क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वारा आच्छादित आकाश धूलिका आप्र सुशोभित होता है, तथा छिन्न सम्पूर्ण विश्व विजय
की कामना करता है, इस काल को कामदेव का मित्र (स्थिर सखा) वसन्तोदय मानना
चाहिए।।१३।।
तत्र श्लेष्मा बलोपेतो रुणद्धि जठरानलम्।
रोगान् करोति बहुशस्तेन पूर्वं कफं जयेत्॥ १४॥
हरीतकी क्षौद्रयुता च सेव्या श्रमो विधेयश्च बलानुरूपः।
भृङ्गवलीकोकिलनादरम्यरामाः सुरामासहितैर्निषेव्याः॥ १५॥
वसन्तऋतुचर्या
इस काल के बलवान् होने से, जाठराग्नि मन्द होकर, अनेक रोग जनक हो
जाता है, अतः सर्वप्रथम कफ को विजित करें। मधु-हरीतकी का सेवन, बल के
अनुसार श्रम करें, सुन्दर स्त्रियों के साथ भ्रमर तथा कोकिल शब्द-गुंजरित मनोहर
आराम (बगीचे) में विहार करना चाहिए।।१४-१५।।
तीक्ष्णं रूक्षं च कटुकं कषायं तिक्तकं लघु।
सेव्यं पुराणगोधूममुद्गशालियवादिकम् ॥ १६॥
पलं मार्गं च शाशं च लावतित्तिरादिकम्।
सेव्यं सर्वरसोपेतं सुष्ठुपस्करपाचितम् ॥ १७॥
उद्वर्तनं चरेन्नित्यं दिवास्वप्नं तु नाचरेत्।
गुरु स्निग्धं च मधुरं शीतमम्लं च वर्जयेत्॥ १८॥
श्यामां प्रसन्नशशिबिम्बमुखीं विनिद्र-
पङ्केरुहाकृतिदृशं धृतचारुवेषाम्।
आलिङ्ग्य मारुतचयं, परिचुम्ब्य पित्तं,
भुक्त्वा जयेत्कफचयं स्मरमित्रकाले ॥ १९॥
१. तीक्ष्ण-रूक्ष-कटु-कषाय-तिक्त रसयुक्त पदार्थ
२. लघु द्रव्य
३. जीर्ण (पुराण) गोधूम-युद्ध-शालि आदि धान्य
४. कक्कुट, राक्ष, लावा, तित्तिर आदि जीवों के मांसरस-अच्छे उपकरणों में पका
मांस
५. नित्य उद्वर्तन- दिवा निद्रा परित्याग
६. गुरु-स्निग्ध-मधुर-शील अम्ल पदार्थों का परित्याग।
चन्द्रमावत् बिम्ब सदृश मुखयुक्त, अर्धखिले कमल के समान नेत्र, सुन्दर वेश
धारिणी श्यामा स्त्री का आलिंगन करके, वात विकारों को विजित कफ।
भलीभाँति चुम्बन से पित्तविकारों का नाश तथा उपभोग करके विकारों को विजित
करे।।१६-१९।।
ग्रीष्मलक्षणचर्यं
यत्र प्रचण्डतरचण्डकरप्रताप-
संशोषितद्रुमलतातृणवारिपूरः।
उज्जृम्भते पवनवेगविकीर्णरेणु-
च्छन्ना भवन्ति च दिशः स निदाघकालः ॥ २० ॥
ग्रीष्मऋतु
ग्रीष्मऋतुलक्षण- इसकाल में अत्युष्ण सूर्य किरणों के संताप से वृक्ष, लता,
तृणासमूह, जलाशय शुष्क हो जाते हैं, वायु के वेग से विकीर्ण रेणु उड़ती है (आच्छन्न)
तथा दिशाओं का आच्छादन हो जाता है।।२०।।
स्निग्धच्छायां गृहं सेव्यं सेव्या पथ्या गुडान्विता।
सुधौतानि च वस्त्राणि सेव्यान्यातपशान्तये ॥ २१ ॥
ग्रीष्मऋतुचर्या
इस काल में धूप (सूर्यकिरणताप) से रक्षा हेतु स्निग्ध, छायायुक्त गृह मे निवास करे।
गुड़-हरीतकी का सेवन तथा श्वेतवस्त्रों का परिधान हितकर है।।२१।।
आरामभूरूहशिरस्तरविप्रतापा
वाप्यः प्रसन्नकमलाः कमलाकराश्च।
नद्यश्च चन्दनरसो घनसारमिश्रः
सेव्याः स्त्रजो विधुरुश्च निदाघकाले ॥ २२ ॥
भोज्यं शीतं च मधुरं फलं तृष्णाहरं मधु।
स्निग्धं द्रवं रसालादिपानकं शीतलं पिबेत् ॥ २३ ॥