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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 136 में से

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१६२ क्षेमकुतूहलम्
निम्ब पल्लव
क. विधि- निम्ब (नीम) अति मृदु (मुलायम) पत्तों (कोमलतराणि दलानि) को
एकत्र कर, घृत में भूनकर (स्वाज्ये क्षिपेत्तदनु), सैंधव मिश्रित तक्र में डाल देते
हैं तथा हिंगु (भृष्ट) से छौंकते हैं। इस सिद्ध (वाघारितम्)। इस रीति से सिद्ध ल
हम रूपी पाक शाक रोचन होता है (रुचिवर्धक)।
निम्बः शीतो लघुर्ग्राही दाहजित्त्वग्निकारकः।
व्रणपित्तकफच्छर्दिकुष्ठहृल्लासमेहनुत् ॥ १८४॥
इति पल्लवाधिकारः
ख. गुणः-
१. शीत २. लघु ३. ग्राही
४. दाहवित् ५. अग्निकारक ६. व्रण रोपण
७. पित्तजन्य रोगशामक ६. कफजन्य रोगहर ८. वमन शामक
१०. कुष्ठनाशक ११. हल्लास निरोधक १२. प्रमेहहर
पल्लवप्रमेद पूर्ण
अथ दण्डाधिकारः
दण्ड शाक
अथ कदलीदण्डशाकः
वृन्ताच्छिन्नः सलिलविधुतः कृत्ततन्तुः प्रयत्नात्
कम्बुभ्रान्ता जलविरहितोक्षारजम्बीरभृष्टः।
मध्ये मध्ये तनुसकलितश्राईकेनातिपूर्णः
स्वादुस्तूर्णं भवति सुतरां गर्भदण्डः कदल्यः॥ १८३॥
योनिदोषहरो दण्डः कादलोऽसृग्दरं जयेत्।
रक्तपित्तहरः शीतः सुरुच्यो बलवर्धनः॥ १८४॥
कदलीदण्डशाक
क. विधि- कदली (केले) को वृत्त को गर्भदण्ड से पृथक करके, तन्तुओ को
प्रयत्नपूर्वक निष्कासित कर देते हैं। इस शंख (कम्बुभ्रान्त्या) जैसा जल का भी
निष्क्रमण कर लेते हैं, फिर उसे (जल विरहित) क्षार तथा जम्बीर द्रव मे भृष्ट


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अथाष्टमोत्सवः १६३
करके (भून लेते) है। तथा बीच-बीच (मध्ये मध्ये) आर्द्रक खण्डों (छोटे) को
मिलाते जाते हैं। इसरीति से कदली गर्भदण्ड यथा शीघ्र अत्यन्त स्वादु (स्वादुस्तूर्णं
भवति सुतराम्) रूप में प्रस्तुत होता है।
ख. गुण-
१. योनिदोषहर २. असृग्दर (प्रदर) नाशक
३. रक्तपित्त शानक ४. शीत
५. सुरुच्य ६. बलवर्धन
अथ ढेहिशाकम्
संक्षुद्य तक्रेऽम्लतरे सुस्विन्नं
प्रतप्तमाज्ये नवढेहिशाकम्।
ससैन्धवं रामठदत्तवासं स्वाद-
न्नरो निन्दति व्यञ्जनानि ॥ १८५ ॥
ढेहिका वातला रूक्षा शीता गुर्वी विषापहा।
सुस्विन्ना रोचनी हृद्या अस्विन्न कण्ठकर्तरी ॥ १८६ ॥
ढेहिशाक
क. विधि- ढेहिशाक को संक्षुद्य (कुचल/आहत) कर, तक्र अम्ल मे सुस्विन्नं
(उबालकर) करने के बाद, तप्त आज्य (घृत) में भर्जित करते (भूनते) हैं। फिर,
सैन्धव तथा रामठ (हिंगू) चूर्ण से सुवासित कर लेते हैं। इस रीति से सिद्ध शाक
(ढेहि) का भोक्ता, अन्य समस्त व्यंजनों की निन्दा करेगा (नरो निन्दति व्यञ्जनानि)
अर्थात् ढेहिशाक के भक्षणोपरान्त अन्य सभी भोज्य पदार्थों का त्याग करने
(उसके समान स्वाद न होने के कारण) के योग्य समझता है।
ख. गुण-
१. वातकारक २. रूक्ष
३. शीत ४. गुर्वी (दुष्पाच्य)
५. विषनाशक
सुस्विन्न (सम्यक् रूप से उबाल हुआ) ढेहिशाक- १. रुचिकारक, २. हृद्य।
अस्विन्न ढेहिशाक- कण्ठकर्तरी (गले की काटने बला होता है।
अथ सार्षपः शाक
सार्षपः कोमलो दण्डः स्विन्नस्तक्रेण पीडितः।
तमतैले सुहिङ्ग्वाढ्ये भर्जिताः सैन्धवान्वितः ॥ १८७॥