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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 9

१२ क्षेमकुतूहलम्
क. एला, लवंग, कर्पूर, कस्तरी, मरिच तथा त्वक्- इन समस्त द्रव्यों के चूर्ण
(जिसे 'उद्धूलन' कहा गया है) को दुग्ध तथा इक्षुनिर्मित भोज्य पदार्थों में
डालना चाहिए।
ख. शाक, मांस तथा मत्स्य निर्मित समस्त आहार द्रव्यों (व्यंजनों) में इसे छोड़ते है।
इसी प्रकार प्रलेह, तलन आदि पाक निर्माण करते समय, सर्वप्रथम स्नेह पाक
करते है तथा बाद में हिंगु आदि के उदक को डालते हैं फिर वेसवार तथा लवण
(स्वादानुसार) डालकर, मांस पाक प्रारम्भ करें 'अर्धायभाव ही जाने पर तक्र या
दाडिमी रस डालते है, सम्पूर्ण पाक सिद्ध हो जाने पर, उद्धूलन चूर्ण से मिला
देते है।।४६-५०१/२।।
मान परिभाषा
द्रोणी द्रोणाढकं प्रस्थः कुडवश्च पलं पिचुः ।।५०।।
शाणको माषकश्चैव यथापूर्वं चतुर्गुणम्।
१. द्रोणी ६. पल
२. द्रोण ७. पिचु इन नव (नौ) मान की इकाइयों में
३. आढक ८. क्षाणक क्रमशः पूर्व में चतुर्गुण (चौगुने) होते है।
४. प्रस्थ ९. माषक (यथापूर्वं चतुर्गुणम्)।
५. कुडव
टिप्पणी- मान (वजन या तौल) के मागधमान, कालिंग मान आधुनिक
मान तथा प्रचलित मान होते हैं, इनकी तुलनात्मक अवलोकन किया जा सकता
है।।५०१/२।।
अग्नि का मान
प्रपाच्यं सकलं द्रव्य वह्निना स्वल्पहेतिना ।।५१।।
विना भक्तं विना क्वाथं न क्षीरं बहुवह्निना।
विभिन्न प्रकार के भस्म पदार्थों/द्रव्यों/व्यंजनों आदि में विभिन्न प्रकार
(मान/माप या समय) की अग्नि देने का विधान है- (प्रपाच्यं सकलं द्रव्य
वह्निना)
भक्त (भात) तथा क्वाथ (काढ़ा) उनको छोड़कर सभी पदार्थों को मन्द अग्नि
प्रथमोत्सवः १३
(हल्की आग या आँच) में आवश्यकतानुसार पाक किया जाने निर्देश है। दुग्ध (क्षीर)
को मन्द आदि में गर्म करना (उबालना) चाहिए।।५११/२।।
माप-परिभाषा
जल (उदक)
भक्तपाके जलं देयं तण्डुलेभ्यश्चतुर्गुणम् ।।५२।।
सूपस्य त्रिगुणं तोयं प्रदातव्यं हि मुद्गतः।
माषसूपे जलं किञ्चित्तदधिकं मुद्गसूपतः ।।५३।।
कृशरायां जलं किञ्चिद्धीनं तु मुद्गसूपतः।
व्यञ्जनानां प्रभूतानां तोयसंस्था त्वनेकधा ।।५४।।
स्वभावकठिनं किञ्चित्किञ्चिन्मृदुतरं स्मृतम्।
कठिनं बहुतोयेन मृदु स्वल्पेन पच्यते ।। ५५ ।।
क. आहार द्रव्यानुसार-
भात (चावल) का भात पकाने हेतु - चावल (ताण्डुक) से चतुर्गुण
(चौगुना) जल
माष (उड़द) पकाने हेतु - तीन गुना मूंग से (दाल से) त्रिगुण
(तिगुना) जल
कृशदा (खिचड़ी) पकाते हुए - मूँग की दाल से कुछ अधिक कम
जल (किञ्चिद्धीनम्)
ख. सामान्य जल माप- विभिन्न प्रकार के आहार-द्रव्यों (व्यंजनों) के लिए जल
की मात्रा अनेक प्रकार की रखी जाती है। कुछ द्रव्य स्वभाव से कठिन अथवा
मृदु होते है- अतः जल की मात्रा उसी प्रकार से (सम्यक्) पाक हो जाये) रखी
जाती है।
मांसपकार्थ स्नेह परिमाण निर्देश-
दिक्सङ्ख्यपलमांसस्य स्नेहमात्र पलं स्मृता।
लवणाद्यपलं देयं वेसवारं पिचु स्मृतम् ।।५६ ।।
टङ्कमुद्धूलनं च स्यादेतन्मानं तु रथ्ने।
सपादं मत्स्यमांसस्य द्रव्यं देयं तु मांसतः ।।५७।।
क्षे. कु. २