषानाहारवर्जितः पचति।
दोषक्षयेऽपि धातून् पचति च धातुक्षये प्राणान् ॥ २९ ॥
बुभुक्षितो न योऽश्नाति तस्याहारेन्धनक्षयात्।
मन्दो भवति कायाग्निर्यथा चाग्निरनिन्धनः ॥ ३० ॥
आहार का अग्निपाचन नियम
भक्षित आहार का पाचन जाठराग्नि द्वारा होता है, तदनन्तर दोषों का पाचन
करती है, फिर धातुओं का पाचन करके प्राण को पचाती है (धातुओं के क्षीण हो जाने
पर)। बुभुक्षा (भूख) से ग्रस्त व्यक्ति यदि पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं करता है, (ईंधन
समाप्त होने पर) भोजन मिलने के कारण जठराग्नि मन्द पड़ जाती है, जैसे ईंधन के
अभाव में अग्नि में मन्दता आ जाती है॥२९-३०॥
अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नमनम्बुपानाच्च स एव दोषः।
तस्मान्नरो वह्निविवर्धनाय मुहुर्मुहुर्वारि पिबेदभूरि ॥ ३१ ॥
भुक्तादौ सलिलं पीतं कार्श्यमन्दाग्निदोषकृत्।
मध्येऽग्निदीपनं श्रेष्ठमन्ते स्थौल्यकफप्रदम् ॥ ३२ ॥