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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 136 में से

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पृष्ठ 81

१५६ क्षेमकुतूहलम्
इस रीति से पक्व (सिद्ध) शाक को कौन भक्षणकर्त्ता है, जो भगवान् शंकर की
स्वयं प्रतिदिन पूजन करता है- इस शाक का भक्षण करनेवाला शिव (पार्वतीश)
को प्राप्त जाता है।
ख. गुण- १. भेदन २. कटु-कषाय रस
३. कफ नाशक ४. पित्तघ्न
५. रुच्य ६. कषाय
अथ कटुजपुष्पम्
काञ्जिकेन मधुरेण मुहूर्तं
स्वेदितः कुटजपुष्पगुलुच्छः।
पाचितः सलवणस्तिलतैले
याति हिङ्गुसुरभीरुचिरत्वम् ॥ १६३ ॥
कौटजं कुसुमं ग्राही सुस्वादु मृदुशीतलम्।
लघु हृद्रोगपित्तासृगुदावर्त्तज्वरं जयेत् ॥ १६४ ॥
कुटज पुष्प
क. विधि- कुटज के पुष्प गुच्छों का मधुर कांजिक में दो घटी (एक मुहूर्त) स्वेदन
(उबालते) हैं तथा उसको निचोड़ते हैं (कुटज पुष्प गुलुच्छ पीडितम्) तथा
लवण के साथ, तिलतैल में हिंगु से सुरभित बनाकर, तैयार करते हैं। इस रीति
से पक्व 'कुटजपुष्प शाक' रुचिवर्धन होता है।
ख. गुण- १. ग्राही २. सुखादु
३. मृदु ४. शीतल
५. सुपाच्य ६. लघु
७. हृद्रोग-रक्तपित्त-उदावर्त-ज्वरनाशक
अथ शोभाञ्जनम्
शिग्रुमूलफलपुष्पमिश्रितं
तैलपक्वमुदकेऽथ साधितम्।
क्षिप्तसैन्धवरजः सहिङ्गुना
जायते सुरभि दीपनं वसोः ॥ १६५ ॥
अथाष्टमोत्सवः १५७
शिग्रुकः कटुतीक्ष्णोः स्नायुशोथसमीरजित्।
कृमिजित्कफदोषघ्नो विद्रधिप्लीगुलमहा ॥ १६६ ॥
शोभांजन
क. विधि- शिग्रु (शोभांजन) के मूल-पुष्प युक्त फल (फली) को, तैल में हिंगु (भृष्ट
करके) को लवण के साथ भर्जित करते हैं तथा जल मिलाकर पका लेते हैं। इस
रीति से सिद्ध शाक सुगंधयुक्त (सुरभि) तथा दीपन (पाचकाग्नि को प्रक्षप्त करने
वाला) होता है।
ख. गुण- १. कटु रस २. तीक्ष्ण
३. उष्ण ४. स्नायुशोथ
५. वातघ्न ६. कृमि
७. कफजदोष ८. विद्रधि
९. प्लीहावृद्धि १०. गुल्म (रोगनाशक ६-१०)
अथ कचनारः
काञ्चनारः कषायश्च उष्णः शीतहरो लघुः।
रूक्षः पित्तासृक्प्रदरग्रहणीक्ष्यकासनुत् ॥ १६७ ॥
कांचनार
कांचनार (कचनार) के पुष्प (फूलों) का शाक निर्माण किया जाता है। इसके
गुण-कर्म निम्नांकित है-
१. कषाय रस २. उष्ण ३. शीतहर
४. लघु (सुपाच्य) ५. रूक्ष
६. रक्तपित्त प्रदर-ग्रहणी दोष-क्षय रोग कास (नाशक)।
अथ शिरदुला
कलिका नैव दलिता स्विन्ना तक्रे घृताधिके।
वेसवारोषणापूर्णा हिङ्गुचूर्णे विपाचिता ॥ १६८ ॥
नीलिनी रोचनी तिक्ता केश्या मोहभ्रमापहा।
उष्णा हन्त्युदरप्लीहवातपित्तकफामयान् ॥ १६९ ॥
क्षे. कु. 11