क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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पित्तं प्रावृट्समुत्पन्नं शरत्काले प्रकुप्यति।
तेन शर्करया सार्धं सेवनीया हरीतकी ॥ ३३ ॥
कषायं मधुरं तिक्तं शीतलं जाङ्गलं पलम्।
शालिमुद्गान्नम्अश्नीयात्पिबेद्दुग्धं सशर्करम् ॥ ३४ ॥
धात्री पटोलं गव्याज्यं सर्वभिक्षुविकरजम्।
सेव्यं नदीसरोवारि करजालं च शीतगोः ॥ ३५ ॥
शरत्ऋतु लक्षण
स्निग्ध मेघ, चन्द्रोदय बिम्ब के सामान आकाश, खिले हुए कमल-कुमुदनी युक्त
मानस, सरोवर सदृश जल एवं सज्जनों के यश के समान सुशोभित- शरत् ऋतु में होता
है॥३२-३६॥
तीक्ष्णमम्लं लवणं दधि तैलासवातपम्।
दिवास्वप्नं पुरोवातं शरत्काले विवर्जयेन् ॥ ३६ ॥
शरत ऋतु- निषिद्धाहार-विहार
तीक्ष्ण-अम्ल-लवण, दधि-तैल-मद्य, सूर्य घर्म (धूप), दिन में सोना तथा पूर्वी हवा
सेवन वर्जित॥३६॥
सर्वर्तुप्रान्त्यसप्ताहाद्भाविनो विधिमाचरेत्।
ऋतोर्लक्षणसंयोगादृतुसन्धिर्यतो भवेत् ॥ ३७॥
ऋतुसंधि
सर्व ऋतु में एक सप्ताह पूर्व, आगामी ऋतु के आचरण को प्रारम्भ कर देना
हितकर है; विभिन्न (ऋतुओं के) लक्षणों का संयोग हो जाने पर, इसका काल
(संयोजित) को 'ऋतु सन्धि' संज्ञा दी जाती है॥३७॥
स्थानं मयोक्तमृत्सुसेव्ययोग्यं सर्वस्य द्रव्यस्य गुणागुणाश्च।
ऋतूक्तभोज्यमृतुलक्षणं च त्वथोच्यते प्रत्यहकृत्यकर्म ॥ ३८ ॥
ऋतु तथा ऋतुचर्या- उपसंहार
ऋतुचर्या सम्बन्धी वर्णन किया है, आगे प्रत्यह कर्मों का प्रतिपादन पंचम उत्सव
में निहित है॥३८॥
अथ पञ्चमोत्सवः
(प्रकरण पञ्चम)
अथ दिनचर्या
प्रातःकाले समुत्तिष्ठेत्स्वस्थो रक्षार्थमायुषः।
शरीरशुद्धिं निर्वर्त्य कृतशौचविधिर्नरः ॥ १ ॥
केशपाशे प्रकुर्वीत प्रसाधन्यादिशोधनम्।
मुखस्यालोकनं कुर्याद्दर्पणेन विचक्षणः ॥ २ ॥
दिनचर्या
प्रातोत्थापन-जो व्यक्ति स्वस्थ हो, वह अपनी आयु की रक्षा के उद्देश्य से
प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त्त में निद्रा को त्याग कर, उठ जाये; वह शौचादि से निवृत्त होकर,
शरीर को शुद्ध करके, केशप्रसाधन आदि से शरीर का शोधव करता है, प्रातःकाल
मुख को दर्पण में अवलोकन करता है, वह दीर्घायु होता है॥१-२॥
दन्तधावनविधिः
ततो हि दन्तनिर्लेखं प्रकुर्याद्विधिना नरः।
क्षीरितिक्तकषायाणां द्वादशाङ्गुलमायतम् ॥ ३ ॥
कनिष्ठाग्रसमस्थौल्यं ख्यातवृक्षस्य शोभनम्।
दन्तधावन
विधिपूर्वक दन्त धावन करना चाहिए (शौचाद्रि कृत्य से निवृत्त होकर)। दुग्धयुक्त,
तिक्त-कषाय रस युक्त वृक्षों की, द्वादशांगुल अथवा कनिष्ठिका अंगुलि के अग्रभाग के
समान मोटी तथ्य सुदनानिर्वेत्वती (दन्तधावन-दातून) कर उपयोगार्थ ग्रहण करते
हैं॥३१/२॥
दन्तकाष्ठग्रहणकाले वनस्पति स्तुतिः
आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च ॥ ४॥
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते।
क्षे. कु. 4