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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 12

क्षेमकूतूहलम् द्वितीयोत्सवः १९
१८
भोजन पाक पात्र विवरण
मृन्मयादीनि भाण्डानि क्षालितानि च वारिण ॥ ९॥
तेषु यत्पच्यते द्रव्यं गुणवत्सर्वसंमतम्।
मृदभावे पचेल्लौहे चक्षुर्र्शोविकारनुत् ॥ १० ॥
कांस्यजे पाचितं यद्धि तद्धितं मतिदं शुचि।
यच्च ताम्रमये सिद्धं न रुच्यं त्वम्लपित्तकृत् ॥ ११ ॥
सौवर्णे राजते पाच्यमाढ्यभूमिभृतां गृहे।
तत्पात्रं सर्वदोषघ्नं धिषणोत्सवदायकम् ॥ १२ ॥
१. मृत्तिकापात्र (क्षलितानि वारिणा- : भोजन रुचिकर तथा अनेक गुणवान्
जल से धोते हुआ)
२. मृत्तिका पात्र के अभाव में लौह : वेग रोग तथा अर्श अशुरु
(धातु) का पात्र
३. कांस्य पात्र में पक्व आहार : हितकारी, बुद्धिप्रदाता एवं पवित्र
(मतिदं शुचि)
४. ताम्रपात्र में पक्व आहार : अरुचिजनक, अम्लपित्त कारक (न रुच्यं
स्वम्लपित्तकृत्)
५. धतिक तथा राजा के गृह/प्रसार) : (चूर्ण-रजत पात्र में भोजन पाक हितकारी।
में भोजन पाक सर्वदोषहार एवं बुद्धि प्रदाता (धिषणोत्सव
दायकम)।।९-१२।।
संकीर्णे पात्रसंसारे मार्गे वा ग्रामवर्जिते।
स्थापयेद्गुणवान् सूदः सिद्धान्नं पात्रकान्तरे ॥ १३॥
भक्तः स्वपात्रके स्थाप्यो न स्थाप्यः पात्रकान्तरे।
घृतं काष्ठायसोः स्थाप्यं मांसं मांसभवं रसम् ॥ १४ ॥
स्थापयेद्राजते हैमे पात्रे लोहेऽथ काष्ठजे।
पत्रादिषड्विधं शाकंर स्थाप्यं काष्ठाश्मलोहजे ॥ १५ ॥
पक्वान्नं पिष्टजं भक्ष्यं स्थाप्य कांस्येऽथ दारुजे।
धारजेत्सुश्रुतं क्षीरं पार्थिवे वाऽथ काष्ठजे ॥ १६ ॥
पानीयं पायसं तक्रं मृन्मयेष्वेव धारयेत्।
काचजे स्फटिके वाऽथ वैदूर्यादिविचित्रिते ॥ १७ ॥
धारयेत्सर्वदा पात्रे रागखाडवसट्टकान्।
उक्तपात्रान्तरे स्थाप्यं यद्द्रव्यं तद्रुजापहम् ॥ १८ ॥
सर्वदा सुखदं हृद्यमन्यथा दोषमर्हति।
क. जब भोजन पक जाये, तब संकार्ण पात्र समूह वाले, ग्रामवर्जित म्यान मे
गुणवान् पाचक का पक्व (सिद्ध) अन्न की अन्य (दूसरे) पात्र में रख रखना
चाहिए।
संकीर्ण पात्र समूह, ग्रामवर्जित (मार्गाविरुद्ध) स्थान में गुणवान् पाचक पक्व
(सिद्ध) अन्न को अन्य (उपयुक्त) पात्र में स्थान्तरित करते (सर्वदते) है। भक्त
(चावल के भात को) पृथक् पात्र में रखने की आवश्यकता नही होती। घृत के
लिए काष्ठ या लौह पात्र अनुक्त है। मांस या मांस रस के लिए रजत, सीसक,
स्वर्ण, लौह तथा काष्ठ का पात्र उचित है। पत्र कन्द आदि यह प्रकार (षष्ठ
शाको) को काष्ठ, पाषाण तथा लौह पात्र में रखना उपयुक्त है।
ख. पिष्टण पक्वान्न (पिट्ठी से निर्मित सिद्ध अन्न आहार प्रेरण) पदार्थों को कांस्य एवं
काष्ठ, पात्र में रखना उपयुक्त है। उष्ण (तप्त) दुग्ध मृत्तिका या काष्ठ पात्र मे
रखते है। जल, क्षीरिका (खीर), तक्र आदि मृत्तिका पात्र मे (मृन्मय) रखा जाता
है। राग, खाडव एवं सट्टक आदि पदार्थों को कांच कांस्य (सीसक) स्फटिक,
वैदूर्य से निर्मित पात्रों में रखना उपयुक्त है।
ग. इस रीति से दूसरे-उपयुक्त पात्रों में स्थान्तरित (रखा गया) आहार योग्य पदार्थों
से रोगों का नाश होता है (सर्वदा रुजापहम् सुखदं हृद्यं दोषमर्हति) सुखकारक
एवं हृदय के लिए लाभकारी होता है, परन्तु विपरीत क्रम (शास्त्र मे वर्णित
विधि के विरुद्ध) पक्वान्त पदार्थ (देखकर)- भोजन करने से, शरीर मे दोषो
की उत्पत्ति करके विभिन्न प्रकार के रोग का कारण बनते है।।१३-१९'/२।।
महानस उपकरण स्थापन
वस्तूनि भोजनाहीणि विविच्यानि पुनः पुनः ॥ १९ ॥
सर्वाणि गुणयुक्तानि स्थापितानि महानसे।
दास्यासामार्जनी वाटी, पूतहण्डी सुकूर्चिका ॥ २० ॥