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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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२८ क्षेमकुतूहलम्
व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं वेदनायाश्च निग्रहः।
एतद्वैद्यस्य वैद्यत्वं न वैद्यः प्रभुरायुषः॥ १५॥
वैद्य का ज्ञान
व्याधि (रोग के लक्षणों का ज्ञान) तथा उसको निवारण का ज्ञान होना ही वैद्य
का वास्तविक ज्ञान है (कर्तव्य वास्तविक रूपसे)। वैद्य आयु का स्वामी नहीं, बल्कि
आयु की रक्षा-विशेषरूप से गतायु की रक्षा वैद्य के वश में नहीं रहता॥१५॥
कुचैलः कर्कशो दीनो ग्रामीणोः स्वयमागतः।
पञ्च वैद्या न पूज्यन्ते धन्वन्तरिसमा अपि॥ १६॥
पंच निन्दनीय चिकित्सक
१. कुचैला, २. स्वयं आहत, ३. कठोर, ४. दीन, ५. अव्यवहारिक- यह
पाँच प्रकार के वैद्य धन्वन्तरि के समान होने पर भी सम्मान के योग्य नहीं हैं॥१६॥
सुश्रुतं न श्रुतं ये हारीतं येन हारितम्।
नालोकि चरकं येन स वैद्यो वैद्यनिन्दितः॥
सुश्रुतं न श्रुतं येन किमन्यैर्बहुभिः श्रुतैः॥ १७॥
वैद्यौं में निकृष्ट (निदनीय)
१. सुश्रुत संहिता का श्रवण नहीं किया
२. हारीत संहिता का अध्ययन नहीं किया
३. चरकसंहिता का अवलोकन नहीं किया
४. सुश्रुत संहिता को अध्ययन के बिना आयुर्वेद का ज्ञान परिपूर्ण नहीं
है॥१८॥
श्रुतचरितसमृद्धे कर्मदक्षे दयालौ
भिषजि निरनुबन्धे देहभारं निवेश्य।
भवति विपुलतेजाः स्वस्थकीर्तिप्रभावः
स्वकुशलफलभोगी भूमिपालश्चिरायुः॥ १८॥
स्वदेह के संरक्षण का भार शास्त्रानुसार आचरण करने वाले, चिकित्सा कार्य में
कुशल दयालु, निरनुबन्धन निर्दोष वैद्य के हाथों में देकर, विपुल तेज युक्त, स्वास्थ्य


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तृतीयोत्सवः २९
एवं यश से प्रभावित, एव कल्याण कारक फलों को उपभोग करने वाला राजा चिरायु
होता है॥१८॥
भोजनसमये राजानं प्रति वैद्यस्यानुशासनम्
पारंगतः सकलवैद्यकसंहितानां
सत्पाकशासनबुधो गुरुवत्प्रगल्भः।
ब्रूयादिदं नरपतेः परिवेशकाले
धन्वन्तरिप्रतिभटो भिषजां वरेण्यः॥ १९॥
राजा का भोजन काल- वैद्य का कर्तव्य
समस्त आयुर्वेद संहिताओं के कुशल ज्ञाता (पारंगत) पाकशास्त्र में रस, गुरु के
समान प्रभावशाली, धन्वन्तरि समान श्रेष्ठ चिकित्सक को चाहिए कि भोजन परोसने के
समय (परिवेशकाले) सम्बोधनात्मक वाक्यों को वैद्य को प्रयोग करना चाहिए॥१९॥
देवावधारय शुभौदनसूपसर्पिः
पटोलकं दृढफलं मृदु पर्पटं च।
मांसं च शाकसहितं शुचि पिष्टमन्नं
पक्वान्नपानकयुतं क्वथितं पयश्च॥ २०॥
हे राजन ! आपके सम्मुख विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थ (आहार भक्षण पदार्थों
के नाम) प्रस्तुत (परिवेशित) हैं, इनको आप (राजा) ग्रहण करें॥२०॥
मधुरादि रसक्रमेण भोजनस्य नियन्त्रणम्
मधुरमधुरमादौ मध्यतोऽम्लैकभावः
कटुकटुकमथान्ते तिक्ततिक्तं तथैव।
यदि सुखपरिणामं वाञ्छसि त्वं हि राजन्
त्यज खलजनसङ्गं भोजनं मा कदाचित्॥ २१॥
रसानुसार भोजन नियम
प्रारम्भ में मधुर पदार्थ, मध्य मे अम्ल पदार्थ तथा अन्त मे कटु एवं तिक्त रस
युक्त पदार्थों को भोजन में ग्रहण करे। यदि सुखकारक फल चाहते हैं। तब दुर्जनो की
संगतिका परित्याग कर दें, परन्तु भोजन की कभी उपेक्षा कही करनी चाहिए (त्यज
भोजनं मा कदाचित्)॥२१॥
क्षे. कु. 3