क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० क्षेमकुतूहलम्
ख. गुण- १. वातकारक २. शीत
३. सार (मलभेदक) ४. कफकारक
५. गुरु (गरिष्ठ) ६. विष्टम्भ जनक
७. नेत्ररोगजनन
अथ मारीचशाकम्
सुतप्तमाज्ये बहुजीरकान्विते
सुस्वेदितं मारिचसंज्ञशाकम्।
ससैन्धवं तक्रविलोद्य पाचितं
संप्रापितं प्राक्तनभाग्यकेन॥ १४३॥
रुच्यं वातहरं बल्यं कफहृद्रोगनाशनम्।
हृद्यं पित्तकरं किंचिच्छाकं मारिचसंज्ञकम्॥ १४४॥
मारीच
क. विधि- इसको सुस्वेदित (उबालकर), जीरक (अधिक मात्रा में) का तप्त घृत
में छौंक कर, सैंधव युक्त तक्र में मिश्रित कर पाक करते हैं। इस रीति से मारीच
शाक सिद्ध हो जाता है। इस मारीच शाक भक्षण का व्यक्ति को पूर्वजन्म के
भाग्य से अवसर प्राप्त होता है।
ख. गुण- १. रुचि जनन २. वातहर
३. बल्य ४. कफनाशन
५. हृद्रोग नाशक ६. हृद्य
७. किंचित् पित्तकारक
अथ ववौतिशाकम्
सदण्डपत्रं मृदु खण्डशः कृतं
सरामठं तप्तघृते सुभर्जितम्।
ससैन्धवं तक्रयुतं विपाचितं
ववौतिकं देवशिवेन दापितम् ॥ १४५॥
सुगन्धं पित्तहृद्बल्यं हृद्यंवातानुलोमनम्।
प्रोक्तं लघुतरं पाके नागवल्ल्यास्तलोद्भवम्॥ १४६॥
अथाष्टमोत्सवः १५१
ववौतिक्तं
क. विधि- ववौति शाक के नाल तथा फल सहित मृदु भाग का कर्तन करके, हिंगु
के साथ तप्त घृत में भर्जित करते (भूनते) हैं; फिर सैंधव तथा तक्र मिलाकर
पाक करें। यह ववौति शाक भगवान शंकर (देवशिवेन) ने का प्रदान किया
(दाषितम्) है- वह शाक विशेष की महत्ता का उल्लेख प्राप्त होता है (शाक
वर्णन के साथ)।
ख. गुण- १. सुगन्धित २. पित्तशामक
३. वल्य ४. हृद्य
५. वातानुलोमन ६. लघुतर
विशिष्टोद्भव- वकौत शाक (क्षुप) की उत्पत्ति नागवल्ली (ताम्बूल वल्ली) के
अधोभाग (तल) से होती है (नागवल्लास्तलोद्भवम्), जो कि गुणों में अत्यन्त
लघु (सुपाच्य) होता है॥ १४५-१४६॥
अथ वेल्लजं शाकम्
सुकृतं वेल्लजं शाकं क्षिप्तमाज्ये सहिङ्गुके।
उषिते क्वथितं तक्रे शुक्लवर्णं विपाचितम्॥ १४७॥
वेल्लजं कटुकं शाकं तिक्तं च लघु पाचकम्।
सुगन्धं सुरसं प्रोक्तं सुशीतं रुचिकारकम्॥ १४८॥
वेल्लज शाक
क. विधि- वेल्लज (मरिच) शाक का भलीभाँति कर्तन-स्वच्छता (सुकृत) करके,
पर्युषित तक्र (उषिते कवथितं पाके) में क्वथित (उबाले) करते हैं, फिर हिंगु
तथा तप्त घृत में डालकर, शुक्ल (शीत) वर्णीय शाक का पाक करते है
(विपाचितम्)।
ख. गुण- १. कटु-तिक्तरस २. लघु
३. पाचक ४. सुगन्धित
५. सुरस ६. सुशीत
७. रुचिकारक