सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 8

१० क्षेमकुतूहलम्
हिंगु, तैल, लवण, जल तथा अन्य वस्तुये अनुक्त (अवर्णित)- परम्परागत तथा
आप्त निर्देशानुसार विभिन्न पदार्थों को समस्त प्रकार के व्यंजनों (आहारयोग्य निर्माण
एवं खाद्य) मे डालना चाहिए (आवश्यकतानुसार)।।३८ १/२।।
दलितं खण्डितं कृत्तं पौलितं तु विवेचितम् ॥ ३९ ॥
वान्रारितं शोधितं च खण्डः पयार्यवचकाः।
भर्जितं तपितं भ्रष्टं तान्दूरं ताविकं तथा ॥ ४० ॥
शालिक्यं तलितस्यैते शब्दाः पर्यायवाचकाः।
१. दलित ५. विवेचित
२. खण्डित ६. वान्रारित (यह समस्त अष्ट (आठ) पर्यायवाची
३. कृत्त ७. शोधित (क्रियाबोधक) शब्द होते हैं)
४. पौलित ८. खण्ड
आहार पाक- पर्यायवाची (क्रियाबोधक) शब्द-
१. भर्जित ५. ताविक
२. तर्पित ६. शालिक्य
३. भ्रष्ट ७. तलित
४. तान्दूर
वर्णकरणम्
वर्णस्य करणे देयं कुङ्कुमं रक्तचन्दनम् ॥ ४१ ॥
ताम्बूलं यत्र यद्युक्तं तच्च तत्र प्रयोजयेत्।
कुंकुम (केशर), रक्तचन्दन एवं ताम्बूल, इन समस्त द्रव्यों को जो कहाँ उपयुक्त
(आवश्यक) हो, वहाँ (आहार द्रव्यों के निर्माणार्थ/पाकार्थ) के वर्ण-करण (रंगीन
बनाने) हेतु प्रयोग में लाना वांछनीय है।।४१ १/२।।
वेसवार निर्माण
हिङ्गवार्द्रमरिचं जीरं हरिद्रा धान्यकं तथा ॥ ४२ ॥
क्रमेण वर्धितं सर्वं वेसवारमिदं शुभम्।
स्तोकेन वारिणा सर्वं वण्टितं वस्त्रगालितम् ॥ ४३ ॥
मात्रया व्यञ्जने देयं कासमर्द च तत्स्मृतम्।


प्रथमोत्सवः ११
तत्सनेहे पचेत्पूर्व वेसवारकसंज्ञकम् ॥ ४४ ॥
पाकप्रापितसौरभ्यं करालं सूपकैर्मतम्।
क. हिंगु, आर्द्रक, जीरक, मरिच, हरिद्रा, धान्यक- इन द्रव्यों को क्रमशः वृद्धि
करके (मिलाकर) निर्मित द्रव्य को 'वेसवार' कहा जाता है- यह 'वेसवार' की
मूलतः परिभाषा (मसाला आदि अन्य प्रचलित नाम) है।
ख. इस वेसवार को किंचित् जल देकर, शिलापिष्ट (सील पर पीसकर) तथा
वस्त्रगालित (कपड़े से छानकर) करके के पाकार्थ, आहार व्यंजनो में प्रयोग
करना चाहिए एवं उपयुक्त है।
ग. वेसवार कासमर्द भी कहा जाता है। इस वेसवार को सर्वप्रथम उष्ण घृत तथा
तैल में पाक करते हैं, तदुपरान्त सुगंध आने पर (उग्र गंध) उनम निर्मित
'वेसवार' मानना चाहिए। ऐसा मत पाक निर्माताओं (सौरम्य, कराल तथा रूपक
आदि) का है।।४२-४४ १/२।।
दाडिमी रस निर्माण
दाडिमे घृतसंतप्ते तक्रं तत्र विनिःक्षिपेत् ॥ ४५ ॥
ततः पक्वं पटे पूतमिति स्याद्दाडिमीरसः।
दाडिमे के बीज (अनारदाना) निष्कासित कर घृत में पाक करते हैं, फिर उसमें
तक्र (मट्ठा) डालकर भलीप्रकार पाक करते हैं- इसको वस्त्रगलित (कपड़े से छान लेते
हैं) करके निर्माण करते हैं- इसे 'दाडिमी रस की संज्ञा दी जाती है।।४५ १/२।।
उद्धूलन निर्माण
एलालवङ्गकर्पूरकस्तूरीमरिचत्वचम् ॥ ४६ ॥
चूर्णमुद्धूलनं देयं भोज्ये क्षीरेक्षुसम्भवे।
व्यञ्जनेषु च सर्वेषु शाकजेष्वन्नजेषु च ॥ ४७ ॥
मांसमत्स्यभवेष्वेवं प्रलेहतलनादिषु।
आदावेव पचेत्स्नेहं ततो हिङ्ककं क्षिपेत् ॥ ४८ ॥
वेसवारं सलवणं क्षिप्त्वा तत्पिशितं पचेत्।
अर्धस्विन्ने क्षिपेत्क्रमथवा दाडिमीरसम् ॥ ४९ ॥
सिद्धपाके च दातव्यं चूर्णमुद्धूलनस्य च।