क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ क्षेमकुतूहलम्
जलपान विधान
क. अधिक जलपान करने से अन्न का पाचन नहीं होता, या किंचित् जलपान करने से भी
पाचन ठीक प्रकार से नहीं हो पाता- इससे दोष का पाचन प्रारम्भ हो जाता है, अतः
आहार का खाते समय, थोड़ा-थोड़ा (मुहुर्वारि पिबेत्) पानी पीते रहना चाहिए।
ख. भोजन करने से पूर्व जलपान करने से, कृशता एवं मन्दाग्नि दोष हो जाता है,
भोजन के बीच (मध्य) पानी पीने से जाठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है भोजन के
अन्त में जलपान से स्थूलता तथा कफ वृद्धि हो जाती है।।३१-३२।।
तृषितस्तु न चाश्नीयात्क्षुधितो न पिबेज्जलम्।
तृषितस्तु भवेदगुल्मी क्षुधितस्तु जलोदरी॥३३॥
भोजन करने तथा जलपान करने का क्रम में व्यतिरेक होने से हानि होती है।
तृषित प्यासा (व्यक्ति) को भोजन नहीं करना चाहिए तथा क्षुदित व्यक्ति (भूखे) को
जलपान करना निषिद्ध है। तृषित व्यक्ति के भोजन करने पर गुल्म रोग की संभावना हो
जाती है; इसी प्रकार क्षुधित (भूखा) व्यक्ति यदि जलपान करता है, तब जलोदर रोग
हो जाता है।।३३।।
अत्युष्णान्नं बलं हन्ति शीतं शुष्कं च दुर्जरम्।
अतिक्लिन्नं ग्लानिकरं युक्तियुक्तं बलप्रदम्॥३४॥
अत्युष्ण भोजन जनित हानि
बहुत अधिक गर्म भोजन करने से, बल नाश होता है। शीतल तथा शुष्क अन्न
दुर्जर (देर से पचने वाला) होता है। अति आर्द्र अन्न खाने से ग्लानि (आहार में रुचि
न होना) हो जाती है। अतः युक्तियुक्त (साधारणतया समशीतोष्ण अर्थात् आवश्यकतानुसार
ठंडा या गर्म भोजन बलदायक होता है।।३४।।
तृषितो मोहमायाति मोहात् प्राणान् विमुञ्चति।
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु न क्वचिद्वारि वार्यते॥३५॥
जलपान के अभाव से हानि
तृषित (प्यासा व्यक्ति) यदि जल (पानी) पान नहीं करेगा। तब मोह (मूर्च्छा) से
पीडित हो जायेगा। मूर्च्छा होने से प्राण का विमोचन (नाश) हो जायेगा। अतः सभी
अवस्थाओं जलपान निषिद्ध नहीं हे।।३५।।
तृतीयोत्सवः ३३
चयप्रकोपोपशमा वायोग्रीष्मादिषु त्रिषु।
वर्षादिषु च पित्तस्य श्लेष्मणः शिशिरादिषु॥३६॥
ऋतु तथा दोषों की स्थिति
ग्रीष्म आदि तीन ऋतुएं में क्रमशः वायु का संचय, प्रकोप एवं उपशम होता है,
वर्षा आदि तीन ऋतुओं में पित्त तथा शिशिर आदि तीन ऋतुओं में कफ का संचय,
प्रकोप एवं उपशम होता है। इसके अनुसार वर्षा ऋतु में पित्त का संचय, शरद में प्रकोप
तथा हेमन्त में उसका उपशम होता है। शिशिर में कफ का संचय, वसन्त में प्रकोप
तथा ग्रीष्म में उपशम होता है। यह दोषों की तीनों अवस्थाओं (संचय-प्रकोप-उपशमन)
का विभिन्न ऋतुओं में सामान्यत स्थिति रहती है, जिससे स्वास्थ्य एवं विकार दोनों
प्रभावित होते हैं।।३६।।
राजन्नध्यशनं त्याज्यं त्याज्यं च विषमाशनम्।
त्यजेद्विरुद्धामाहारं तत्सर्वं दोषकारकम्॥३७॥
क. अध्यशन ] हे राजन! आहार की तीन श्रेणियां निषिद्धाहार के अन्तर्गत
ख. विषमाशन ] हैं, क्योंकि ये दोषकारक या रोगोत्पाद हैं। इन तीनो प्रकार के
ग. विरुद्धाशन ] आहार का त्याग कर देना चाहिए।
विद्यादध्यशनं भूयो भुक्तस्योपरि भोजनम्।
अकाले बहु चाल्पं वा भुक्तं तु विषमाशनम्॥३८॥
वल्लीफलैरम्लकुलत्थशाकैर्मत्स्यैः सुरामांसतिलैः करीरैः।
पिण्याकजम्बूलवणैश्च दध्ना व्यस्तैः समस्तैश्च पयो विरोधि॥३९॥
घृतं धान्यं च तक्रेण दधिमद्यैश्च कुक्कुटाः॥४०॥
कपिञ्जलो तित्तिरिलावकौ च गोधामयूराबुरुबूकतैलैः।
यथाविरुद्धाश्च तथा कपोतास्तैलेन भृष्टा अपि सार्षपेण॥४१॥
अध्यशन- भोजन करने के बार पुनः भोजन हेतु बैठ जाना, यह अध्यशन की
परिभाषा है।
विषमाशन- असमय में कभी अल्प-कभी अधिक भोजन करना, यह विषमाशन
की परिभाषा हे।
विरुद्धाहार- (क) बल्ली फल, अम्ल पदार्थ, कुलत्थ, शाक, मत्स्य, सुरा,