क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयोत्सवः
(प्रकरण द्वितीय)
पुरुषार्थ चतुष्टय-अग्निपाक
धर्मार्थकाममोक्षाणां शरीरं साधनं बुधैः।
अत एवैककल्पेन सर्वैरेवाभिधीयते ॥ १ ॥
तच्च भूतमयं तानि पच्यन्ते स्वाग्निनाऽनिशम्।
देहे गच्छति गच्छन्ति सदाहारं पाञ्चभौतिकम् ।
नानाविधरसं भोक्तुमात्मा समभिकाङ्क्षति ॥ ३ ॥
तेन पूरितकोष्ठस्तु सौहित्ये सुखमाप्नुयात् ।
क. पुरुषार्थ चतुष्टय- धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष- का साधन का नाम शरीर है,
ऐसा समस्त बुद्धिमान व्यक्ति एक स्वर से कहते हैं। (अतः एवैककल्पेन सर्वे
देवाभिधीयते)।
ख. यह भूतमय (पंचामहाभूतों से निर्मित-जित-जपन्न्र) है। इनभूतों का परिपाक
जठराग्नि द्वारा निरन्तर (अवधामति) से होता रहता है। विशेषतः समस्त
देहगतभूतों का भी परिपाक होता रहता है। आहार पाँचभौतिक होता है- क्योंकि
इन भूतों का आधार आहार द्रव्यों में रहता है।
ग. आहार कर्त्ता व्यक्ति (भोक्ता) की आत्मा अनेक प्रकार के रसों की आकांक्षा करती
हैं, इन रसों से कोष्ठ की पूर्ति हो जाने पर, उस (भोक्ता) को। तृप्ति का अनुभव
होता है, जिससे सुख की अनुभूति होती है॥१-३१/२॥
रसाधिष्ठान
स्वादुत्वं षडसादीनां तेषां प्रायोऽन्नमाश्रयः ॥ ४ ॥
तच्च शाल्यादिविविधं मांसक्षीरफलादिकम् ।
किंतु व्यक्तरसं प्रायो बहुधैवोपजायते ॥ ५ ॥
आत्मा की तृप्ति कारक रों का अधिष्ठान प्रायः अन्न ही होता है, जो
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विभिन्न प्रकार के अन्न (शाल्यादि) तथा मांस, दुग्ध तथा फल आदि होता है,
परन्तु व्यक्त रस का ही ज्ञान प्रायः भोक्ता को होता है (किन्तु व्यक्त रस प्रायो
बहुधैवोपजायेत)॥४-५॥
योगक्षेम- नृपाहार
अन्नपानं विषाद्रक्षेद्विशेषेण महीपतेः ।
योगक्षेमौ तदायत्तौ धर्मांश्च प्रभवन्ति हि ॥ ६ ॥
महीपत (राजा) के आहार योग्य पदार्थों की सावधानी से विष से तथा करना
आवश्यक है, क्योंकि राजा के अधीन योगक्षेम होता है। अप्राप्त वस्तुओं की प्राप्ति
योग है तथा प्राप्त वस्तुओं संरक्षण को क्षेम कहते हैं- इससे धर्म का पालन भी
होता है॥६॥
भोजनगृहम्-स्वरूपवर्णन
गौरीमतादिलिखिताखिलपाकसंपद्-
व्यापारितौदनिकसंभ्रमपदर्शनीयम् ।
स्वप्नेऽपि वैरिजनगोचरतामयातं
चन्द्रद्रवैः सुरभितं भुजिकर्मधाम ॥ ७ ॥
आग्नेय्यां दिशि कर्तव्यमावासस्य महानसम् ।
गवाक्षजालमार्गाढ्यमर्धभित्त्युपलेपितम् ॥ ८ ॥
चुल्ली तत्र प्रकर्तव्या पूर्वपश्चिममायता ।
क. गौरीमत तथा अन्य पाकशास्त्र सम्बन्धी साहित्य (प्राचीन) में, समस्त पाक
सामग्री (वस्तुएँ/पदार्थों) तथा तत्परता से पाक-कार्य में संलग्न पाचक (रसोई
बनाने वाले) तथा स्वप्न में भी शत्रु दृष्टि से प्रतिरक्षण, कर्पूर आदि (सुगन्धित
द्रव्य) से सुगन्धित (चन्द्र द्रवैः सुरभितं) छिड़कते से भोजनालय का निर्माण
करने का निर्देश किया गया है।
ख. आग्नेय कोण भोजनालय की स्थापय की जाये; भोजनालय मे जालीदार
(गवास) खिड़की तथा अर्धनिर्मित्ति लिपी हुई (उपलेषितम्) रखी जाये। इस
भोजनालय (महानस) में पूर्व से पश्चिम की ओर मुल्ली (लम्ब चूल्हा) का
निर्माण किया जाना चाहिए॥७-८१/२॥