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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

[पृष्ठ २६]

क्षेमकुतूहलम्

वैद्य के गुण

कुलीनं धार्मिकं स्निग्धं सुव्रतं सन्मते स्थितम्।
अलुब्धमशठं भक्तं कृतज्ञं प्रियदर्शनम्॥५॥
मेधाविनमसम्भ्रान्तमनुरक्तं हितैषिणम्।
पटुं प्रगल्भं निपुणं दक्षमालस्यवर्जितम्॥६॥
सर्ववैद्यगुणैर्युक्तं नित्यं सन्निहितागदम्।
महानसे प्रयुञ्जीत वैद्यं तद्विद्यपूजितम्॥७॥

१. कुलीन९. कृतज्ञ१७. शाख निपुण
२. पवित्र१०. प्रियदर्शक१८. कार्यदक्ष
३. स्निग्ध११. बुद्धिमान१९. आलस्यरहित
४. सुनियमपालक१२. असम्भ्रान्त२०. वैद्य गुणों (शास्त्रों) में पारंगत
५. सुविचारशील१३. अनुरक्त२१. विभिन्न कर्म दर्शिता
६. निर्लोभ१४. हितैषी२२. सर्वथा औषध युक्त
७. शठतारहित१५. चतुर२३. अन्य गुण-विशेषतायें
८. भक्त१६. निहद

इन गुणों/वैशिष्ट्य। कार्मिक श्रेष्ठता में युक्त वैद्य महानस (भोजन पाक गृह) में नियुक्ति के योग्य होता है, क्योंकि इस प्रकार का वैद्यपूजित माना गया है॥५-७॥

वैद्यः पुरोहितो मन्त्री दैवज्ञश्च चतुर्थकः।
प्रातरेव हि द्रष्टव्या नित्यं स्वश्रेय इच्छता॥८॥

राजा द्वारा प्रातःदर्शनीय महापुरुष

१. वैद्य
२. पुरोहित
३. मन्त्री
४. ज्योतिषी

इन चार व्यक्तियों का दर्शन राजा के लिए कल्याणकारी होता है॥८॥

दैवज्ञो मन्त्रविद्वैद्यश्चतुर्थश्च पुरोहितः।
एते राज्ञासदा पोष्याः कृच्छ्रेणापि स्त्रियो यथा॥९॥

पालनार्थ राजा का कर्तव्य

इन चारों सम्मानीय व्यक्तियों (श्लोक ८) का पालन-पोषण अपनी स्त्री की भांति (कष्ट से भी) राजा को करना चाहिए॥९॥


[पृष्ठ २७]

तृतीयाेत्सवः २७

वैद्यविद्वज्जनामात्या यस्य राज्ञः प्रियंवदाः।
आरोग्यधर्मकोशाश्च प्रहीयन्ते हि सर्वदा॥१०॥

प्रियता राजा हेतु अहितकर

राजा के सम्पर्कता (राज्य मुख्यालय) में वैद्य, विद्वान तथा मन्त्री- सभी प्रियवादी हैं। (प्रियंवदाः), उस राजा का स्वास्थ्य, धर्म तथा कोश (धन-भण्डार) क्षीण होना प्रारम्भ हो जाता है॥१०॥

गतश्रीर्गणकान् द्वेष्टि गतायुश्च चिकित्सकान्।
गतश्रीश्च गतायुश्च ब्रह्मणान् द्वेष्टि भारत॥११॥

लक्ष्मी (गतश्री) नष्ट होने वाला व्यक्ति ज्योतिषी से द्वेष करता है, तथा आयु क्षीण होने पर चिकित्सक से द्वेष करने लगता है। अर्जुन, दोनों व्यक्तिगतश्री तथा गतायु ब्राह्मणों से द्वेष प्रारंभ कर देते हैं॥११॥

क्वचिद्वित्तं क्वचिन्मित्रं क्वचिद्धर्मः क्वचिद्यशः।
क्वचिदभ्यासयोगश्च नाफलं हि चिकित्सितम्॥१२॥

चिकित्सा की सर्वदा सफलता

चिकित्सक को कहीं धन, कहीं मित्र, कहीं धर्म, कहीं यश तथा कहीं चिकित्सा कर्माभ्यास- इस रीति से चिकित्सा कार्य कभी असफल नहीं जाता॥१२॥

चिकित्सितशरीरं हि न निष्क्रीणाति यो नरः।
तेन यत्क्रियते पुण्यं तत्फलं भिषगश्नुते॥१३॥

जब रोगी मनुष्य चिसित्सक को पर्याप्त पुरस्कार, (जैसे शरीर को क्रय करके) तब तक किसी भी पुण्य कार्य का फल नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में फल चिकित्सक को प्राप्त होता है॥१३॥

संचयं च प्रकोपं च प्रसरं स्थानसंश्रयम्।
व्यक्तिं भेदं च यो वेद दोषाणां स भवेद्भिषक्॥१४॥

वैद्य का दोषस्थिति ज्ञान

दोषों की संचय, प्रकोप, प्रसर, स्थान साम्प्रय तथा व्यक्ति- इन दोषो से अवस्थाओं के ज्ञाता को वैद्य कहा जाता है॥१४॥