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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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४२ क्षेमकुतूहलम्
सक्तूनालोडितान् शीतवारिणा शर्करान्वितान्।
भक्षयेच्छीतलं वारि पिबेत्कर्पूरवासितम्॥ २४॥
आराम (बगीचे) के वृक्षों द्वारा सूर्य तप से रहित, कभी में उत्फुल कल, कोमल
वाणी, नदी, कर्पूर मिश्रित मलयागिरि चन्दन रस पुष्प की शीतलमलया चन्द्रमा की किरणों
का सेवन हितकर है।
शीतल भोजन, मधुरफल, तृष्णाहर मधु, स्निग्ध द्रव पदार्थ, श्लेष्म रसाला,
शिखरिणी आदि पानक पान, शर्करा मिश्रित शीतल जल में सत्तू तथा कर्पूर से,
सुगन्धित जलपान लाभदायक है॥२२-२४॥
ग्रीष्मतो निषिद्धाहारविहारा:
त्यजेत् कटुकतिक्तोष्णलवणाम्लविदाहकृत्।
व्यायामं शीधुपानं च भास्करस्य च दीधितिम्॥ २५॥
निषिद्ध आहार-विहार
कटु, तिक्त, लवण-अम्ल रस युक्त आहार, उष्ण, दाहजनक पदार्थ, व्यायाम,
मद्यपान तथा सेवन कर निषेध किया जाता है॥२५॥
वर्षालक्षणचर्ये
यत्रेन्द्रनीलनिभवारिधरैर्निरुद्धाः
काष्टानभश्च विमलाः कुरुते न भानुः।
अम्भःसमीकृतमरुस्थलनिन्र्गाभिः
श्यामैस्तृणैरभिनवैः खलु सा च वर्षा ॥ २६ ॥
वर्षार्ऋतु लक्षण
नीलकान्तमणि के समान मेघों से आच्छादित दिशाओं एवं आकाश को सूर्य स्वच्छ
करने मे असमर्थ रहता है; जल से मरुस्थल एवं पर्वतीय नदियाँ समान हो जाती है; नवीन
श्यामवर्ण मे तृणों की उत्पत्ति हो जाती है- इसे वर्षा ऋतु कहते हैं॥२६॥
सशीकरमरुत्स्पर्शधरणीवाष्ययोगतः ।
सविषाविलतोयैश्च दोषाः चयस्तत्र कोपिनः॥ २७॥
जलकणों से युक्त वायु के स्पर्श तथा पृथ्वी के वाष्प के संयोग, विषयुक्त एवं
अविल (गन्दा) जल दोषों (वात-पित-कफ) का प्रकोप हो जाता है॥२७॥


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चतुर्थोत्सवः ४३
पथ्या सैन्धवसंयुक्ता सेव्या गेहं समुन्नतं।
शुष्कं प्रकाशवच्चित्रं सर्वतोऽगुरुधूपितम् ॥ २८॥
वर्षार्ऋतुचर्या- आहार-विहार
सैंधव लवण तथा हरीतकी का सेवन, शुष्क-प्रकाश युक्त-चित्रित सर्वत्र अगर
तथा धूप से सुगन्धित उच्च में निवास करना चाहिए॥२८॥
स्निग्धमम्लं सलवणं पलं शालियवादिकम्।
मस्तुसैन्धवसंयुक्तं पञ्चकोलावचूर्णितम् ॥ २९॥
क्वथितं च निषेवेत दिव्यं कौपं जलं पिबेत्।
भवेद्यानैकगमनः शुष्कधूपितवस्त्रवान् ॥ ३० ॥
स्निग्ध-अम्ल-लवण, शालि-भवादि, मस्तु सैन्ध, पंचकोल-चूर्ण मिलकर सेवन,
आकाश-कूप समित जलपान, शुष्क सुगन्धित वस्त्र धारण तथा अनेक गमन (सवारी
से योग्य)॥२९॥
निषिद्ध आहार-विहार
सर-नदी-वापी का जल स्नान, पान वर्जित; दिवाशयन, परिश्रम तथा घर्म (धूप)
सेवन वर्जित॥३०॥
सरोनद्यादिसलिलं स्नानपाने विवर्जयेत्।
दिवास्वप्नं श्रमं घर्मं प्रावृट्काले न सेवयेत् ॥ ३१ ॥
शरत ऋतुचर्या- आहार-विहार
नदी, वर्षाकालीन संचित पित्त शरद मे प्रकुपित; शर्करा सहित हरीतकी सेवन।
कषाय-मधुर-तिक्त रसयुक्त पदार्थ, शीतल जल, पशु मांस, शालि-मुद्ग, शर्करायुक्त
दुग्ध; आमलकी आमलकी-पटोल-गौ दधि-घृत, गुड निर्मित मिष्ठान्न, नदी जल तथा
चन्द्रमा किरणों का सेवन हितकर॥३१॥
अथ शरल्लक्षणचर्ये
यत्रोज्वला जलमुचो विकचेन्दुबिम्ब-
तारं नभो विकचनीरजकैरवाणि।
नाराणि मानसनिभानि सतां विभान्ति
काशानि कीर्तिसदृशानि च सा शरत्स्यात् ॥ ३२ ॥