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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 22

क्षेमकुतूहलम् - चतुर्थोत्सवः (पृष्ठ ३८)

३८ क्षेमकुतूहलम्
से (खण्डित ईर्ष्या से क्रुद्धनायिका के, मुख के समान) प्रसन्न करने वाला; प्रियंगु-
पुन्नाग- लोध्ररजकणों से युक्त हिमार्ड्र वाए, आकाश आच्छादक अपने मार्ग से बहता
रहता है- धूम समूह से आच्छादित काल को हेमन्त ऋतु कहा जाता है।।३-४।।
नीहारानिलसंस्पर्शाद्द्बलवान् मारुतो यतः।
अतो हेमन्तसमये सेव्या शुण्ठ्या हरीतकी ॥ ५॥
तिलतैलेन शिरसो गात्रस्याभ्यङ्गमाचरेत् ।
सेवेतादित्यकिरणान्निर्धूमकहुताशनम् ॥६॥
आच्छादयेच्च कौशेयं प्रावारं चित्रमम्बरम् ।
कार्पासकं नवं सेव्यं गृहं चागुरुधूपितम् ॥ ७ ॥
हेमन्तचर्या
तुषारयुक्त वायु के स्पर्श से वात बलवान हो जाता है, अतः शुण्ठी के साथ हरीत
की सेवन का विधान है; धूम रहित अग्नि का सेवन, तिलतैल का शिर एवं शरीर पर
अभ्यंग, सूर्यताप (किरण) से ऊष्मा लाभ लेते हैं। उपयुक्त वस्त्रों से शरीर का आच्छादन,
धूप आदि सुगंधि नवीन निवास स्थान में वास करना चाहिए।।५-७।।
हेमन्ते कुटुतिक्तोष्णमम्लक्षारघृतं दधि।
गोधूमतिलमापेक्षुविकारान् भक्षेद्वहून ॥ ८ ॥
औदकानूपमांसानि कौलब्रध्रप्रलेहितान्।
हेमन्ते सेवयेन्नित्यमाशु शीतार्तिशान्तये ॥ ९ ॥
हेमन्त आहार
कटु-तिक्त-अम्ल रसयुक्त, उष्ण पदार्थ, क्षार, घृत, दधि, गोधूम तिल, माष
तथा इक्षुविकार (पकवान) का सेवन हितकर है। शीतजन्य कष्ट निवारणार्थ
औदक-आनूपज जन्तु मांस, नदी तट पर सूर्यप्रकाश तथा प्रलेह का सेवन करना
चाहिए।।८-९।।
कस्तूरिकागरुविमिश्रितकुङ्कुमार्ड्र-
देहां निषेव्य रमणीं रतिखेदखिन्नः ।
शेते कृती हिमविशालनिशागमेषु
तारुण्यपीनकुचयोगनिरस्तशीतः ॥ १० ॥


क्षेमकुतूहलम् - चतुर्थोत्सवः (पृष्ठ ३९)

चतुर्थोत्सवः ३९
हेमन्तचर्या
कामदेव से पीड़ित (रतिखेदखिन्नरमणी) तरुणी के कठोर स्तनों के संयोग से
शीतलता को निवारण किया हुआ, विद्वान कस्तूरी तथा अगरु मिश्रित केशर से आर्द्र
शरीर युक्तरमणी के आलिंगन सहित रात्रि को मुखपूर्वक शयन करना चाहिए।।१०।।
अथ शिशिरलक्षणचर्ये
यत्रामृतद्युतिकरव्रजसन्निकाशै-
र्व्योमा दिशश्च विदिशश्च तुषारजालैः ।
रुद्धं नभश्च हिमपीडितवच्च वह्ने-
राशामुपैति तपनः शिशिरः स कालः ॥ ११ ॥
शिशिर ऋतु
क. शिशिर ऋतु लक्षण-चन्द्रमा की किरण समूहों के समान तुषारकाल में
दिशायें, निकासों के कोण व्याप्त होकर, शीत से व्यथित जैसा आकाश अवरुद्ध हो जाता
है; सूर्य उत्तर दिशा (उत्तरायण) में पहुंच जाता है- इस काल को शिशिर ऋतु कहा जाता
है।।११।।
हिमोक्तचर्या शिशिरेऽपि कार्या पथ्या च सेव्या सह पिप्पलीभिः ।
पिष्टान्नकं सूरणशृङ्गवेरमिश्रं सदा संवटिकादिसेव्यम् ॥ १२ ॥
शिशिर ऋतुचर्या
हेमन्त ऋतु के समस्त आचरण पालनीय, हरीतकी-पिप्पली का सेवन, पिष्टान्न,
सूरण, आर्द्रक मिश्रित संवटिका आदि व्यंजनों का प्रयोग हितकर है।।१२।।
वसन्तलक्षणचर्ये
यत्रागस्त्यहरित्प्रवृत्तपवनव्याधूतचूतव्रजा-
रामोदारपरागपुञ्जपिहितं व्योमापि संराजते ।
छिन्नं रेणुचयैरिव स्मरविभोर्यत्रोद्धतैरिच्छतो
जेतुं सर्वजगन्ति स स्मरसखो ज्ञेयो वसन्तोदयः ॥ १३ ॥
वसन्त ऋतु लक्षण
अगस्त्य के पीत वर्ण हो जाने से, प्रवृत्त वायु के झोके से, आम्र के मनोहर पराग