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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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१४४ क्षेमकुतूहलम्
रखकर कहती है- कि मैं एकाकी हूँ, परन्तु बहुत रसों से परिपूर्ण हूँ- तथा अपने ही सुगन्ध
से समस्त व्यक्तियों को सुवासित (सुगन्धित) करती है॥११८॥
भर्जिता कटुतैलेन सिन्धुजेनावमर्दिता।
शतपुष्पा हसत्येषा परवासव्यपेक्षकम् ॥ ११९ ॥
शतपुष्पा कटुःस्निग्धा तीक्ष्णोष्णा श्लेष्मवातहा ।
रुच्या नेत्ररुजां हन्ति बस्तिकर्मणिर शस्यते ॥ १२० ॥
क. विधि- शतपुष्पा को कटुतैल (सर्षप तैल) में भर्जित (भुनी हुई), सैन्धव
मिश्रित तथा मर्दित-अन्य गंध की अपेक्षा करने पर हँसती है (हसत्येषा)।
ख. गुण- १. कटुरस २. स्निग्ध
३. तीक्ष्ण ४. उष्ण
५. कफ-वातनाशक ६. रुचिसंवर्धन
७. नेत्ररोग नाशक ८. वस्तिकर्मार्थप्रशस्त
अथ मेथिकोपहासः
स्ववासवासिता चाहं शतपुष्पा यदीरितम् ।
किं तया क्रियते भूत्या स्वेनैव स्वोपभोगिका ॥ १२१ ॥
मद्वासेनेव सकलं भोजनागारमङ्गणम् ।
वासितं मेथिका चेष्टे किं स्ववाससुवासिता ॥ १२२ ॥
मेथिका उपहास
शतपुष्पा के कहा कि मैं अपनी सुगन्ध से सुगन्धित होता है तब उस ऐश्वर्य का
क्या लगा है जब वह अपने लिए ही उपयोगी में हो। इस प्रसंग मे पुनः मेथिका ने कहा
क अपनी सुगन्ध से सुगन्धित होने से क्या मेरे सुगन्ध से सम्पूर्ण भोजनालय (महानसे
भोजनागार) तथा आंङ्गण (अङ्गणम्) सुगन्धित (वासितम्) हो जाता है (स्ववास-
मुवासिता)- यह निथिका की विशेषता-गंध सम्बन्धी है॥१२१-१२२॥
मेथीशाकं पयसि विधुतं स्वेदितं पीडितं हि
प्राज्ये स्वाज्ये जरणसहिते मेलितं भर्जितं हि।
कासोच्छ्वासं प्रसृतमधिकं कर्षितो जाठराग्नि-
र्येन प्राणं सुबहुगुणितं भक्ष भूयोऽपि भूयः ॥ १२३ ॥


पृष्ठ १४५

अथाष्टमोत्सवः १४५
मेथी
क. विधि-
१. मेथी (क्षुप/पत्र) जल में डालकर, स्वेदन (उबाल) देते हैं, फिर पीड़ित (पिण्डाकार)
निचोड़ कर, हिंगु (भृष्ट) से भर्जित करके, घृत में भूनते हैं।
२. जिस मनुष्य की पाचकाग्नि बलहीन (मन्द) हो गयी हो; तथा प्राणों को
बहुगुणित कर दिया हो, (श्वास की मात्रा में वृद्धि), वह व्यक्ति इस शाक को
भक्षण निरन्तर (भक्ष भूयोऽपि भूयः) करना चाहिए।
मेथिका दीपनी हृद्या बद्धविट्कृमिशुक्रनुत् ।
रूक्षोष्णां तत्फलं कासानिलश्लेष्मवमीञ्जयैत् ॥ १२४ ॥
ख. गुण- १. दीपन २. हृद्य
३. बद्धविट ४. कृमिघ्न
५. शुक्र सम्बन्धी विकार हर
६. मेथिका फल-रूक्ष, उष्णवीर्य, कास, वातरोग, कफज
पित्तरोग तथा वमन शान्तिकारक।
अथ काकमाचिका
काकमाचिज्नितं मृदुशाकं वोसवारमिलितेन सुवासम् ।
तप्ततैलतपनेन सुपाकं केन प्राप्य न कृतं सुखहासम् ॥ १२५ ॥
काकमाची
क. विधि-काकमाची (मकोय) का मृदु शाक, वेसवार (मसाला) सहित, तप्त तैल
में पक्व एवं सुगन्धित शाक को करना है। जिस व्यक्ति ने सुखहास (सुखपूर्वक
हँसा नहीं, इस शाक को भक्षण करके मुख (आनन्द पूर्वक मुक्त रूप) से हंस
सकता है।
काकमाची बहुगुणा कटुतिक्ता रसायनी ।
चक्षूरोगहरा हिक्कावमिहृद्रोगनाशिनी ॥ १२६ ॥
ख. गुण- १. बहुगुणा २. कटु-तिक्त
३. रसायन ४. चक्षुरोगहर
५. हिक्का ६. वमन
७. हृद्रोग (रोग नाशक- ४-७)