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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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२२ क्षेमकुतूहलम्
चाहिए। इस प्रयोजन की पूर्ण किरणे के लिए मृग, हंस, चकोर, शुक, क्रौंच,
प्लवंग, नीलकण्ठ, वध्रु प्रभृति जन्तुओं (पक्षी आदि सहित) को पाल कर
रखना चाहिए। यह धनिकों के लिए व्यवस्था है- धनियों को कोई भी वस्तु
संसार मे दुर्लभ नहीं है (किं श्रीमतां जगति दुर्लभमस्तिकञ्चित्)।
ख. यदि मृग को विषाक्त अन्न खाने को दिया जाये, तो वह शब्द करता है। या होता
है (रीति) राजहंस का विषाक्त खाने पर वह चलते (हुए) गिर जायेगा (स्खलति)।
चकोर दोनों नेत्रों को नचाता है (अक्षिद्वन्द्वं विरजतितराम्); शुक (कीरकौंची)
वमन करता है (वान्ति)। क्रौञ्च पक्षी रुदन करता है (रौति क्रौञ्च)। कपि अन्न का
पदित्याग कर देता है (विसृजति कपि), नीलकण्ठ मृत्यु को प्राप्त करता है
(ध्रीयते)। मुर्गा (दक्षवभ्रू) तथा नेवला प्रिय शब्दों (शब्द प्रीतिं सपदि सूजहाँ
दसवभ्रू विषेण)। करें बोलते लगता है।।२६-२७।।
सविषान्न-परीक्षा
ओदनो विषवान् सान्द्रो याति वैवर्ण्यमाशु हि।
चिरेण पच्यते पक्को भवेत्पर्युषितोपमः ॥ २८ ॥
विषाक्त अन्न की परीक्षा का विधान
विष मिश्रित सान्द्र (गाढ़ा) भक्त (भात) शीघ्र ही विवर्ण हो जाता है; यह पक्व
(सिद्ध) होने में सामान्य से अधिक समय होता है तथा पयुषित (वासीभात) के समान
हो जाता है।।२८।।
मयूरकण्ठतुल्योष्मा मोहमूर्च्छा विकारकृत्।
हीयते वर्णगन्धाद्यैः क्लद्यते चन्द्रिकाङ्कितः ॥ २९ ॥
मयूर कण्ठ के समान उष्ण होता है तथा मोहमूर्च्छा आदि विकारों को उत्पन्न करता
है; वह वर्ण तथा गन्ध रहित हो जाता है। चन्द्रिका के समान चिह्न युक्त हो जाता है।।२९।।
व्यञ्जानान्याशु शुष्यन्ति श्यामक्वाथानि तत्र च।
हीनातिरिक्तविकृता छाया दृश्यते नैव वा ॥ ३० ॥
विषम्मिश्रित व्यंजन तथा श्याम वर्ण के क्वाय, शुष्क हो जाते हैं; इसमें
न्यूनाधिक विकृति हो जाती है। यह छाया कम विकृति होने पर दृश्यमान होती है,
परन्तु अधिक विकृति होने पर छाया अदृश्य हो जाती है।।३०।।
द्वितीयात्सवः २३
फेनोर्ध्वराजिसीमन्ततन्तुबुद्बुदसंभवः ।
विच्छिन्ना विरसा रागाः खाडवाः शाकमामिषम् ॥ ३१ ॥
नीला राजि रसे ताम्रा क्षीरे दध्नि च दृश्यते।
श्यावा पीता सिता तक्रे घृते पानीयसन्निभा ॥ ३२ ॥
मस्तुन्यपि कपोताभा राजी कृष्णा च सूपके।
काली गव्ये तथा क्षौद्रे हरिन्नैलेऽरुणोपमा ॥ ३३ ॥
विषमिश्रित अन्न में फेन, उर्ध्वराजि, सीमन्त, तन्तु तथा बुद्बुद की उत्पत्ति हो
जाती है। राग, खाडव, शाक तथा मांस छिन्न-भिन्न तथा रस रहित (विरस) हो जाते हैं।
रस में नीलमणि (देखा या लकीर), दुग्ध-दधि में ताम्रवर्ण की राजि हो जाती
है। तक्र में श्याव, पीत वर्ण तथा श्वेत वर्ण की राजि (देखा); घृत में पानी के समान
राजि-मस्तु में कपोताभा राजि, सूप (दाल) में कृष्ण वर्ण की राजि, गव्य (दधि)
में कृष्ण रेखा तथा मधु में हरित वर्ण तथा तैल में अरुण वर्ण की राजि (रेखा) हो जाती
है।।३१-३३।।
पाकः फलानामामानां पक्वानां च विशीर्णता।
द्रव्याणामाद्र्रशुष्काणां वैपरीत्यं तु जायते ॥ ३४ ॥
मृदुनां कठिनानां च भवेत्स्पर्शविपर्ययः ।
माल्यस्य स्फुटिताग्रत्वं म्लानिर्गन्धान्तरोद्भवः ॥ ३५ ॥
श्याममण्डलता वस्त्रे सादनं तन्तुपक्ष्मणाम्।
धातुमौक्तिककाष्ठाश्मरत्नादिषु मलाकृतिः ॥ ३६ ॥
स्नेहे स्पर्शप्रभाहानिः सप्रभत्वं तु मृन्मये।
क. आम फल (कच्चे) फल पक्व हो जाते हैं, पक्व फल विदीर्ण हो जाता है
(गल)। शुष्क तथा आर्द्र द्रव्यो मे विपरीत स्थिति आ जाती है मृदु द्रव्य कठोर
तथा कठोर द्रव्य मृदु हो जाते हैं।
ख. पुष्पमाला के अग्रभाग स्फुटित हो जाते हैं, मलिनता तथा गंध उत्पन्न हो जाती
है। वस्त्र में श्याम वर्ण के मण्डल (धब्बे) तथा तन्तुओं के पक्ष्म (लोभ) शिथिल
हो जाते हैं।
ग. धातु, मुक्ता, काष्ठ, पाषाण एवं रत्न आदि तथा इनसे निर्मित पात्रो मे मलिनता
आ जाती है। स्नेह में स्पर्श तथा प्रभा की हानि हो जाती है, मृत्तिका पात्र मे