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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

१४६ क्षेमकुतूहलम्

१४६ क्षेमकुतूहलम्
अथ सेहुण्डः
सेहुण्डं दलितं पत्रं स्विन्नं हस्तेन पीडितम्।
जीराज्येनाधिकं पृष्टं मणिमन्थेन मर्दितम्॥ १२७॥
सेहुण्डो रोचनस्तीक्ष्णो दीपनः कटुको गुरुः।
शूलमष्ठीलिकाध्मानगुल्मशोथोदरं जयेत्॥ १२८॥
सेहुण्ड (स्नुही)
क. विधि- इस पादप के दलित पत्रों को (जल में) स्विन्न (उबालकर), हाथों से
मसल कर, जीरक से (भर्जित या छौंककर) घृत में भून लेते हैं, और मणिमन्थ
(सैन्धव लवण) मिला देते हैं। इस रीति से शाक प्रस्तुत है।
ख. गुण- १. रुचिकर २. तीक्ष्ण
३. दीपन ४. कटु
५. गुरु ६. शल
७. अष्ठीलिका ८. आध्मान
९. गुल्म १०. शोथ
११. उदर रोग (नाशक-६-११)
द्विपत्रजातं प्रपुन्नाटशाकं
सुस्वेदितं पीडितगाढबाढम्।
ससैन्धवं राजिकया सुदघ्ना
विमर्द्य सेव्यं क्वथितेऽथ पाच्यम्॥ १२९॥
प्रपुन्नाटो लघुःस्वादुः वातश्लेष्महरः परः।
तिक्तःकण्ड्वामयहरः कासकुष्ठकृमीञ्जयेत्॥ १३०॥
प्रपुन्नाट
क. विधि- द्विपत्रजात (दोपत्तेवाले) शाक को स्विन्न (उबाल) करके (हाथ से
मसलकर), जीरक को भृष्ट (छौंक) देकर, घृत (घी) में भूनकर (भर्जित कर),
सैन्धव चूर्ण मिलाकर रखे। यह शाक का निर्माण हो गया।
ख. गुण- १. रुचिकर २. स्वादु
३. अग्निदीपन ४. कटुरसतिक्त
५. ६. सुपाच्य


अथाष्टमोत्सवः १४७

अथाष्टमोत्सवः १४७
७. वात-कफनाशक ८. कण्डू
९. कास १०. कुष्ठ
११. कृमिरोग नाशक (८-११)
अथ लुणियाशाकम्
शाकं लौणिकसंज्ञकं सुदलितं तप्ते घृते तापितं
हिङ्ग्वार्द्रेण विमिश्रितं सलवणं तक्रेण संपादितम्।
नो वा स्वेद्यमिदं सुहिङ्गुसहिते तैले सुवाघारितं
स्विन्नं तण्डुलसंयुक्तं सलवणं तक्रैर्विना पाचितम्॥ १३१॥
लौणिक
क. विधि- लौणिक (लोनी) को उबाल कर, हथों से निचोड़कर पीडित करके,
सैंधव तथा राजिका (राई) के साथ मर्दन करना चाहिए। इसका क्वाथ भी बनाते
हैं। यह शाक हींग (भृष्ट) तथा आर्द्रक के सहित तक्र के साथ लेते हैं। हिङ्गु
(भृष्ट) के साथ तैल में छौता लगाना हो निदान नहीं करना चाहिए। स्वेदन किया
लोगी का शाक तण्डुल सा लवण के साथ तक्र के बिना-पाक किया जाता है।
लोणिकं गुरु शीतोष्णं रूक्षं विष्टम्भकृत्सरम्।
दोषकृन्मधुरं पाके वातकृत्तम्लपित्तलम्॥ १३२॥
ख. गुण- १. गुरु २. शीत
३. उष्ण ४. रूक्ष
५. विष्टम्भकृत् ६. सर
७. दोषकृत् ८. मधुर
९. वातकारक १०. अम्लपित्त जनन
चणक शाक
सुकृतं चाणकं शाकं तप्ततैले सुपाचितम्।
सुतण्डुलालनयुतं हिङ्ग्वार्द्रकविमिश्रितम्॥ १३३॥
क. विधि- चणक (चने) के शाक को सुकृत (भलीभाँति काटकर), तप्त तैल में
पाक करते हैं, तथा तण्डुल (चावल) हिंगु तथा आर्द्रक मिलाकर बनाते हैं।
सशिखं चाणकं शाकमम्लतक्रेण स्वेदितम्।
सहिङ्गलवणे तैले भर्जितं नागरान्वितम्॥ १३४॥