क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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१४ क्षेमकुतूहलम्
षड्विधानां तु शाकानां द्रव्यं देयं तु मांसवत्।
अन्नजेष्वथ भक्ष्येषु किञ्चिद्धीनं तु मांसतः॥५८॥
क. दशपल मांस को पकाने हेतु, एक पल (लेह द्रव), लवण (अर्ध पल), एक
पिच्छु (एक कर्ष) वेसवार, उद्घूलन (एक टंक) की मात्रा लेनी चाहिए।
ख. मत्स्य मांस को पकाने के लिए, उपकरण द्रव्यों को मांस के व्याकरण के चौथाई
(सपाद) भाग देना चाहिए।
ग. मांस पदार्थों (अन्न निर्मित) में उपकरण द्रव्यों की मात्रा मांस से कुछ कम
(किञ्चिद्धीनं तु मांसतः) होनी चाहिये॥५६-५८॥
शिखरिणी निर्माण
शुभ्रशर्करया योज्यं निर्नीरं द्विगुण दधि।
उक्तमुद्धूलनं देयं रसालायां बुधैः स्मृतम्॥५९॥
क. शुभ्रशर्करा, दधि (द्विगुण) दो भाग जलरहित- इनका मिश्रण करके 'शिखरिणी'
का निर्माण कर लेते हैं।
ख. रसाला निर्माण हेतु शिखरिणी कथित उद्घूलन का चूर्ण मिश्रित करते हैं।
ग. यह पाकशास्त्र के विभिन्न ज्ञाताओं का मत है॥५९॥
पानक निर्माण
भूरूहाणां फलेऽम्लत्वे स्वल्पाधिक्यं हि दृश्यते।
तस्मात्तु शर्कराभागो नैकःपानेषु कथ्यते॥६०॥
सामान्यतो मयाऽप्युक्ता परिभाषाऽत्र भोजने।
न्यूनाधिका च कर्तव्या सर्वो भिन्नरुचिर्जनः॥६१॥
वृक्ष के फलों में अम्लता के परिमाण में अनार रहता है, अतः शर्करा की मात्रा
तदनुसार (बिना निर्देशनुसार) डाली जानी चाहिए।
इस प्रसंग में, परिभाषाओं (आहार सम्बन्धी) का उल्लेख किया गया है,
जिसमे न्यूनाधिक परिवर्द्धन, आहार योग्य पदार्थ सुरुचि के अनुसार, उपकरण
द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिए। यह सर्वपाक शास्त्रियों का सामान्य मत (निर्देश)
है॥६०-६१॥
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प्रथमोत्सवः १५
प्रथमोत्सनेपसंहार
इष्टदेवनमस्कारः प्रथमे वंशकीर्तनम्।
द्रव्याणां परिभाषा च, पाकरक्षा त्वथोच्यते॥६२॥
क. क्षेमकुतूहल के प्रथम उत्सव (प्रकरण) में इष्टदेव, नमस्कार, ग्रन्थरचयिता का
वंश परिचय तथा पाक द्रव्यों की विभिन्न की परिभाषाओं का वर्णन किया
गया है।
ख. आगामी (अध्याय- द्वितीय उत्सव) में पाकरक्षाविधि का वर्णन किया
जायेगा॥६२॥