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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

१३० क्षेमकुतूहलम्
कारवेल्लीफल
कारवेल्ली (करेला) का फल बाह्य स्वरूप में मरकत मणि के समान श्यामवर्ण,
आभ्यन्तर प्रवाल जैसा रक्तवर्ण फल, यह भोक्ता की कामना है, यह उसके प्रत्येक ग्रास
में रहे॥६६॥
कारवेल्लीफलं तक्रे स्वेदितं हिङ्गुमर्दितम्।
भर्जितं नवनीतेन सैन्धवेन समन्वितम् ॥ ६७॥
अथ कर्कोटकफलम्
विदलितमुखमीषत्कारवेलं कठोरं
पुलकितमिव तैले साधितं रामठेन।
चरितमरिचचूर्णं सैन्धवेनातिपूर्णं
पुलकितरसनाग्रं लोलतामातनोति ॥ ६८॥
१. विधि- कारवेल्लक फल को तक्र में स्वेदित (उबाल) कर, हिंगु मर्दित करके,
नवनीत के साथ भर्जित कर (भून) लेते हैं, फिर सैंधव मिश्रित करते हैं- यह
शाक निर्माण की रीति है।
२. कठोर प्रकार के कारवेल्लक का मुख काट (दलित) कर, हिंगु मिलाकर (भृष्ट)
संतप्त तैल में सिद्ध (पाक) करके सैंधव एवं मरिच चूर्ण मिलाकर शाक-
विधि को पूर्ण करते हैं। इस रीति से निर्मित शाक का आहार करने से जिह्वा
का अग्रभाग-चंचल प्रकार का-और लोलुप हो जाता है (जिह्वा लौल्य के
वशीभूत)॥६७-६८॥
कारवेल्लीफलं भेदि लघु तिक्तं च शीतलम्।
पित्तास्रकामलापाण्डुकफमेदः कृमीञ्जयेत्॥६९॥
ख. गुण-कर्म- १. भेदन (सारक-रेचक) २. लघु (सुपाच्य)
३. तिक्त ४. शीतल
५. रक्तपित्त-कामला-पाण्डु-मेदरोग-कृमिरोग
६. कफजनित विकार
अथ कर्कोटकफलम्
ईषद्विभिन्नमरिचैः परिपूर्णगर्भं
तैलेन राद्धमथ सैन्धवजातयोगम्।
अथाष्टमोत्सवः १३१
बाह्लीकयुक्तपयसा विहिताभिषेकं
कर्कोटकीफलमिदं रुचिकृन्नराणाम् ॥ ७० ॥
कर्कोटक फल
क. विधि- कर्कोटकी (कर्कोटक) फल के मुख का अल्प विदारण करके, उसके अन्दर
मरिच चूर्ण-सैंधव का पूरण करें तथा तप्त तैल में-अल्प पाक (सिद्ध) करते हैं,
तदनन्तर हिंगु युक्त जल मिलाकर पकाते हैं फिर अग्नि से हटा लें॥७०॥
फलं कार्कोटकं कुष्ठकिलासारुचिनाशनम्।
भेद्यं रुचिकरं वृष्यं कटु पाके च दीपनम् ॥ ७१ ॥
ख. गुण-कर्म- १. अरुचिहर २. भेदन
३. रुचिकर ४. वृष्य
५. दीपन ६. कटुविपाकी
अथ हरितचणकरन्थनम्
सुहरितहरिमन्थः क्षोदक्षुण्णो नखाग्रैः
प्रथममुदकसिक्तो वेसवारेण सिद्धः।
लवणमरिचसङ्गात्तैलहिङ्गुप्रसङ्गा-
च्छिखर्यति हि भोक्तुर्जाठरं मन्दवह्निम् ॥ ७२ ॥
हरितचणक-हरिमन्थ
क. विधि- हरिमन्थ (हरा चना) को फलों को ऊँगली (नख) से अग्रभाग को
विदीर्ण कर, बीजों का निष्क्रमण करें तथा कुचलें (क्षोदक्षुण्णो नखाग्रै)। जल से
प्रक्षालनोपरान्त तेल से हिंगु (भृष्टकर) पाक करते हैं, फिर लवण-मरिच का चूर्ण
मिश्रित कर देते हैं।
ख. गुण- हरिमन्थ शाक खाने से पाचकाग्नि (जो मन्द हो गयी हो) को तीव्र हो
जाती है॥७२॥
छोलाविधानकफलं परिगृह्य शुद्धं
तप्ते घृते सपचितं क्वथितोष्णाभ्याम्।
संसाधितं सुरभितं शुचिरामठेन
जिह्वातले विशति नर्तति च प्रकामम् ॥ ७३ ॥

[पृष्ठ १३२]

१३२ | क्षेमकुतूहलम्
हरितेन भृतं क्वापि निर्माणाम्छोलकं क्वचित्।
कथ्यते स्थौल्यकफकृत्किंचिद्वातकरं सरम्॥७४॥
छोला विधानफल
त्वक रहित (शुद्ध) चणक (चना)- जिसे आजकल 'छोला' आदि नामों से
जानते हैं- को संतृप्त घृत में पाक करें; शुण्ठी तथा मरिच चूर्ण की- हिंगु से सुगन्धित
कर मिला देते हैं।
यह विशिष्ट चणक (छोला) जिह्वा तल पर प्रवेश करते ही या चेष्ट नाचने लगता
हैं (जिह्वातले विशति नर्तति)- जिह्वा को स्वाद से प्रिय बना देता है (कटु-तिक्त आदि
रसों के चखने पर)।
पाकान्तर-यह छोला हरा या शुष्क चने (पानी में भिगोकर) का निर्माण किया
जाता है।
मुखगुण-स्थूलता वृद्धिकर, कफवर्धन, अल्पवात कारक तथा सर।।७३-
७४।।
अथ कार्पासफलम्
फलमथ दलशाकं स्वेदितं मुष्टिपिष्टं
क्वथिततिलजतैले हिङ्गुना लब्धवासम्।
वणफलवपत्र स्वादुतां संदधानं
भवति रुचिदमुच्चैरम्लचूर्णेन सार्धम्॥७५॥
कार्पासफल
क. विधि- कार्पास (कपास) के फलों तथा पत्रों को जल में स्विन्न (उबालकर)
करके, मुष्टि (मुट्ठी) से पीस (मसल) लेते हैं; तदनन्तर तिल के तैल में पाक
करके, हिंगु से सुगन्धित करते हैं; फिर आम्रचूर्ण (अमचूर) मिला देते हैं। यह
कार्पास फल सिद्ध हो जाता है॥७५॥
कर्पासफलमत्युष्णं कषायं मधुरं गुरु।
वातश्लेष्महरं रुच्यं विशेषेणस्थिवर्जितम्॥७६॥
ख. गुण- शाक स्वादु होते हुए भी (भोजन) में रुचि को भलीप्रकार वृद्धि करता
हैं। इसके गुण-कर्म रोगोपयोग निम्नांकित है-


[पृष्ठ १३३]

अथाष्टमोत्सवः | १३३
१. उष्ण | २. कषाय | शाक में प्रायः सभी गुण विद्यमान
३. मधुर रस | ४. गुरु | हैं, जो अस्थि-वृद्धिकृत करके पाक
५. वात-कफ नाशक | ६. रुचिकर | करते हैं (विशेषेण्यस्थिविर्णीतम्)।
अथ करीरफलम्
फलं करीरस्य हि बीजवर्जितं
संस्थापितं सोदकभाजने तु।
सुचिक्कणे चाष्टदिनं सुसंस्थितं
वृन्ताकरीत्या सुधिया विपाचितम्॥७७॥
करीरफल
क. विधि- करीर फल (बीज निष्क्रमित) को जल-परिपूर्ण स्निग्ध पात्र में अष्ट
दिनावधि तक रखने के पश्चात्, वृन्ताक शाक वत पाक करना चाहिए- यह
बुद्धिमान (सुधिया) व्यक्ति का कार्य है।
करीरं कटुकं ग्राहि फलमुष्णं रुचिप्रदम्।
कफपित्तदरं किंचित्कषायं वातहृद्धरम्॥७८॥
ख. गुण- १. कटुरस-अल्प कषाय | २. ग्राही
३. उष्ण | ४. रुचिकारक
५. कफपित्त वर्धन | ६. वातरोग हर (परम्)
अथ कपिकच्छू फलम्
कोमलं रोमरहितं स्विन्नमाज्ये विपाचितम्।
सोपस्करे सबाल्हीके सिन्धुजेन समन्वितम्॥७९॥
क. विधि- कोमल रहित फल (फली) को (जल में) स्विन्न करके, हिंगु तथा
उपस्कर (मसाला) मिलाकर घृत में पाक करते हैं, तथा सैंधव चूर्ण का मिश्रण
कर देते हैं- यह शाक का निर्माण हो गया है।।७९।।
कपिकच्छूफलं वृष्यं मधुरं बृंहणं गुरु।
स्निग्धं शीतानिलहरं दुष्टव्रणविनाशनम्॥८०॥
ख. गुण- १. वृष्य | २. मधुर
३. वल्य | ४. गुरु (गरिष्ठ)

[Page 134]

५. स्निग्ध ६. शीत
७. वातरोग नाशक ८. दुष्ट व्रणहर॥८०॥
अथ विषाणीफलम्
द्विखण्डं खण्डितं बालं फलं विषाणसंज्ञकम्।
तप्ते हिङ्गुयुते स्वाज्ये भर्जितं सैन्धवान्वित्॥८१॥
विषाणं शीतलं बल्यं पित्तघ्नं रुचिकारकम्।
पाके लघूतरं प्रोक्तं विशेषाद्विषनाशनम्॥८२॥
विषाण (विषाणी) फल
क. विधि- बालविषाणी (सिंघाड़ा) का द्विखण्ड खण्डित (दो-टुकड़ों में) करके,
हिंगु भृष्ट संतप्त घृत में, सैंधव मिलायें। इस रीति से शाक निर्माण हो गया है।
ख. गुण- १. शीतल २. वल्य
३. पित्तशामक ४. रुचिकारक
५. लघूपाकी (अत्यन्त) ६. विषनाशक (विशेषतः)
अथोदुम्बरफलम्
फलमौदुम्बरं बालमम्लतक्रेण स्वेदितम्।
वेसवारभृते स्वाज्ये पाचितं सैन्धवान्वितम्॥८३॥
शीतं कषायमधुरं रक्तपित्तप्रणाशनम्।
मूत्रकृच्छ्रहरं सम्यग्विबन्धामानकारकम्॥८४॥
उदुम्बर फल
क. विधि- उदुम्बर (गूलर) को अम्ल तक्र में स्वेदन (उबाल) कर, वेसवार
(मसाला) के साथ, घृत में पाक करके, सैन्धव चूर्ण मिश्रित कर देते हैं। इस
प्रकार उदुम्बर फल शाक का निर्माण हो जाता है।
ख. गुण-
१. शीत २. कषाय ३. मधुर रस ┐
४. रक्तपित्त शामक ५. मूत्रकृच्छ निवारक (सम्यक् रूपेण) ├ कारक
६. विबन्ध ७. आध्मान ┘


[Page 135]

अथाष्टमोत्सवः
अथार्द्रकचर्चम्
नापक्वं नातिपक्वं च खण्डितं त्वग्विवर्जितम्।
वेसवारघृतक्षारैः सिद्धं पित्ताग्निवर्धनम्॥८५॥
आर्द्रक चर्चर्
क. विधि- अर्धपक्व (नापक्वं नातिएकवं) खण्डित, त्वक (विवर्जित-छिलका) निकालकर।
वेसवार (मसाला), लवण, घृत के साथ पाक करके, सिद्ध कर लेते है।
ख. गुण- पित्त वर्धक तथा पाचकाग्नि संजनन (वर्धक)॥८५॥
अथ कर्कटीफलम्
त्वग्बीजरहिता प्रौढा गुलिकाकारखण्डिता।
तलिता सुघृते तप्ते कर्कटी वा प्रलेहिता॥८६॥
विपाण्डुखण्डं घृतदुग्धराद्धं विभावितं वल्लिशर्कराभ्याम्।
कृतैलवासं च कटूष्णमेतत्प्रतिक्षणं रोचकमादधाति॥८७॥
कर्कटी फल
क. विधि-
i) कर्कटी (ककड़ी)- त्वक् (छिलका) बीज रहित, गुलिका के आकार का खण्ड
(टुकड़ा) बनाते हैं, इसको घृत में पाक कर लेते हैं। यह कर्कटी फलशाक सिद्ध
हो गया है। इसे संतृप्त घृत में तलन द्वारा अथवा प्रलेह बनाते हैं।
ii) अपक्व कर्कटो खण्डों को दुग्ध में विभावित करके, घृत में संतप्त करते हैं, मरिच
चूर्ण तथा शर्करा मिश्रित कर सुगन्धित बना लेते हैं। एला चूर्ण भी मिलते हैं। यह
कटु सव उष्ण है। भोक्ता को प्रतिक्षण रोचक लगने लगती है॥८६-८७॥
कर्कटी शीतला रूक्षा ग्राहिणी मधुरा गुरुः।
रुच्या पित्तहरा पक्वा पाकोष्णा पित्तकृत्सरा॥८८॥
ख. गुण-
१. शीतल २. रूक्ष
३. ग्राही ४. मधुर
५. गुरु (मरिष्ठ) ६. रुच्य
६. पित्तहरा ८. उष्णपाकी
९. पित्तसंजनन १०. सरा (रेचक)

१३६ क्षेमकुतूहलम्
अथ शमीफलम्
शमीफलं कोमलबीजसंयुक्तं तप्तोदकस्वेदितमेव केवलम्।
प्रलेहयोगे विधिना विपाचितं सराजिकं वा दधिसैन्धवान्वितम् ॥ ८९ ॥
शमी फल
क. विधि- शमी (छेंकुर) के फलों को कोमल, बीजरहित को संतप्त जल में केवल
स्वेदन (उबाल) करते हैं। इसकी प्रलेह विधि से पक्व (सिद्ध) कर, राजिका चूर्ण
या दधि सैन्धव लवण का मिश्रण कर देते हैं।
शमीफलं लघु स्वादु कुष्ठार्शःकफहत्सरम्।
सुरुच्यं पित्तलं रूक्षं मेध्यं केशविनाशनम् ॥ ९० ॥
ख. गुण- १. सुपाच्य २. लघु
३. स्वादु ४. कुष्ठ-अर्शनाशक
५. कफजन्य विकार नाशक ६. सर
७. रुचिकर ८. पित्तवर्द्धक
९. रूक्ष १०. मेध्य
११. केशविनाशनम्
अथ भैरण्डम्
भैरण्डं कोमलं ग्राह्यं फलं तक्रेण स्वेदितम्।
पाचितं कटुतैलेन हिङ्ग्वार्थं प्रतापितम् ॥ ९१ ॥
कफानिलहरं वृष्यं रूक्षमुष्णं च पित्तलम्।
अग्निसंजननं रुच्यं गुरु पाकेऽतिपिच्छिलम् ॥ ९२ ॥
भैरण्ड फल
क. विधि-कोमल (भैरण्ड) फलों को तक्र में स्वेदित करें, हिंगु से भृष्ट कर सर्षप
तैल में पाक कर लेते हैं- इस रीति से भैरण्ड फल शाक सिद्ध हो जाता है।
ख. गुण- १. कफ नाशक २. वातज
३. वीर्यवर्धक ४. रूक्ष
५. उष्ण ६. पित्तसंजनन
७. पाचकाग्निवर्धन ८. रुच्य
९. गुरु (दुष्पाच्य) १०. अतिपिच्छिल


अथाष्टमोत्सवः १३७
अथ कुटजफलम्
सलिलपरिचितं मुखैकृशानोरथ मथितेन विपाचितं सुतैले।
सुलवणसहितं सहिगुवासं रुचिजनकं गिरिमल्लिकाफलं स्यात् ॥ ९३ ॥
कौटजं सुलघु स्वादु मृदु ग्राहि च शीतलम्।
ज्वरहृद्रोगपित्तासृगुदावर्ताक्ष्यशूलजित् ॥ ९४ ॥
कुटज फल
क. विधि- कुटज (कुड़ा-कोरैया) को अग्नि तप्त जल में स्वेदित (उबालकर) संतप्त
तैल में पाक करते हैं। फिर सैंधव मिश्रित कर, हिंगु धूम से पाचित-सुवासित कर
लेते हैं। यह कुटजफल शाक सिद्ध हो गया-यह रुचिकारक होता है।
ख. गुण- १. सुलघु २. स्वादु
३. मृदु ४. ग्राहि
५. शीतल ६. ज्वर
७. हृद्रोग ८. क्षत
९. अर्श १०. शूल (रोगनाशक ६-१०)
अथ कदलीफलम्
सहिङ्गुकाज्ये हि कृताधिवासं
मोचाफलं सैन्धवसारशालि।
एलामरीचप्रतिवर्धयोगा-
त्रिहन्ति मान्द्यं जठरानलस्य ॥ ९५ ॥
कादल्यं मधुरं शीतं फलं विष्टम्भि पित्तजित्।
स्निग्धं गुरुतरं दाहक्षतक्षयसमीरजित् ॥ ९६ ॥
कदली फल
क. विधि-फल (मोचाफल) त्वक (छिलका) रहित, कर्तन (काट) कर, हिंगु (भृष्ट)
आज्य (घृत) में पाक करते हैं, फिर सैंधव-एला-मरिच चूर्ण मिलाकर, शाक सिद्ध
करते हैं। यह पाचनकाग्नि को तीव्र करता (निहन्तिमान्द्य जठरान लस्य)।
ख. गुण- १. मधुर २. शीत
३. विष्टम्भि ४. पित्तजित्

१३८ क्षेमकुतूहलम्
५. स्निग्ध ६. गुरुतर
७. दाह ८. क्षत
९. समीर (वातजन्य रोग नाशक (७-९)
अथ राजमाषादिफलम्
राजमाषमकुष्ठादिफलं बीजविवर्जितम्।
पक्वं घृतेऽथ पत्रं च सर्वोपस्करसंयुतम्॥९७॥
राजमाषं सुहृद्यं च कफपित्तहरं परम्।
आध्मानवातकृद्ग्राहि तत्पत्रं तद्गुणावहम्॥९८॥
राजमाष तथा अन्य फल
क. राजमाष लोहा तथा मकुष्ठ (मोठे-वनमुद्गोकि फल-बीज बहिष्कृत- समस्त
उपस्कर (मसाले जैसे नमक हिंग सहित) डालकर, घृत में पाक करते हैं। यही विधि
(इनके) का शाक में अनुसरण की जाती है (सर्वोपस्कार संयुक्तम्)।
ख. गुण- १. हृद्य २. कफपित्त सुनिवारण
३. आध्मान ४. वातजरोगकर
५. ग्राही ६. पत्रशाक (समान गुण)
अथैरण्डफलम्
तक्रे संस्वेदितं पूर्वं बालमैरण्डजं बालमैरण्डजं फलम्।
पाचितं तिलजे तैले सर्वोपस्करसंयुतम्॥९९॥
ऐरण्डं वातजिद्बल्यं कषायं वातनाशनम्।
आमवातहरं स्निग्धं रुच्यमुष्ण तु पाचकम्॥१००॥
एरण्ड फल
क. विधि- बाल एरण्ड फलों का तक्र में स्वेदन (उबाल कर), जीरक के साथ,
घृत में लवण एवं आर्द्रक युक्त वेसवार (मसाला) मिलाकर पाक करते हैं तिल
के तैल का प्रयोग)।
ख. गुण- १. वातघ्न २. बल्य
३. कषाय रस ४. वातजित
५. आमवातनाशक ६. स्निग्ध


अथाष्टमोत्सवः १३१
७. रुचिकारक ८. उष्णवीर्य
९. पाचक
अथ कोहड
कोहडं क्षीरसंस्विन्नं घृते पक्वं सजीरके।
लवणार्द्रकसंयुक्तं वेसवारेण वेष्टितम्॥१०१॥
पित्तघ्नं मधुरं शीतं रक्तपित्तविनाशनम्।
विष्टम्भजननं हृद्यं सुरुच्यं कफदं सरम्॥१०२॥
कोहड़ फल
क. विधि- फलों को दुग्ध में स्विन्न करें (उबालें); फिर जीरक के साथ घृत में
लवण-आर्द्रक युक्त वेसवार (मसाले) के साथ पाक करते हैं- इस रीति से शाक
सिद्ध हो गया (कोहड़-मथुआ) फलों को निर्मित)।
ख. गुण- १. पित्तघ्ना २. मधुरविपाकी
३. शीतवीर्य ४. मलावरोधक विष्टम्भजनन
५. हृद्य ६. सुरुच्य
७. कफ जनन ८. क्षर (मुखविरेचक)
फलशाकाधिकार समाप्त।
अथ पत्रशाकम्
अथ वास्तुकम्
कृतयवसविवेचम्लानवास्तूंकशाकं
क्वथितमिलिततक्रं तैलहिङ्गुप्रसक्तम्।
लवणमरिचयुक्तं स्पृष्टराद्धं सफेनं
चपलयति रसज्ञां वीक्षणादेव पुंसाम्॥१०३॥
वास्तूकं पाचनं रुच्यं लघु शुक्रबलप्रदम्।
सरं प्लीहार्शः पित्तासृक्कृमिदोषत्रयापहम्॥१०४॥
क. विधि- म्लान (मुरझाये) वास्तुक (बथुआ) के क्षुपो (कृतपवस विवेचम्लान-
घासों-वितो आदि में उत्पन्न होने से) या पत्रों को, तक्र में स्विन्न (उबालकर),
तैल-हिंगु में प्रसक्त करके, लवण-मरिच-चूर्ण के साथ (फेन सहित) पाक करते

१४० क्षेमकुतूहलम्
है। (भलीभाँति पकाकर)। यह वास्तुक शाक अवलोकन मात्र से पुरुषों की जिह्वा
को चंचल वसाने की विशिष्ट प्रभाव युक्त होता है (चपलपति रसज्ञां वीक्षणादेव
पुसोम)॥१०३-१०४॥
ख. गुण-
१. पाचन
२. रुच्य
३. लघु
४. शुक्रवर्धन
५. बल्य
६. क्षर
७. प्लीहावृद्धि
८. अर्श
९. रक्तपित
१०. कृमिरोग
११. त्रिदोष हर (रोगनाशक-७-११)
अथ चौराई
आलोलितं नविनकोमलतण्डुलीय-
मुद्बाष्षितं सलिलकाञ्जिकमेलके च।
पिण्डीकृतं लवणतैलविपाच्यमेत-
न्मन्दाग्निमङ्कुरयति घृतहिङ्गुवासम्॥ १०५॥
तण्डुलीय
क. विधि- चौलाई (तण्डुलीयक) के कोमल शाकक्षुप (नवीन) को कर्त्तन कर, जल
मिश्रित कांजिक में स्वेदन (वाष्पित) करके, जल निष्कासित कर लेते है- पिण्डो
रूप में बना लेते हैं। इसे घृत तथा हिंगु-लवण के सुगन्धित रूप में पक्व कर लेते
हैं।
ख. गुण- यह (तुण्डलीयक) शाक अभिमांद्य नाशक होता है॥१०५॥
कतिपयकरमर्दकैरुपेतं
नवदलकोमलतण्डुलीयशाकम्।
तैलरसपरिपाकहिङ्गुसङ्गं
लवणविपाचितमग्निमान्द्याथि॥ १०६॥
करमर्दकयुक्त तण्डुलीय शाक
किंचित करमर्द (करौंदा) सहित नवीन पत्र (नवदल कोमल) युक्त तण्डुलीय को
स्वच्छ करके, हिंगु (भृष्ट) के साथ तैल के साथ पकाकर, सैंधव चूर्ण का (यथोचित)
मिश्रण करते हैं यह शाक मन्दाग्नि नाशक होता है॥१०६॥


अथाष्टमोत्सवः १४१
तण्डुलीयो लघुः शीतो रूक्षः पित्तकफास्रजित्।
सृष्टमूत्रमलो रुच्य दीपनो रक्तपित्तहा॥१०७॥
तण्डुलीय शाक (मुफ्त) के गुण-कर्म इस प्रकार है-
१. शीतवीर्य
२. रूक्ष
३. पित्तजन्य व्याधि
४. कफजनित रोग
५. रक्तजविकार (नाशक ३-४)
६. मलमूत्र सृष्टिकार
७. रुचिसंवर्धक
८. अग्निदीपन
९. रक्तपित्तशामक
अथ कसोंदी
पत्राधिका प्रथमकोमलकासमर्दी
दालीगलद्विमलतण्डुलपिष्टलिप्ता।
सिद्धा घृतेन मरिचैरवचूर्णिता च
जायेत साऽपि रुचिसंजननी जनानाम्॥१०८॥
कासमर्दी लघुः स्वादुः कासदोषविनाशिनी।
ग्राहिणी रक्तपित्तार्शोविषदोषहरा स्मृता॥ १०९॥
क. विधि- कासमर्द (कसोंदी) के पत्राधिका क्षुप से प्रथम को मल कासमर्दी (पत्र
द्रव्य) को चणक दाली भिष्टी तथा अमल एण्डुल (चावल) की पिष्ट (पिट्ठी) में
लिप्त करके, मरिच चूर्ण मिश्रित कर, घृत में पाक करते हैं। इस रीति से पक्व
शाक व्यक्तियों की आहारभक्षण में रुचि की वृद्धि करता है।
ख. गुण-
१. लघु (सुपाच्य)
२. कासघ्न
३. ग्राही
४. रक्तपित्त
५. अर्श
६. विषजन्य दोष (नाशक ४-६)
अथ देवदालीशाकम्
देवदालीदलं तक्रे स्वेदितं खण्डितं भृशम्।
वेसवारयुते स्वाज्ये भर्जितं हिङ्गुना दृढम्॥११०॥
देवदाजी सरा तिक्ता ह्याम्लपित्तविनाशिनी।
कुष्ठघ्नी कामलाशोथविषघ्नी च रसायनी॥१११॥
क्षे. कु. 10

व्याजैर्हसन्त्येषा हि पोयिका ॥ ११४ ॥"
Wait, after 'रालन', there is a character: is it a question mark '?' or a poorly printed 'ं'?
Look at it: it has a curved top and a dot below! It really is a question mark '?' or an anusvara with a flourish!
Wait, in line 32 of Hindi:
"पोथिका तण्डुल ग्रहण व्याज से इस प्रकार हसते हुए कहती हैं कि..."
"आलन" (or आलनं) means mixing/thickening with rice flour (आलन/आलवन).
The question mark might be a typographical query by the editor/proofreader! Often in Chowkhamba/Khemraj editions, when a reading is doubtful, they insert a '?'!
Wait, let's look at the character: it has the exact shape of '?'. Yes, it's a '?'!

Let's check line 40:
"घनाम्रतक्रपाचिता सुपोयिकाऽऽज्यभर्जिता ॥ ११६॥"
Wait, is it "घनाम्लतक्रपाचिता"?
In line 40:
"घनाम्रतक्रपाचिता" or "घनाम्लतक्रपाचिता"?
Look at the character after 'ना':
It is 'म्ल'! 'म' with 'ल' subscript!
Notice the Hindi in line 44: "घन अम्ल तक्र

पृष्ठ १४४

१४४ क्षेमकुतूहलम्
रखकर कहती है- कि मैं एकाकी हूँ, परन्तु बहुत रसों से परिपूर्ण हूँ- तथा अपने ही सुगन्ध
से समस्त व्यक्तियों को सुवासित (सुगन्धित) करती है॥११८॥
भर्जिता कटुतैलेन सिन्धुजेनावमर्दिता।
शतपुष्पा हसत्येषा परवासव्यपेक्षकम् ॥ ११९ ॥
शतपुष्पा कटुःस्निग्धा तीक्ष्णोष्णा श्लेष्मवातहा ।
रुच्या नेत्ररुजां हन्ति बस्तिकर्मणिर शस्यते ॥ १२० ॥
क. विधि- शतपुष्पा को कटुतैल (सर्षप तैल) में भर्जित (भुनी हुई), सैन्धव
मिश्रित तथा मर्दित-अन्य गंध की अपेक्षा करने पर हँसती है (हसत्येषा)।
ख. गुण- १. कटुरस २. स्निग्ध
३. तीक्ष्ण ४. उष्ण
५. कफ-वातनाशक ६. रुचिसंवर्धन
७. नेत्ररोग नाशक ८. वस्तिकर्मार्थप्रशस्त
अथ मेथिकोपहासः
स्ववासवासिता चाहं शतपुष्पा यदीरितम् ।
किं तया क्रियते भूत्या स्वेनैव स्वोपभोगिका ॥ १२१ ॥
मद्वासेनेव सकलं भोजनागारमङ्गणम् ।
वासितं मेथिका चेष्टे किं स्ववाससुवासिता ॥ १२२ ॥
मेथिका उपहास
शतपुष्पा के कहा कि मैं अपनी सुगन्ध से सुगन्धित होता है तब उस ऐश्वर्य का
क्या लगा है जब वह अपने लिए ही उपयोगी में हो। इस प्रसंग मे पुनः मेथिका ने कहा
क अपनी सुगन्ध से सुगन्धित होने से क्या मेरे सुगन्ध से सम्पूर्ण भोजनालय (महानसे
भोजनागार) तथा आंङ्गण (अङ्गणम्) सुगन्धित (वासितम्) हो जाता है (स्ववास-
मुवासिता)- यह निथिका की विशेषता-गंध सम्बन्धी है॥१२१-१२२॥
मेथीशाकं पयसि विधुतं स्वेदितं पीडितं हि
प्राज्ये स्वाज्ये जरणसहिते मेलितं भर्जितं हि।
कासोच्छ्वासं प्रसृतमधिकं कर्षितो जाठराग्नि-
र्येन प्राणं सुबहुगुणितं भक्ष भूयोऽपि भूयः ॥ १२३ ॥


पृष्ठ १४५

अथाष्टमोत्सवः १४५
मेथी
क. विधि-
१. मेथी (क्षुप/पत्र) जल में डालकर, स्वेदन (उबाल) देते हैं, फिर पीड़ित (पिण्डाकार)
निचोड़ कर, हिंगु (भृष्ट) से भर्जित करके, घृत में भूनते हैं।
२. जिस मनुष्य की पाचकाग्नि बलहीन (मन्द) हो गयी हो; तथा प्राणों को
बहुगुणित कर दिया हो, (श्वास की मात्रा में वृद्धि), वह व्यक्ति इस शाक को
भक्षण निरन्तर (भक्ष भूयोऽपि भूयः) करना चाहिए।
मेथिका दीपनी हृद्या बद्धविट्कृमिशुक्रनुत् ।
रूक्षोष्णां तत्फलं कासानिलश्लेष्मवमीञ्जयैत् ॥ १२४ ॥
ख. गुण- १. दीपन २. हृद्य
३. बद्धविट ४. कृमिघ्न
५. शुक्र सम्बन्धी विकार हर
६. मेथिका फल-रूक्ष, उष्णवीर्य, कास, वातरोग, कफज
पित्तरोग तथा वमन शान्तिकारक।
अथ काकमाचिका
काकमाचिज्नितं मृदुशाकं वोसवारमिलितेन सुवासम् ।
तप्ततैलतपनेन सुपाकं केन प्राप्य न कृतं सुखहासम् ॥ १२५ ॥
काकमाची
क. विधि-काकमाची (मकोय) का मृदु शाक, वेसवार (मसाला) सहित, तप्त तैल
में पक्व एवं सुगन्धित शाक को करना है। जिस व्यक्ति ने सुखहास (सुखपूर्वक
हँसा नहीं, इस शाक को भक्षण करके मुख (आनन्द पूर्वक मुक्त रूप) से हंस
सकता है।
काकमाची बहुगुणा कटुतिक्ता रसायनी ।
चक्षूरोगहरा हिक्कावमिहृद्रोगनाशिनी ॥ १२६ ॥
ख. गुण- १. बहुगुणा २. कटु-तिक्त
३. रसायन ४. चक्षुरोगहर
५. हिक्का ६. वमन
७. हृद्रोग (रोग नाशक- ४-७)

१४६ क्षेमकुतूहलम्

१४६ क्षेमकुतूहलम्
अथ सेहुण्डः
सेहुण्डं दलितं पत्रं स्विन्नं हस्तेन पीडितम्।
जीराज्येनाधिकं पृष्टं मणिमन्थेन मर्दितम्॥ १२७॥
सेहुण्डो रोचनस्तीक्ष्णो दीपनः कटुको गुरुः।
शूलमष्ठीलिकाध्मानगुल्मशोथोदरं जयेत्॥ १२८॥
सेहुण्ड (स्नुही)
क. विधि- इस पादप के दलित पत्रों को (जल में) स्विन्न (उबालकर), हाथों से
मसल कर, जीरक से (भर्जित या छौंककर) घृत में भून लेते हैं, और मणिमन्थ
(सैन्धव लवण) मिला देते हैं। इस रीति से शाक प्रस्तुत है।
ख. गुण- १. रुचिकर २. तीक्ष्ण
३. दीपन ४. कटु
५. गुरु ६. शल
७. अष्ठीलिका ८. आध्मान
९. गुल्म १०. शोथ
११. उदर रोग (नाशक-६-११)
द्विपत्रजातं प्रपुन्नाटशाकं
सुस्वेदितं पीडितगाढबाढम्।
ससैन्धवं राजिकया सुदघ्ना
विमर्द्य सेव्यं क्वथितेऽथ पाच्यम्॥ १२९॥
प्रपुन्नाटो लघुःस्वादुः वातश्लेष्महरः परः।
तिक्तःकण्ड्वामयहरः कासकुष्ठकृमीञ्जयेत्॥ १३०॥
प्रपुन्नाट
क. विधि- द्विपत्रजात (दोपत्तेवाले) शाक को स्विन्न (उबाल) करके (हाथ से
मसलकर), जीरक को भृष्ट (छौंक) देकर, घृत (घी) में भूनकर (भर्जित कर),
सैन्धव चूर्ण मिलाकर रखे। यह शाक का निर्माण हो गया।
ख. गुण- १. रुचिकर २. स्वादु
३. अग्निदीपन ४. कटुरसतिक्त
५. ६. सुपाच्य


अथाष्टमोत्सवः १४७

अथाष्टमोत्सवः १४७
७. वात-कफनाशक ८. कण्डू
९. कास १०. कुष्ठ
११. कृमिरोग नाशक (८-११)
अथ लुणियाशाकम्
शाकं लौणिकसंज्ञकं सुदलितं तप्ते घृते तापितं
हिङ्ग्वार्द्रेण विमिश्रितं सलवणं तक्रेण संपादितम्।
नो वा स्वेद्यमिदं सुहिङ्गुसहिते तैले सुवाघारितं
स्विन्नं तण्डुलसंयुक्तं सलवणं तक्रैर्विना पाचितम्॥ १३१॥
लौणिक
क. विधि- लौणिक (लोनी) को उबाल कर, हथों से निचोड़कर पीडित करके,
सैंधव तथा राजिका (राई) के साथ मर्दन करना चाहिए। इसका क्वाथ भी बनाते
हैं। यह शाक हींग (भृष्ट) तथा आर्द्रक के सहित तक्र के साथ लेते हैं। हिङ्गु
(भृष्ट) के साथ तैल में छौता लगाना हो निदान नहीं करना चाहिए। स्वेदन किया
लोगी का शाक तण्डुल सा लवण के साथ तक्र के बिना-पाक किया जाता है।
लोणिकं गुरु शीतोष्णं रूक्षं विष्टम्भकृत्सरम्।
दोषकृन्मधुरं पाके वातकृत्तम्लपित्तलम्॥ १३२॥
ख. गुण- १. गुरु २. शीत
३. उष्ण ४. रूक्ष
५. विष्टम्भकृत् ६. सर
७. दोषकृत् ८. मधुर
९. वातकारक १०. अम्लपित्त जनन
चणक शाक
सुकृतं चाणकं शाकं तप्ततैले सुपाचितम्।
सुतण्डुलालनयुतं हिङ्ग्वार्द्रकविमिश्रितम्॥ १३३॥
क. विधि- चणक (चने) के शाक को सुकृत (भलीभाँति काटकर), तप्त तैल में
पाक करते हैं, तथा तण्डुल (चावल) हिंगु तथा आर्द्रक मिलाकर बनाते हैं।
सशिखं चाणकं शाकमम्लतक्रेण स्वेदितम्।
सहिङ्गलवणे तैले भर्जितं नागरान्वितम्॥ १३४॥

१४८ क्षेमकुतूहलम्
शिखा के साथ चणक शाक को अम्ल तक्र में स्वेदन करते (उबालते) हैं; फिर हिंगु
तथा लवण के साथ, घृत में भर्जित कर शुण्ठी चूर्ण को मिश्रित कर देते हैं।
ख. गुण- १. दुर्जर (दुष्पाच्य) २. वातकारक
३. विष्टम्भकारक (पुष्परहित शाक) ४. हृद्य
क्षाराम्लभावसहजाश्चणकप्रवालाः
संमर्दितामरिचसैन्धवशृङ्गवेरैः।
संचूर्णिताः कटुकतैलयुतैः समस्तै-
र्भृष्टैः सुहिङ्गुजकणैः परिदत्तवासाः ॥१३५॥
क्षारीय शाक : चणक
प्राकृतिक (स्वाभाविक) रूप से क्षारीय एवं अम्ल चणक के मृदु प्रबल (पत्रों) को
सम्यक् मर्दन करके, मरिच-सैंधव-शुण्ठी चूर्ण सहित, कटुतैल (सरसों के तैल) में
भर्जित (भून) कर लेते हैं; फिर हिंगु (भृष्ट) से सुगन्धित (परिवासक) करते हैं।।१३५।।
चाणकं शाकमुद्दिष्टं दुर्जरः कफवातकृत्।
विष्टम्भजननं हृद्यं विशेषात्पुष्पवर्जितम्॥१३६॥
अथ चञ्चुशाकम्
चञ्चुशाकजमिदं मृदुपत्रं
स्वेदितं तुषजलेन नितान्तम्।
तैलहिङ्गलवणैः सुपाचितं
कस्य नो दिशति चेतसोत्सवम्॥१३७॥
चञ्चुः शीता सरा रूक्षा स्वादुर्दोषत्रयापहा।
धातुपुष्टिकरा बल्या मेध्या पिच्छिलिका हि सा॥१३८॥
चञ्चुशाक
क. विधि- चञ्चु के मृद पत्रों (मुलयम पत्ते) को तुषोदक में स्विन्न करके (उबाल
कर), तैल-हिंगु-लवण के साथ पाक करते हैं। इस रीति से सिद्ध शाक से किसी
भोक्ता के मन में आनक उत्पन्न नहीं होगा- सभी भक्षण कर्त्तव्यों को प्रसन्ननता
दायक होता है।
अथान्नभोगोत्सवः १४९
ख. गुण- १. शीत २. सरा
३. रूक्ष ४. स्वादु
५. त्रिदोषहर ६. धातुपुष्टिकर
७. बल्य ८. मेध्य
९. पिच्छिल
अथ नाडी(ली) शाकम्
नालेन रहिता नाली सुस्विन्ना मुष्टिपीडिता।
घृते तप्ते परिक्षिप्ता चिञ्चिणीपत्रसंयुता॥१३९॥
नाली सरा लघुः शीता पित्तनुत्कफवातला।
व्रणशोथहरा ज्ञेया लिप्ता शोथघ्निका मता॥१४०॥
नाडी शाक
क. विधि- नाड़ी (नली) शाक-वाली रहित-को स्विन्न करते (उबालते) हैं, तथा
मुष्टि (मुट्ठी) से मर्दित कर-भर्जित कर- पिण्डी कर लेते हैं; तप्त घृत में चिंचा
इमली केक पत्रों के साथ (अग्निपर) घृत में डाल देते हैं। इस रीति से नाड़ीशाक
सिद्ध हो जाता है।
ख. गुण- १. सर २. सुवाच्य
३. शीतल ४. पित्तशामक
५. कफजनन ६. वाल कारक
७. व्रण ८. शोथ (नाशक-७-८)
९. नाड़ी का लेप शोथनाशक
अथ पालिक्यशाकम्
पालिक्यं दलितं शाकं तिलतैले विपाचितम्।
अम्लद्रव्यसमाकीर्णं हिङ्गुसैन्धवसंयुतम्॥१४१॥
पालिक्या वातला शीता भेदिनी श्लेष्मला गुरुः।
विष्टम्भजननी चैव नेत्ररोगकरी हि सा॥१४२॥
पालकी शाक
क. विधि- पालकी को कर्तन करके, तिलतैल में अम्ल द्रव्य का चूर्ण, हिंगु तथा
सैन्धव चूर्ण डालकर शाक को पक्व कर लेते हैं।

१५० क्षेमकुतूहलम्
ख. गुण- १. वातकारक २. शीत
३. सार (मलभेदक) ४. कफकारक
५. गुरु (गरिष्ठ) ६. विष्टम्भ जनक
७. नेत्ररोगजनन
अथ मारीचशाकम्
सुतप्तमाज्ये बहुजीरकान्विते
सुस्वेदितं मारिचसंज्ञशाकम्।
ससैन्धवं तक्रविलोद्य पाचितं
संप्रापितं प्राक्तनभाग्यकेन॥ १४३॥
रुच्यं वातहरं बल्यं कफहृद्रोगनाशनम्।
हृद्यं पित्तकरं किंचिच्छाकं मारिचसंज्ञकम्॥ १४४॥
मारीच
क. विधि- इसको सुस्वेदित (उबालकर), जीरक (अधिक मात्रा में) का तप्त घृत
में छौंक कर, सैंधव युक्त तक्र में मिश्रित कर पाक करते हैं। इस रीति से मारीच
शाक सिद्ध हो जाता है। इस मारीच शाक भक्षण का व्यक्ति को पूर्वजन्म के
भाग्य से अवसर प्राप्त होता है।
ख. गुण- १. रुचि जनन २. वातहर
३. बल्य ४. कफनाशन
५. हृद्रोग नाशक ६. हृद्य
७. किंचित् पित्तकारक
अथ ववौतिशाकम्
सदण्डपत्रं मृदु खण्डशः कृतं
सरामठं तप्तघृते सुभर्जितम्।
ससैन्धवं तक्रयुतं विपाचितं
ववौतिकं देवशिवेन दापितम् ॥ १४५॥
सुगन्धं पित्तहृद्बल्यं हृद्यंवातानुलोमनम्।
प्रोक्तं लघुतरं पाके नागवल्ल्यास्तलोद्भवम्॥ १४६॥
अथाष्टमोत्सवः १५१
ववौतिक्तं
क. विधि- ववौति शाक के नाल तथा फल सहित मृदु भाग का कर्तन करके, हिंगु
के साथ तप्त घृत में भर्जित करते (भूनते) हैं; फिर सैंधव तथा तक्र मिलाकर
पाक करें। यह ववौति शाक भगवान शंकर (देवशिवेन) ने का प्रदान किया
(दाषितम्) है- वह शाक विशेष की महत्ता का उल्लेख प्राप्त होता है (शाक
वर्णन के साथ)।
ख. गुण- १. सुगन्धित २. पित्तशामक
३. वल्य ४. हृद्य
५. वातानुलोमन ६. लघुतर
विशिष्टोद्भव- वकौत शाक (क्षुप) की उत्पत्ति नागवल्ली (ताम्बूल वल्ली) के
अधोभाग (तल) से होती है (नागवल्लास्तलोद्भवम्), जो कि गुणों में अत्यन्त
लघु (सुपाच्य) होता है॥ १४५-१४६॥
अथ वेल्लजं शाकम्
सुकृतं वेल्लजं शाकं क्षिप्तमाज्ये सहिङ्गुके।
उषिते क्वथितं तक्रे शुक्लवर्णं विपाचितम्॥ १४७॥
वेल्लजं कटुकं शाकं तिक्तं च लघु पाचकम्।
सुगन्धं सुरसं प्रोक्तं सुशीतं रुचिकारकम्॥ १४८॥
वेल्लज शाक
क. विधि- वेल्लज (मरिच) शाक का भलीभाँति कर्तन-स्वच्छता (सुकृत) करके,
पर्युषित तक्र (उषिते कवथितं पाके) में क्वथित (उबाले) करते हैं, फिर हिंगु
तथा तप्त घृत में डालकर, शुक्ल (शीत) वर्णीय शाक का पाक करते है
(विपाचितम्)।
ख. गुण- १. कटु-तिक्तरस २. लघु
३. पाचक ४. सुगन्धित
५. सुरस ६. सुशीत
७. रुचिकारक

१५२ | क्षेमकुतूहलम्
अथ चूकाशाकम्
चुक्रकं सुतिलतैलपाचितं
सूपधूपमिलितं ससैन्धवम्।
वृन्तकेन सहितं सुसौख्यदं
भामिनीव मिलिता सुकामिनम्॥ १४९॥
चुक्रं चुक्रतरं स्वादु वातघ्नं पित्तकृत्परम्।
रुच्यं लघुतरं पाके सवृन्ताकं सुरोचकम्॥ १५०॥
चुक्का शाक (चुक्र)
क. विधि- चुक्र (चुका) के शाक (क्षुप) को शुद्ध तिलतैल में पकते है, फिर क्षुप
धूप (हिंगु) से सुवासित करके, सैंधव लवण सहित मिलाकर सम्यक् रूपेण
पाक करते हैं। इस क्षुप्रीय शाक को वृन्त सहित (वृन्तकेन सहितम्) पकाने का
निर्देश है, जिससे असीम आनन्द की प्राप्ति होती है, जैसे कामाभिलाषी व्यक्ति
को (संयोगवश) सुरुपा-क्षमेच्छुक स्त्री की प्राप्ति हो कर, काम सुख की प्राप्ति
हो जाये (सुसौख्यदं भामिनीव मिलिता सुकाभिनम्)।
ख. गुण- १. चुक्रतर (अम्ल) २. स्वादु
३. वातज ४. पित्तकारक (परम्)
५. रुच्य ६. लघुतर
७. वृन्ताक सहित चुक्रशाक सुरीचक रुचिकर तथा
आहार में रुचि उत्पन्नकारी।
अथ पुनर्नवाशाकम्
पौनर्नवं शाकमतीव मिष्टं
संस्वेदितं मुष्टिभिरेव पिष्टम्।
संपाचितं मिष्टतमे सुतैले
संवासितं हिङ्गुकणेन रुच्यम्॥ १५१॥
पुनर्नवा
क. अति स्वादु-मीठा (पौनर्नवं शाकमतीव मिष्टम्) पुनर्नवा के क्षुप (प्रसारी) को
संस्वेदित (उबाल) कर, हाथों की मुट्ठी (कर-मुष्टिभिरेव पिष्टम्) से पीस-मसल
कर, अत्यधिक मीठे तैल (मिष्टतमे सुतैले)- जैसे श्रेष्ठ कोटि के तिलतैल पर


अथाष्टमोत्सवः १५३
पाक करते हैं (संपाचितम्), तथा (तदनन्तर) हिंगुकणों द्वारा सुधूपित कर लेते
हैं। इस रीति से पुनर्नवा का शाक सिद्ध हो जाता है॥१५१॥
पौनर्नवं हि चाक्षुष्यं तिक्तं रूक्षं कफापहम्।
शोथपाण्डुक्षयश्वासज्वरहृद्रोगनाशनम् ॥ १५२॥
ख. गुण- १. चक्षुष्य २. तिक्त रस
३. रूक्ष ४. कफनाशक
५. शोथ ६. पाण्डु
७. क्षय ८. श्वास
९. ज्वर १०. हृद्रोग (नाशक ५-१०)
अथ चित्रावलीशाकम्
विचित्रं चित्रकं शाकं कासमर्दविमर्दितम्।
तत्तैले सबाहीके पाचितं तक्रसंभृतम्॥ १५३॥
चित्रकः कटुकः पाके वह्निकृत्पाचको लघुः।
श्लेष्मानिलहरो ग्राही रुच्यो वृष्यतरो हि सः॥ १५४॥
चित्रावली (चित्रक)
क. विधि- कासमर्द (मसाले) के साथ, विचित्र चित्रक के शाक का मर्दन करते हैं,
फिर हिंगु सहित तप्त तैल में तक्र मिश्रित करके पाक कर लेते हैं। इस रीति से
चित्रावली शाक सिद्ध हो जाता है।
ख. गुण- १. कटुरस (विपाकी) २. अग्निदीपन (वह्निकृत्)
३. पाचक (पचने में सहायक) ४. लघु (सुपाच्य)
५. कफघ्न ६. वातघ्न
७. ग्राही (मल को बाँधने वाला) ८. रुच्य (रुचि संजनन)
९. वृष्यहर (अत्यन्त वीर्यवर्धन)
अथ कौसुम्भम्
कौसुम्भं कोमलं शाकं कासमर्दविमर्दितम्।
पाचितं तप्तके तैले मन्मन्थविमन्धितम्॥ १५५॥
कौसुम कासजिच्छाकं रूक्ष्मुष्णं च पित्तलम्।
सुस्वादु मधुरं पाके लघु रुच्यं सरं हि तत्॥ १५६॥

[पृष्ठ १५४]

१५४ क्षेमकुतूहलम्
कौसुम्भ (कुसुम्भ)
क. विधि- कुसुम्भ (बैर) का मृदु (कोमल) शाक को कासमर्द (वेसवार-मसाला से
सुगन्धित करके तथा मर्दन पूर्वक) सैंधव मिलाकर, तप्त तैल में डालकर पाक
करते हैं। इस रीति से कौसुम्भ शाक प्रस्तुत है।
ख. गुण- १. कासजित २. रूक्ष
३. उष्णवीर्य ४. पित्तजनन
५. स्वादु ६. मधुरविपाकी
७. सुपाच्य (लघु) ८. रुच्य (रुचिवर्धन)
९. सर (सुखविरेचक)
अथ शिखाली
श्रीबालकदलं ग्राह्यमारनालेन तापितम्।
पिण्डितालोडितं तैले कासमर्दसमन्विते॥ १५७॥
वातपित्तहराबल्या विबन्धाध्माननाशिनी।
कफकृन्मूत्रकृच्छ्रघ्नी भेदनी सा रसायिनी॥ १५८॥
शिवाली
क. विधि- शिवाली (श्रीबालक) के पत्रों (दल) को आरनाल के साथ उबालते
(तापितम्) है, निचोड़कर पिण्डी की आवृत्ति में बनाते हैं। तत्पश्चात् सुगन्धित
द्रव्य कासमर्द (मसाला) आदि सम्मिलित करके, तैल में पाक करते हैं।
ख. गुण- १. वातघ्न २. पित्तशामक
३. वल्य ४. विबन्ध हर
५. आध्मान नाशक ६. मूत्रकृच्छ्र नाशक
७. मलभेदन ८. रसायन
अथ जीवन्तीशाकम्
जीवन्त्या कोमलं पत्रं स्विन्नं तक्रे सुपिण्डितम्।
हिङ्गुना भर्जितं तैले तक्रं क्षिप्त्वा प्रलेहितम्॥ १५९॥
जीवन्ती बृंहणी वृष्या गुर्वी रुच्या रसायनी।
चक्षुष्या सर्वदोषघ्नी प्रोक्ता मधुरपाकिनी॥ १६०॥


[पृष्ठ १५५]

अथाष्टमोत्सवः १५५
इति पत्रशाकाधिकारः।
जीवन्ती
क. विधि- मृदु (कोमल) पत्रों को तक्र में स्विन्न (उबाल) करते हैं, निचोड़कर पिण्डी
के आकार का बना लेते हैं; फिर हिंगु (भृष्ट) कर तक्र में डालकर, प्रलेह की भाँति
पाक कर लेते हैं। इस रीति से जीवन्ती शाक (प्रलेह ८) का निर्माण हो जाता है।
ख. गुण- १. बृंहण २. वृष्य
३. गुरु ४. रुच्य
५. रसायन ६. चक्षुष्य
७. सर्वदोषघ्न ८. मधुर विपाकी
पत्रशाक प्रमेद पूर्ण।
अथ पुष्पशाकम्
अथ करीरकुसुमम्
कारीरं कुसुमं सुधर्मनिहितं
सद्गारिणा संयुतं
समहेन विपाचितं सलवणं
हिङ्ग्वाढ्यतैले भृशम्।
क्षिप्तं तक्रवरं सुकाञ्जिकमथो
सद्वेसनेनान्वितं
भोक्तार केन समर्चितः प्रतिदिनं
श्रीपार्वतीशः स्वयं॥ १६१॥
कारीरं कुसुमं भेदि कटुकं कफनाशनम्।
पित्तहृद्रुचिरं भव्यं कषायं पथ्यपदं भृशम्॥ १६२॥
करीरपुष्प
क. विधि- करीर पुष्प सुघर्म निहित (धूप में सूखे हुए), जल में स्विन्न (उबाले)
हुए, लवण तथा हिंगु से युक्त तैल (अधिक) में भर्जित करते (भूनते) हैं। इसे
एक सप्ताह तक पाक करते हैं, बेसन या तक्र मिलाकर।

१५६ क्षेमकुतूहलम्
इस रीति से पक्व (सिद्ध) शाक को कौन भक्षणकर्त्ता है, जो भगवान् शंकर की
स्वयं प्रतिदिन पूजन करता है- इस शाक का भक्षण करनेवाला शिव (पार्वतीश)
को प्राप्त जाता है।
ख. गुण- १. भेदन २. कटु-कषाय रस
३. कफ नाशक ४. पित्तघ्न
५. रुच्य ६. कषाय
अथ कटुजपुष्पम्
काञ्जिकेन मधुरेण मुहूर्तं
स्वेदितः कुटजपुष्पगुलुच्छः।
पाचितः सलवणस्तिलतैले
याति हिङ्गुसुरभीरुचिरत्वम् ॥ १६३ ॥
कौटजं कुसुमं ग्राही सुस्वादु मृदुशीतलम्।
लघु हृद्रोगपित्तासृगुदावर्त्तज्वरं जयेत् ॥ १६४ ॥
कुटज पुष्प
क. विधि- कुटज के पुष्प गुच्छों का मधुर कांजिक में दो घटी (एक मुहूर्त) स्वेदन
(उबालते) हैं तथा उसको निचोड़ते हैं (कुटज पुष्प गुलुच्छ पीडितम्) तथा
लवण के साथ, तिलतैल में हिंगु से सुरभित बनाकर, तैयार करते हैं। इस रीति
से पक्व 'कुटजपुष्प शाक' रुचिवर्धन होता है।
ख. गुण- १. ग्राही २. सुखादु
३. मृदु ४. शीतल
५. सुपाच्य ६. लघु
७. हृद्रोग-रक्तपित्त-उदावर्त-ज्वरनाशक
अथ शोभाञ्जनम्
शिग्रुमूलफलपुष्पमिश्रितं
तैलपक्वमुदकेऽथ साधितम्।
क्षिप्तसैन्धवरजः सहिङ्गुना
जायते सुरभि दीपनं वसोः ॥ १६५ ॥
अथाष्टमोत्सवः १५७
शिग्रुकः कटुतीक्ष्णोः स्नायुशोथसमीरजित्।
कृमिजित्कफदोषघ्नो विद्रधिप्लीगुलमहा ॥ १६६ ॥
शोभांजन
क. विधि- शिग्रु (शोभांजन) के मूल-पुष्प युक्त फल (फली) को, तैल में हिंगु (भृष्ट
करके) को लवण के साथ भर्जित करते हैं तथा जल मिलाकर पका लेते हैं। इस
रीति से सिद्ध शाक सुगंधयुक्त (सुरभि) तथा दीपन (पाचकाग्नि को प्रक्षप्त करने
वाला) होता है।
ख. गुण- १. कटु रस २. तीक्ष्ण
३. उष्ण ४. स्नायुशोथ
५. वातघ्न ६. कृमि
७. कफजदोष ८. विद्रधि
९. प्लीहावृद्धि १०. गुल्म (रोगनाशक ६-१०)
अथ कचनारः
काञ्चनारः कषायश्च उष्णः शीतहरो लघुः।
रूक्षः पित्तासृक्प्रदरग्रहणीक्ष्यकासनुत् ॥ १६७ ॥
कांचनार
कांचनार (कचनार) के पुष्प (फूलों) का शाक निर्माण किया जाता है। इसके
गुण-कर्म निम्नांकित है-
१. कषाय रस २. उष्ण ३. शीतहर
४. लघु (सुपाच्य) ५. रूक्ष
६. रक्तपित्त प्रदर-ग्रहणी दोष-क्षय रोग कास (नाशक)।
अथ शिरदुला
कलिका नैव दलिता स्विन्ना तक्रे घृताधिके।
वेसवारोषणापूर्णा हिङ्गुचूर्णे विपाचिता ॥ १६८ ॥
नीलिनी रोचनी तिक्ता केश्या मोहभ्रमापहा।
उष्णा हन्त्युदरप्लीहवातपित्तकफामयान् ॥ १६९ ॥
क्षे. कु. 11

१५८ क्षेमकुतूहलम्
शिरदुला
क. विधि- शिरदुला (नलिनी) के कली (कलिका नैव दलिता) बिना कटी, तक्र में
स्वेदन तथा पीडित करते हैं; इस द्रव्य की प्रभूत (अधिक) घृत में वेसवार
(मसाला) डालकर, मरिच-शुण्ठी-हिंगु (भृष्ट) चूर्ण मिलाकर पाक करते हैं।
ख. गुण- १. रुच्य २. तिक्तरस
३. केश्य ४. मोह
५. भ्रम ६. उष्ण
७. उदरोग ८. प्लीहवृद्धि
९. वात-पित्त-कफ जनित रोग (नाशक ४-५, ७-९)
अथ अगस्तिकुसुमम्
आगस्त्यं कुसुमं तथा मृदुफलं केनाहृतं जन्तुना
धन्यं चाद्य दिनं यदद्य मिलितं कस्यास्यमालोकितम्।
स्विन्नं तक्रयुतं सुहिङ्गुलुलितं तप्ते घृते पाचितं
भोक्त्रा सत्वरभाषितं प्रियतमे नाद्यापि संपाचितम् ॥ १७०॥
आगस्त्यं पित्तकफजिच्चातुर्थकहरं हिमम्।
तत्फलं पीनसश्लेष्मवातन्नक्तान्ध्यनाशनम् ॥ १७१ ॥
अगस्त्य (अगस्ति)
अगस्त्य (अगस्ति) का पुष्प (फूल) तथा मृदु फल (मुलायम फल) किस मनुष्य के
द्वारा लिया गया है (केनाहृतं जन्तुनाम्), जिसकी आज (दिन) को प्राप्ति हो गयी (धन्यं
चाद्य दियं मिलितं कस्यास्मावलोकितम्), आज का दिवास श्रेष्ठ है, किसका मुख प्रातःकाल
ही अवलोकन किया। यह अगस्त्य पुष्प तथा फल की उपलब्धि की व्यंगात्मक/ वक्रोक्ति
पूर्वक प्रशंस है आज का दिन धन्य है, जब अगस्त्य पुष्प की प्राप्ति हुई है।
क. विधि- अगस्त्य का पुष्प तथा मृदु फल तक्र में स्वेदित करके, हिंगु (भृष्ट) देने
के व्यह, घृत में पाक करते हैं- इस (सरल) रीति से अगस्त्य शाक सिद्ध हो
जाता है।
इस शाक को भक्षण करने वाला कहता है, हे ! प्रियत में आज भी अगस्त्य के
शाक का पाक किया है या नही अर्थात् भोक्त की यही शाक भक्षण की प्रबल
अभिलाषा है।
अथाष्टमोत्सवः १५९
ख. गुण- पुष्पशाक १. वात-पित्तहारक फलशाक
२. चतुर्थिक ज्वर १. पीनस
३. शीतल २. कफ-वातजन्य रोग
४. कफजनित रोग ३. नक्तान्ध्य
५. पित्तजनित रोग (नाशक- १-३)
६. (नाशक- २, ४-५)
अथ अरणीपुष्पम्
अग्निमन्थभवबालबुण्डिका
समरात्रमुदके सुसंधिता।
तक्रसिक्तघृतपाकपाचिता
हिङ्गुना जनितवासवासिता ॥ १७२ ॥
अग्निमन्थोऽतिहृद्यश्च त्रिदोषशमनः सरः।
आध्मानच्छर्दिहा शोथचक्षूरोगविषापहः ॥ १७३ ॥
अरणी पुष्प
क. विधि- अरणी (अग्निमन्थ बुण्डिका) को नवीन (बाल) कलिका को ग्रहण
करके, एक सप्ताह (सप्त रात्रि) पर्यन्त जल में स्थापित कर देना चाहिए (फिर
तक्र में स्वेदन (उबाल देते) करते हैं; सुगंधित कर घृत में पाक कर लेते हैं।
ख. गुण- १. अत्यधिक वल्य २. त्रिदोषशामक
३. सारक ४. आध्मान
५. वमन ६. शोथ
७. नेत्ररोग ८. विषजन्य विकार
(नाशक- ४-८)
अथ शणपुष्पम्
सुस्विन्नं शाणकं पुष्पं तक्रे तैले विपाचितम्।
हिङ्गुना वासितं वेल्लसुचूर्णेनावचूर्णितम् ॥ १७४॥
शणपुष्पं सरं बल्यमसृग्प्रदरनाशनम्।
मधुरं रुचिदं पाके किञ्चिद्विष्टम्भाकारकम् ॥ १७५॥

पृष्ठ १६०

१६० | क्षेमकुतूहलम्
शणपुष्पम्
क. विधि- शणपुष्प (सनई के फूल) को तक्र में स्वेदन (उबाल कर) करते हैं, इसे
तप्त तैल में हिंगु से सुगन्धित कर, अम्ल पदार्थ का चूर्ण मिश्रित करके-पाक
चूर्ण करते हैं।
ख. गुण-
१. सर | २. बल
३. असृक प्रदर | ४. मधुर
५. रुचिद | ६. मधुर विपाकी
७. रुचिवर्धन | ८. अल्प विबन्धकारक
(नाशक-४-८)
अथ मधूकपुष्पम्
सद्यश्च्युतं स्थूलमधूकपुष्पं
संशोधितं केसरधूलिवर्जितम्।
संपाचितं शुभ्रसिताघृताभ्यां
सजीरकं जीवनदं हि जीविनाम्॥ १७६॥
बृंहणीयं सुमधुरं मधूककुसुमं गुरु।
वातपित्तप्रशमनं हृद्यं रुच्यं मुखप्रियम्॥ १७७॥
इति पुष्पाधिकारः।
मधूक पुष्प
क. विधि- स्वयं-तुत्वारित (सद्यच्युत) पतित (गिरे हुए) मधूक के स्थूल (बड़े)
पुष्प (फूलों) को लेकर, पुष्प केशर को निकाल देते हैं, तथा जल से प्रक्षालित
(धोकर), शुद्ध कर लेते हैं। तदनन्तर, इस द्रव्य को घृत में भृष्ट जीरक (छोंक)
देते हैं, फिर श्वेत शर्कर मिलाकर, पाक कर लेते हैं। यह प्राणियों (जीविनाम्)
को जीवन (जीवनदंहि) प्रदान करता है।
ख. गुण-
१. वृंहणीय (मांस वर्धन) | २. सुमधुर
३. गुरु (गरिष्ठ) | ४. वातपित्त शामक
५. हृद्य | ६. रुच्य
७. मुख प्रियम् (मुँह को अच्छा बनाने वाला)
पुष्पाधिकार समाप्तः


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अथाष्टमोत्सवः | १६१
अथ पल्लवाः ।
अथ तोरई पत्र शाकम्
कोशातकीवल्लिभवाग्रपल्लवाः
सुपीडितास्तक्रयुताः सुसंभृताः।
संभर्जिताः सैन्धवहिङ्गुनाऽधिके
तैलेऽतिरुच्या तनुपुष्टिदायिकाः॥ १७८॥
कोशातकी पल्लव
कोशातकी (तोरई) नामक वल्ली (लता) के अग्रभाग में उपलब्ध पल्लवों
(कोमल पत्रों) को एकत्र करते हैं, जिनको तक्र (मट्ठा) में स्वेदिह (उबालकर) पीड़ित
(कर), पिण्डाकार बनाकर, अधिक मात्रा में तैल में, हिंगु (भृष्ट) कर सैंधव लवण
(छोंककर) भून लेते हैं (संभर्जितः)। इस रीति से सिद्ध शाक शरीर को दृढ़ता प्रदान
करता है, अतिरुचिंदायक है (अतिसच्च तनु हरदायिकाः)।
अथाम्रपल्लवाः
स्विन्ना निष्पीडिताः कामं कोकिलाहापल्लवाः।
घृतसिन्धूत्थसंंसिद्धा रुच्या रामठवासिताः॥ १७९॥
सर्पिषा खण्डयुक्तेन तलयेदाम्रपल्लवम्।
लवङ्गाद्र्रकसंयुक्तमरुचौ रुचिकारकम्॥ १८०॥
आम्रपल्लव
सर्वप्रथम कोकिलाहार (आम्र) के मृदु पत्रों या पल्लवों को एकत्र करते हैं; इनकी
घृत एवं खण्ड में तलते (तलयेदाम्रपल्लवम्) हिंगु (भृष्ट) सहित, इसी में लवंग (लौंग)
एवं आर्द्रक (अदरक) की चूर्ण मिश्रित कर देते हैं। यह शाक अरुचि का निवारण कर,
रुचिकारक होता है।
अथ निम्बपल्लवाः
निम्बस्य कोमलतराणि दलानि भृष्ट्वा
स्वाज्ये क्षिपेत्तदनु सैन्धवयुक्ततक्रे।
शालेयतण्डुलकणैः सह रामठेन
वाधारितं ददति रोचनमेव लेह्यम्॥ १८१॥

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१६२ क्षेमकुतूहलम्
निम्ब पल्लव
क. विधि- निम्ब (नीम) अति मृदु (मुलायम) पत्तों (कोमलतराणि दलानि) को
एकत्र कर, घृत में भूनकर (स्वाज्ये क्षिपेत्तदनु), सैंधव मिश्रित तक्र में डाल देते
हैं तथा हिंगु (भृष्ट) से छौंकते हैं। इस सिद्ध (वाघारितम्)। इस रीति से सिद्ध ल
हम रूपी पाक शाक रोचन होता है (रुचिवर्धक)।
निम्बः शीतो लघुर्ग्राही दाहजित्त्वग्निकारकः।
व्रणपित्तकफच्छर्दिकुष्ठहृल्लासमेहनुत् ॥ १८४॥
इति पल्लवाधिकारः
ख. गुणः-
१. शीत २. लघु ३. ग्राही
४. दाहवित् ५. अग्निकारक ६. व्रण रोपण
७. पित्तजन्य रोगशामक ६. कफजन्य रोगहर ८. वमन शामक
१०. कुष्ठनाशक ११. हल्लास निरोधक १२. प्रमेहहर
पल्लवप्रमेद पूर्ण
अथ दण्डाधिकारः
दण्ड शाक
अथ कदलीदण्डशाकः
वृन्ताच्छिन्नः सलिलविधुतः कृत्ततन्तुः प्रयत्नात्
कम्बुभ्रान्ता जलविरहितोक्षारजम्बीरभृष्टः।
मध्ये मध्ये तनुसकलितश्राईकेनातिपूर्णः
स्वादुस्तूर्णं भवति सुतरां गर्भदण्डः कदल्यः॥ १८३॥
योनिदोषहरो दण्डः कादलोऽसृग्दरं जयेत्।
रक्तपित्तहरः शीतः सुरुच्यो बलवर्धनः॥ १८४॥
कदलीदण्डशाक
क. विधि- कदली (केले) को वृत्त को गर्भदण्ड से पृथक करके, तन्तुओ को
प्रयत्नपूर्वक निष्कासित कर देते हैं। इस शंख (कम्बुभ्रान्त्या) जैसा जल का भी
निष्क्रमण कर लेते हैं, फिर उसे (जल विरहित) क्षार तथा जम्बीर द्रव मे भृष्ट


पृष्ठ १६३

अथाष्टमोत्सवः १६३
करके (भून लेते) है। तथा बीच-बीच (मध्ये मध्ये) आर्द्रक खण्डों (छोटे) को
मिलाते जाते हैं। इसरीति से कदली गर्भदण्ड यथा शीघ्र अत्यन्त स्वादु (स्वादुस्तूर्णं
भवति सुतराम्) रूप में प्रस्तुत होता है।
ख. गुण-
१. योनिदोषहर २. असृग्दर (प्रदर) नाशक
३. रक्तपित्त शानक ४. शीत
५. सुरुच्य ६. बलवर्धन
अथ ढेहिशाकम्
संक्षुद्य तक्रेऽम्लतरे सुस्विन्नं
प्रतप्तमाज्ये नवढेहिशाकम्।
ससैन्धवं रामठदत्तवासं स्वाद-
न्नरो निन्दति व्यञ्जनानि ॥ १८५ ॥
ढेहिका वातला रूक्षा शीता गुर्वी विषापहा।
सुस्विन्ना रोचनी हृद्या अस्विन्न कण्ठकर्तरी ॥ १८६ ॥
ढेहिशाक
क. विधि- ढेहिशाक को संक्षुद्य (कुचल/आहत) कर, तक्र अम्ल मे सुस्विन्नं
(उबालकर) करने के बाद, तप्त आज्य (घृत) में भर्जित करते (भूनते) हैं। फिर,
सैन्धव तथा रामठ (हिंगू) चूर्ण से सुवासित कर लेते हैं। इस रीति से सिद्ध शाक
(ढेहि) का भोक्ता, अन्य समस्त व्यंजनों की निन्दा करेगा (नरो निन्दति व्यञ्जनानि)
अर्थात् ढेहिशाक के भक्षणोपरान्त अन्य सभी भोज्य पदार्थों का त्याग करने
(उसके समान स्वाद न होने के कारण) के योग्य समझता है।
ख. गुण-
१. वातकारक २. रूक्ष
३. शीत ४. गुर्वी (दुष्पाच्य)
५. विषनाशक
सुस्विन्न (सम्यक् रूप से उबाल हुआ) ढेहिशाक- १. रुचिकारक, २. हृद्य।
अस्विन्न ढेहिशाक- कण्ठकर्तरी (गले की काटने बला होता है।
अथ सार्षपः शाक
सार्षपः कोमलो दण्डः स्विन्नस्तक्रेण पीडितः।
तमतैले सुहिङ्ग्वाढ्ये भर्जिताः सैन्धवान्वितः ॥ १८७॥

१६४ क्षेमकुतूहलम्
सर्षप शाक
क. विधि- सर्षप (सरसों) के मृदु (कोमल) पत्र एवं नाल सहित दण्ड को (प्रक्षालन
करके) तक्र में सुस्वित्र करके (उबालते) हैं; इसे पीड़ित (निचोड़कर) पिण्डी बना
लेते हैं, जिसे हिंगु (भृष्ट) को तप्त तैल में, लवण के साथ, भर्जित करते हैं।
सार्षपी कन्दली सूक्ष्मा खण्डिता स्निग्धभाजने।
स्थापिता मण्डसहिता त्वथवा तण्डुलोदकैः॥ १८८॥
समरात्रात्परं चुक्रतुल्यं सम्यक्प्रजायते।
तत एव समाकृष्य तलयेद्वा प्रलेहयेत्॥ १८९॥
काप्यकेति समाख्याता सूदधर्मोपजीवकैः।
सार्षपं कटुतीक्ष्णोष्णं वातश्लेष्मव्रणापहम्॥ १९०॥
कृमिकण्डूहरं दद्रुकुष्ठघ्नं रुचिकारकम्।
सर्षप कन्दली
सर्

१६६ क्षेमकुतूहलम्
अथ सूरणशाकम्
अम्लीकापचूर्णेन मिश्रितेन जलेन वा।
काञ्जिकेनाऽथवा क्वाथ्यः सूरणो रौद्रताँ ज्यजेत् ॥ १९५ ॥
दिग्धो बाह्लीकतोयै रजनिरसयुतैर्गोचरे सूर्यमेरोः
संक्षिप्योत्क्षिप्य पात्रे तिलरससहिते साधितः सैन्धवेन।
जातः स्निग्धः सुगन्धिर्मरिचपरिचितः पाकरागं दधानो
दुर्नामघ्नस्तु कन्दः सपदि मदयते प्रार्थितो जाठराग्निम् ॥ १९६ ॥
सूरण शाक
क. विधि- १) चिंचा (अम्लीका) पत्रों (चूर्ण) के जल अथवा कांजिक में क्वथित
(उबाला हुआ) सूरण अपना रौद्ररूप (भयंकरता) का परित्याग कर देता है।
२) सूरण ग्रह सुमुहूर्त में सम्पन्न करने का विधान है- उदयाचल मेरुपर्वत (सूर्यमेरोः)
के ऊर्ध्व गोचर (रजनिरसयुतैर्गोचरे) होने पर सूरण कन्द उबाल (स्वेदन) करके
(वल्कलसहित रहित अवस्था में काटकर) रजनिरस (हरिद्रा रस) तथा हिंगु जल
(बाह्लीक तोय) के साथ, तिलतैल (तिल रस सहित) युक्त पात्र में- सैन्धव
सहित-पाक कर लेते हैं, एवं फिर सुगन्धित पदार्थ तथा मरिचचूर्ण कर मिश्रण
कर देते हैं।
ख. गुण- इस सूरण कन्द शाक का सेवन से दुर्नाम (अर्श) का नाश होता है तथा
पाचकाग्नि प्रदीप्त हो जाती है।
कन्दस्तूदरमृत्तिकाभिरहितः संवेष्टितोऽसौ मृदा '
कारीषानलपाचितस्त्वगयुतः क्षोदीकृतो मिश्रितः।
शुद्धः सैन्धवतैलजीरकरजज्जम्बीरनारार्द्रकै-
र्जड्यं पाण्डुरता तथैव हरते वह्नेरयं पूरणः ॥ १९७॥
सूरण कद शाक : अन्य प्रकार
अ. सूरण कन्द की प्राकृतिक चिपकी मृत्तिका (भूमिगत) को निष्कासित-स्वच्छ
करके, मृदा (मिट्टी) का अविष्टन (लेप) करते हैं; इसको करीषानल (उपलों की
आग) में पका लेते हैं। जब शीतल हो जाये, तब वल्कल (त्वक्) विहीन करके,
क्षोदित (मसलकर) भर्त्ता बनाते हैं, जिसमें सैन्धव, तिल तैल, जीरक चूर्ण,
परिपक्व जम्बीर रस एवं आर्द्रक का मिश्रण कर देते हैं।।१९७।।


अथाष्टमोत्सवः १६७
इस प्रकार का सूरणकन्द (भर्त्ता रूप) शरीर जाड्य (जड़ता) एवं पाण्डु रोग नाशक
हैं, एवं पाचकाग्नि वर्धन होता है।
सूरणं कटुतैलेन तलित्वाऽम्लरसैः सह।
शोषयेद्वेसवाराढ्यं यथा भोक्तुरभीप्सितम् ॥ १९८ ॥
आ. स्विन्न सूरण कन्द (उबाले हुए) सूरणकन्द (त्वक् रहित) को काटकर, कटु तैल
(सरसों के तैल) में तलन करते हैं (तलते हैं) इसमें अम्लरस के साथ वेसवार
(मसाला) छोड़कर, शुष्क करते हैं अथवा भोक्ता की इच्छानुसार (रुचि) के
अनुसार निर्माण करना चाहिए।
मृल्लिप्तं सौरणं कन्दं पक्त्वाऽग्नौ पुटपाकवत् ।
अद्यात्सपैललवणं रामठेनानुवासितम् ॥ १९९ ॥
इ) मृत्तिका आलेपित सूरण कन्द (मृल्लिप्तम्) को पुटपाक विधान के अनुसार
अग्नि में पाक करते हैं, फिर हिंगु (भृष्ट) को तैल तथा सैन्धव में सुगन्धित
बनाकर प्रस्तुत करते हैं।
सूरणोऽग्निकरो रूक्षः कासार्शःकर्तनो लघुः ।
सन्धानयोगसंप्राप्तादस्तिगुणकारकः ॥ २०० ॥
ई) सूरण कन्द अग्नि (पाचकाग्नि) वर्धन तथा रूक्ष है, कासहर, अर्श (कर्तन) एवं
सुपाच्य है (संधान योग संप्राप्तम्) संधान विधि से निर्माण करने पर, इसके
गुणों में वृद्धि हो जाती है (अस्तिगुण कारक)।
अथ मृणालकन्दशाकम्
बिसाङ्कुरा भोक्तृशोङ्कुरोथिताः
समाहृताः कृष्पलगादगाधतः ।
संकृत्तखण्डास्तनुतारकप्रभाः
प्रलेहयोगैः सुधिया विपाचिताः ॥ २०१ ॥
मृणालं दुर्जरं शीतं पिच्छलं कफवातकृत् ।
कषायं मधुरं स्वादु विष्टम्भाध्मानकारकम् ॥ १०२ ॥
मृणालकन्द शाक
क. विधि- भोक्ता के यश को अंकुरित (वृद्धि) करनेवाले, मृणालकन्द-बिसांकुर

१६८ क्षेमकुतूहलम्
(भिंसौड़ा-भिस) को कष्यज (अगाधजल) से निष्कासित कर, दुर्बल तारा के प्रकाश
(अनुतारकप्रभवः) में कन्द के छोटे-छोटे खण्ड टुकड़े (सकृत्त खण्डाः) बना लेते
हैं; इसको प्रलेह-विधि से बुद्धिमान् (सुधिया) मनुष्य पाक करते हैं (विपाचिताः)।
ख. गुण- १. दुर्जर (दुष्पाच्य) २. शीत (शीतल)
३. पित्तनाशक ४. कफ जनन
५. वातजनन ६. कषाय रस
७. मधुर रस ८. स्वादु (स्वादिष्ट)
९. विष्टम्भ (मलावरोधक) १०. आध्मान कर
संख्याऽनन्ता कति कति न ते शाकपाकप्रभेदाः
किं तैरुक्तैरहितविरसैरल्यसत्त्वप्रदुष्टैः।
मूलं पत्रं कुसुममथवा पल्लवंवा फलं वा
भक्त्या राद्धं भवति चतुरैः सर्वमेवातिरुच्यम्॥२०३॥
शाक पाक : सामान्य ज्ञातव्य
अ. शाक संख्या- अनन्त संख्य युक्त शाक क्या पाक भेद से नहीं हैं अर्थात्
शाकों की संख्या अपरिगणनीय है, परन्तु उनका नामोल्लेख का वर्णन करने से
कोई लाभ नहीं, जो अहितकर, विरस, अल्प सत्त्वं (बलहीन) तथा प्रदूषित होते
हैं।
आ. स्वभक्ति पाक- मूल, पत्र, कुसुम (पुष्प), पल्लव (नवीन पत्र) तथा फल
(कन्द-दण्ड-नाल सहित)- ये जो भी शाक (वर्गों में उल्लिखित) हैं ये सभी
शाक चतुर (बुद्धिमान) सूपदक (पाचक) पर निर्भर करता है, कि वह श्रद्धापूर्वक
(भक्ति से) इनका पाक करे, तब ये शाक उत्पन्न रुचिकर (सर्वमेतातिरुच्यम्)
सिद्ध होते हैं।
अतिजीर्णमकालोत्थं रूक्षंसिद्धमभूमिजम्।
जरठं कोमलं चातिशीतव्यालादिदूषितम्॥२०४॥
तत्स्र्वं वर्जनीयं हि भिषजा हितकारिणा।
सुशुष्कं सकलं शाकं नाश्नीयान्मूलकैर्विना॥२०५॥
अथाष्टमोत्सवः १६९
इ. वर्जित शाक
इन शाकों या उनकी विशिष्ट अवस्थाओं को निषिद्ध शाकों की श्रेणी में रखा गया
है, यथा-
१. अत्यन्त जीर्ण (जीर्ण-शीर्ण स्थिति)
२. अतिरूक्ष (बहुत शुष्क)
३. निकृष्टस्थानोत्पन्न (निन्दनीय स्थल में उगा हुआ)
४. अतिपुराण (बहुत पुराना)
५. अतिकोमल (बहुत मुलायम)
६. हिम, सर्प आदि से दूषित (शीत व्यालादि दूषित)
७. अकालोत्थ (असमय-ऋतु के विपरीत उत्पन्न)
इन समस्त प्रकार के शाक-द्रव्यों को भिषक् (महानस से सम्बन्धित) को वर्जित
कोटि में रखना चाहिए। समस्त प्रकार के शुष्क शाकों का भक्षण नहीं करे,
(सशुष्कशाकम्), परन्तु मूलक शाक सेवनीय होता है।
सर्वं शाकमचक्षुष्यमजिग्नेयमपौरुषम्।
विना पटोलवास्तूककाकमाचीपुनर्नवाः॥२०६॥
हानिकारक शाक
१. पटोल (परवल)
२. वास्तुक (बथुआ) इन चार प्रकार के शाकों (१-४) को छोड़कर सर्वप्रकार
३. काकमाची (मकोय) के शाक नेत्र, नासा तथा पौरुष (पुरुषत्व) के लिए
४. पुनर्नवा (सोठी) हानिकर होते हैं।
सर्वासां शाकजातीनां प्रकारः कथितो मया।
सन्धानवटकादीनामुच्यते तदनन्तरम्॥२०७
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्मविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
मत्स्यमांसप्रशंसनो नामहृष्टमोत्सवः।।८।।
उपसंहारात्मक रूपरेखा
मैंने समस्त प्रकार के शाको के प्रकारो भेदो-जातियो) का वर्णन किया है। इसके
पश्चात् (आगामी उत्सवनवम मे) सन्धान तथा वटक के विषय में वर्णन करेंगे।
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का विविधशाक
निर्माण वर्णन नामक आठवां उत्सव समाप्त॥