क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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चमक (प्रभा) आ जाती है। इन वस्तुओं का विष से सम्पर्क होने पर विभिन्न
अप्राकृतिक लक्षण प्रतीत होते हैं॥३४-३६१/२॥
विषदलक्षणानि
विषदः श्यावशुष्कास्यो विलक्षो वीक्षते दिशः ॥ ३७॥
स्वेदवेपथुमान् स्तब्धो भीतः स्खलति जृम्भते।
प्राप्यान्नं सविषं वह्निरेकावर्तः स्फुटत्यपि ॥ ३८ ॥
शिखिकण्ठाभधूमार्चिरनर्चिश्चोग्रगन्धता ।
म्रीयते मक्षिकाः प्राश्य काकः क्षामस्वारो भवेत् ॥ ३९ ॥
विषदाता के लक्षण
विषदाता का मुख श्याम वर्ण तथा शुष्कता लिये हो जाता है, व्यर्थ में इधर-
उधर देखता है (विलसो वीक्षते दिशा); शरीर में स्वेद, कम्पन, जड़ता (स्थिरता),
भयभीत स्खलन नृम्भन प्रति लक्षण होते हैं। विषयुक्त अग्नि अन्न सम्पर्क में आने से
एकावर्त चटकना प्रारम्भ कर देती हैं। मोरकण्ठ के समान ज्योति तथा उग्रगंध आने
लगती है। इस विषक्ति अन्न को भक्षण करने से मक्षिका मृत्यु को प्राप्त करती है
म्रीन्यते) तथा काक क्षाम स्वर (क्षीण आवाज) हो जाते हैं॥३७-३९॥
पाकरक्षा मया प्रोक्ता तस्य स्थानं च शोभनम्।
अधातः प्रोच्यते वैद्यसूपकारगुणागुणाः ॥ ४० ॥
इति नवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्मविरचिते क्षेमकुतूहलग्रन्थे
महाननसोपयोग्योपकरणप्रशंसनं नाम द्वितीयोत्सवः।
उपसंहार 'क्षेमकुतूहम्'
इस द्वितीय अध्याय में पाक करना की विधि तथा उत्तम स्थान (शोभनम्) का
वर्णन किया गया है। आगामी अध्याय (तृती उत्सव) में वैद्य तथा सूपकार के गुण-
दुर्गुण को परिचय कराया जायेगा॥४०॥
अथ तृतीयोत्सवः
(प्रकरण तृतीय)
अथ वैद्यसूपकारप्रशंसा
राजा राजगृहासन्ने प्राणाचार्यं निवेशयेत्।
सर्वदा स भवत्येवं सर्वत्रैवाप्रमादवान् ॥ १॥
अन्नपानं विषाद्रक्षेद्विशेषेण महीपतेः।
यस्माच्च चेतोऽनित्यत्वमश्ववत्प्रथितं नृणाम्।
न विश्वसेदतो राजा कदाचिदपि कस्यचित् ॥ २॥
क. वैद्य (प्राणाचार्य) को राजा राजगृह के समीप (राजगृहासन्न) निवास की जाना
देनी चाहिए। वह सदैव प्रत्येक स्थान पर प्रमादरहित होकर (सर्वदा) इन निर्देशों
के अनुसार कार्य करे।
ख. वैद्य राजा के अन्नपान की दशा सावधानी पूर्वक प्रमादरहित होकर (शंका के
(समाधान सहित) करें। मनुष्य का चित्त (मन के समान) चंचल रहता है, राजा
किसी का विश्वास नही करे (न विश्वेषेण राजा कदाचित्)॥१-२॥
आयुर्वेदकृताभ्यासः सर्वत्र प्रियदर्शनः।
युक्तिहेततसमायुक्त एष वैद्यो विधीयते ॥ ३॥
क्रोधपारुष्यमात्सर्यमायालस्यविवर्जितम् ।
जितेन्द्रियं दयावन्तं शीलशौचक्षमान्वितम् ॥ ४॥
महानसिक वैद्यः गुणावली
१. आयुर्वेद कृतम्भास ६. दयालु
२. सर्वत्र प्रिदर्शन ७. शीतवान्
३. युक्तिवेत्ता ८. शुचियुक्त
४. क्रोध-निष्ठुर वचन-मात्सर्य आलस्य रहित ९. क्षमावान्
५. जितेन्द्रिय