क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
पृष्ठ 20, कुल 136 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ ३४
३४ | क्षेमकुतूहलम्
मांस, करीर, पिण्याक, जम्बू, लवण, दधि- इन पृथक् द्रव्यों या एक साथ मिश्रित
द्रव्यों के साथ दुग्ध विरुद्धाहार माना गया है।
कपिजंल, तित्तिर, लावा, गोधा तथा मयूर मांस को एरण्ड तैल में पकाना विरुद्ध
है। कपोत मांस को सर्षप तैल में पकाना विरुद्धाहार है।
एक साथ अनेक जन्तुओं के मांस परस्पर विरुद्ध हैं। मधु, घृत, वसा, तैल तथा
जल का यथाक्रम से विरुद्धाहार की श्रेणी में रखा जाता है॥३८-४१॥
एकध्यं बहुमांसानि विरुद्ध्यन्ते परस्परम्।
मधुसर्पिर्वसातैलपानीयानि यथाक्रमम्॥४२॥
अशीतेनाम्भसा स्नानं पयःपानं नवाः स्त्रियः।
एतद्धि मानवाः पथ्यं स्वल्पं स्निग्धं च भोजनम्॥४३॥
भोजनंबलकृत्सद्यः प्राणिनां देहधारणम्।
आयुस्तेजःस्वरोत्साहधृतिस्मृतिसुखप्रदम् ॥४४॥
पथ्य (हितकर) आहार-विहार
१. अशीति (समशीतोष्ण) जल स्नान
३. नव स्त्रिया
२. दुग्धपान
४. अल्प-स्निग्ध भोजन
भोजन से लाभ- बलवृद्धि, शीघ्र प्राणियों की रक्षा, आयु-तेज-स्वर-उत्साह-
धृति, स्मृति तथा सुखकारक॥४१-४४॥
भुक्त्वोपविशतस्तुन्दं बलमुत्तानशायिनः।
आयुर्वामकटिस्थस्य मृत्युर्धावति धावतः॥४५॥
भोजनोपरान्त कर्म
भोजन करने के बाद उपविशन (बैठने) से तुन्दीकरण (कुदर-तोंद) निकला,
उतान सोने से बल की वृद्धि तथा वामशायी (बांयी करवट) सोने से आयु वृद्धि तथा
धावन (दौड़ने) से मृत्यु भी साथ पीछा करती है॥४५॥
उपयुक्ता यत्र वयं तत्ते राजन् कदाचिदपि माभूत्।
जितशत्रोरपि नृपतेर्वद कस्यन वल्लभाः करिणः॥४६॥
पृष्ठ ३५
तृतीयोत्सवः | ३५
राजा को आवश्यकता
ऐसा नहीं भी न हो, जहाँ हम लोगों को आवश्यकता पड़े (शत्रुओं से जीते हुए
हस्ति किस राजा को प्रिय नहीं होते। राजा के यहाँ सभी सहकारी प्रिय होते हैं॥४६॥
अथ सूपकारप्रशंसा
पितृपैतामहो दक्षः शास्त्रज्ञो मिष्टपाचकः।
शौचयुक्तोऽथ भक्तश्च सूपकारः स शस्यते॥४७॥
भवेयुर्धार्मिका स्निग्धाः सूपकाराः क्रमागताः।
कृतोष्णीषाश्च शुचयस्तथा वैद्यवशस्थिताः॥४८॥
सूपकार के प्रशंसनीय लक्षण
१. पितृ-पितामह से सूपकार वृत्ति (वंशपरम्पदानुसार पाचक का व्यवसाय)
२. चतुर पाकशास्त्र विज्ञाता-स्वादुपाकी-पवित्रता से युक्त
३. स्वामिभक्त
इन गुणों तथा क्रियाशीलता से युक्त सूपकार उत्तम माना गया है।
ख. धार्मिक, कामलस्वभावी वंश परम्परागत, उष्णीष धारी, शुचिवान् तथा महानस
वैद्य के वश में स्थित (वश/ अधीनता के अन्तर्गत कार्यरत)॥४७-४८॥
अन्येऽपि तत्र ये केचिच्चरन्ति परिचारकाः।
तेऽपि चैवंविधा एव तदध्यक्षोऽपि तादृशः॥४९॥
सूदकारपरिस्तत्र प्रायो वैद्यगुणान्वितः।
तन्त्रयजनतत्त्वज्ञस्तत्प्रशासनतत्परः ॥५०॥
अन्य महानस-कर्मचारी (परिचारक)
महानस में कार्यरत अन्य कार्यकर्ता (परिचारक) पाचक के गुणो से युक्त हो।
सूपकार पति (पाचकों का स्वामी), प्रायः वैद्य-गुण युक्त तथा परिचारक के भावों का
ज्ञाता तथा अनुशासन नियन्त्रक होना चाहिए॥४९-५०॥
अन्नस्य प्रशस्तिः
जीवनं जीवनामन्नममृतं विधिपाचितम्।
तदेवाविधिना भुक्तं परिणामे विषोपमम्॥५१॥