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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

४६ क्षेमकुतूहलम्
इत्यादिस्तततिवाक्येन यद्गृहीतं वनस्पतेः ॥ ५ ॥
प्रयच्छति भृशं कर्तुरायुःश्रीधीयशःस्थितीः ।
दन्त काष्ठ ग्रहण- वनस्पति प्रार्थना (अभिमन्त्रण)
हे वनस्पति ! आप मुझे आयु, वर्ण, यश, प्रजा, पशु, धन, ब्रह्मप्रज्ञा, मेधा
(स्मृति तथा बुद्धि) प्रदान करें। इन स्तुति वाचन से प्राप्त दन्तकाष्ठ (दन्तधावन) करने
वाले व्यक्ति को अधिकतम आयु, लक्ष्मी, बुद्धि, यश तथा स्थामित्व की प्राप्ति होती
है॥४-५१/२॥
वर्णानुसारोण दन्तकाष्ठस्य प्रमाणम्
दशाङ्गुलं क्षत्रियाणां विप्राणां द्वादशाङ्गुलम् ॥ ६ ॥
अष्टाङ्गुलं तु वैश्यानां शूद्राणां तु षडङ्गुलम् ।
दन्तकाष्ठं हि गृह्णीयात् स्त्रीणां तु चतुरङ्गुलम् ॥ ७ ॥
भक्षयेद्दन्तकाष्ठाग्रं दन्तमांसान्यपीडयन् ।
जिह्वानिर्लेखनं कुर्यात् प्राङ्मुखो वा हृदङ्मुखः ॥ ८ ॥
व्रर्ण के अनुसार दन्तकाष्ठ ग्रहण
वर्ण/जाति/लिंग दन्तकाष्ठ प्रमाण
क. ब्राह्मण दश अंगुल (१०)
ख. वैश्य द्वादश अंगुल (१२)
ग. शूद्र षडांगुल (६)
घ. स्त्री चतुरंगुता (४)
इसके पश्चात् दन्तकाष्ठ के अग्रभाग का चर्वण करके, दन्त स्वच्छता करते हैं।
तथा जिह्वानिलेँखन (दन्त काष्ठ से को चीरकर, इसके दो भाग करके) करते है जिससे
जीभ पूर्णतया स्वच्छ हो जायें तथा मल कफ रहित हो जाये॥६-८॥
दन्तकाष्ठस्याभावे दन्तधावनविधिः
अलाभे दन्तकाष्ठस्य निषिद्धदिवसेषु च ।
अपां द्वादशगण्डूषैर्मुखशुद्धिर्विधीयते ॥ ९ ॥
रसनादन्तजा रोगा वैरस्य मलसंभवः ।
न भवन्ति मुखे तेन वैशद्यं लाघव भवेत् ॥ १० ॥
पञ्चमोत्सवः ४७
दन्तकाष्ठ अभाव- दन्तधावन
यदि दन्त काष्ठ न मिल सके, तथा जब मूत धावन निषिद्ध हो, ऐसी स्थिति में
द्वादश गण्डूषो से (बारह कुल्ले करके) मुख की शुद्धि कर लें। दन्तकाष्ट के स्वाद को
ग्रहण करने से, दन्तरोग, मुख विरसता तथा मल संभाव्यता मुख से निवृत्त होती है,
तथा मुख में स्वच्छता तथा लघुता आ जाती है॥९-१०॥
मण्डूषधारणस्य फलम्
ततो गण्डूषकरणं कफकण्डूमलापहम्।
गण्डूष धारण
दन्त काष्ठ (पवन) के पश्चात् कफ, कण्डू तथा मल की निवृत्ति गण्डूष (कुल्ला)
करने से हो जाती है॥१०१/२॥
मुखप्रक्षालनविधिस्तस्य फलञ्च
मुखप्रक्षालनं कार्यं पयसा शीतलेन च ॥ ११ ॥
रक्तपित्तास्यसंशोभनीलिकाव्यङ्गनाशनम् ।
कुर्याद्दृग्पि कदुष्णेन पयसाऽऽस्यविशोधनम् ॥ १२ ॥
कफवातहरं स्निग्धं मुखदोषविनाशनम् ।
औषधं चात्र सेवेत सद्द्वैद्यप्रतिपादितम् ॥ १३ ॥
जातेरोगनिवृत्त्यर्थमाग्नेयं बलवर्धनम् ।
मुख प्रक्षालन विधान
व्यक्ति को शीतल जल (ठंडे पानी) से प्रतिदिन मुखप्रक्षालन (मुँह धोना) चाहिए;
इससे दन्तपित्त रोग, नीलिका नाश होता है, तथा मुख संशोधन होता है। कटूष्ण जल
(कुछ गर्म पानी) से मुखप्रक्षालन कहते हैं। उष्ण जल (गर्म पानी) से मुख प्रक्षालन
करने से, वातनाशक, स्निग्धतादायक तथा मुखदोष नाशक प्रभाव होता है। मुखगत
दोनों के नाशार्थ सद्द्यैद्य द्वारा निर्मित औषधियो का सेवन करते है, आग्नेय औषध
बलवर्धक है॥११-१३१/२॥
ताम्बूलभक्षणविधिस्तस्य फलञ्च
ताम्बूलं भक्षयेत्पश्चाद्विजशेषं तु शोभनम् ॥ १४ ॥
तीक्ष्णोष्णं कफवातघ्नं मुखैशद्याकारकम्।