सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 27

पृष्ठम् ४८

४८ क्षेमकुतूहलम्
ततोऽधिकारिणः सर्वेष्वधिकारेषु योजिताः॥१५॥
ताम्बूल भक्षण
दन्त` शेष रहे अनावश्यक पदार्थ के निष्कारनार्थ, ताम्बूल (पान) का भक्षण
(चर्वण) करना चाहिए। तीक्ष्ण-उष्ण गुणयुक्त होने से, ताम्बू कफनाशक तथा मुख
स्वच्छता कारक है। तत्पश्चात् समस्त अधिकारियों को उनके अधिकृत कार्यों हेतु नियुक्त
कर देना चाहिए॥१४-१५॥
उद्वर्त्तनाभ्यङ्गयोर्विधिः फलञ्च
ततश्चोद्वर्त्तनाभ्यङ्गं कारयेच्च यथेप्सितम्।
उद्वर्तनं कफहरं मेदःशुक्रविवर्धनम् ॥१६॥
श्रेष्ठं शोणितदं बल्यं कान्तिकृद्दोषनाशनम्।
अभ्यङ्गमाचरेत्तद्यस्तु स जराश्रमवर्जिः॥१७॥
दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुः स्वास्थ्यत्वक्पाददार्ढ्यवान्।
अद्भिः संसिक्तमूलानां तरूणां पल्लवादयः॥१८॥
वर्धन्ते हि तथा नृणां स्नेहसंसिक्तधातवः।
उद्वर्त्तनाभ्यङ्गविधान
उद्वर्तन (उबटन) तथा अभ्यंग (तैल मालिश) स्वेच्छानुसार प्रयोग करे।
उद्वर्तन- कफनाशक, मेधा-शुक्रवर्धक, रक्तवृद्धिकर, बल्य, कान्ति प्रद, दोषों
निवृत्तिकारक।
अभ्यंग- जरा-श्रमहर, नेत्रज्योतिवर्धक, पुष्टिप्रद, आयुष्य, स्वास्थ्यप्रदायक,
चर्म पाद दृढ़ता कारक। जैसे वृक्षों के पत्र (जड़ों का जल सिंचन करने से) बढ़ते हैं,
उसीप्रकार शरीर की धातु बढ़ती है॥१६-१८¹/₂॥
स्नानविधिस्तस्य फलञ्च
ततः स्नानं प्रकुर्वीत सुखोष्णेनैव वारिणा ॥१९॥
तेन गात्राभिषेकस्तु भवत्येव बलावहः।
अत्युष्णोत्तमाङ्गस्य बलहृत्केशचक्षुषाम् ॥२०॥
स्नानस्यानन्तरं सम्यग्वस्त्रेण तनुमर्दनम्।
कान्तिप्रदं शरीरस्य कण्डुत्वग्दोषनाशनम् ॥ २१॥


पृष्ठम् ४९

पञ्चमोत्सवः ४९
स्नान विधान
स्नान सुखोष्ण (कटूष्ण-हल्का गर्म) जल से करना चाहिए; यह बलवर्धक होता
है। अत्युष्णजल (बहुत गर्म पानी) से स्नान केश तथा नेत्र ज्योति नाशक है। स्नानोपरान्त
वस्त्र से भलीभाँति मर्दन (तदनुमर्दमम्), शरीर कान्ति दायक, कण्डू तथा चर्मरोग
नाशक है॥१९-२१॥
ऋतुक्रमेण वस्त्रधारणविधिस्तस्य फलञ्च
शीतकाले तु कौशेयं काषायं घर्मवासरे।
वर्षासु श्वेतवस्त्रं स्यादेवं वस्त्राणि धारयेत्॥२२॥
कौशेयं चित्रवस्त्रं वा रक्तवस्त्रं तथैव च।
वातश्लेष्महरं नृणां शीतकाले प्रधारयेत्॥२३॥
मेध्यं सुशीतं पित्तघ्नं काषायं वस्त्रमुच्यते।
तद्धारयेद् धमकाले कषायं वस्त्रं च धारयेत्॥ २५॥
ऋतु अनुसार, वस्त्रधारण
क. शीतऋतु : कौशेय (ऊर्जा-रे-शामी-गर्म कपड़े)
ख. ग्रीष्मऋतु : कषाय वस्त्र- बुद्धिवर्धक
ग. वर्षाकरण : श्वेतपत्र- सुखदायक, शीत-घर्म निवारक (न उष्ण-न शीतल-
सभी ऋतुओं में धारण योग्य)
घ. शीतकाल : कौशेय, भिन्न वस्त्र- एकवर्ण के वस्त्र कफ-वात नाशक॥२२-
२५॥
चन्दनादिलेपनविधिस्तस्य गुणाः
गन्धेनोद्वर्तनं चादौ ततो लेपं प्रकारयेत्।
कुङ्कुमं चन्दनं चैव कृष्णागुरुविमिश्रितम्॥ २६ ॥
उष्णाभावभिदं श्रेष्ठं शीतकाले तु शोभनम्।
चन्दनं चाम्बुना युक्तं कर्पूरेण विमिश्रितम् ॥२७॥
सुगन्धं च सशीलं च घर्मकाले सुशोभनम्।
चन्दनं घृसृणोपेतं मृगनाभिसमायुतम् ॥ २८ ॥
न चोष्णं न च वा शीतं वर्षाकाले प्रशस्यते।