क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 136 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ | क्षेमकुतूहलम्
अथ चूकाशाकम्
चुक्रकं सुतिलतैलपाचितं
सूपधूपमिलितं ससैन्धवम्।
वृन्तकेन सहितं सुसौख्यदं
भामिनीव मिलिता सुकामिनम्॥ १४९॥
चुक्रं चुक्रतरं स्वादु वातघ्नं पित्तकृत्परम्।
रुच्यं लघुतरं पाके सवृन्ताकं सुरोचकम्॥ १५०॥
चुक्का शाक (चुक्र)
क. विधि- चुक्र (चुका) के शाक (क्षुप) को शुद्ध तिलतैल में पकते है, फिर क्षुप
धूप (हिंगु) से सुवासित करके, सैंधव लवण सहित मिलाकर सम्यक् रूपेण
पाक करते हैं। इस क्षुप्रीय शाक को वृन्त सहित (वृन्तकेन सहितम्) पकाने का
निर्देश है, जिससे असीम आनन्द की प्राप्ति होती है, जैसे कामाभिलाषी व्यक्ति
को (संयोगवश) सुरुपा-क्षमेच्छुक स्त्री की प्राप्ति हो कर, काम सुख की प्राप्ति
हो जाये (सुसौख्यदं भामिनीव मिलिता सुकाभिनम्)।
ख. गुण- १. चुक्रतर (अम्ल) २. स्वादु
३. वातज ४. पित्तकारक (परम्)
५. रुच्य ६. लघुतर
७. वृन्ताक सहित चुक्रशाक सुरीचक रुचिकर तथा
आहार में रुचि उत्पन्नकारी।
अथ पुनर्नवाशाकम्
पौनर्नवं शाकमतीव मिष्टं
संस्वेदितं मुष्टिभिरेव पिष्टम्।
संपाचितं मिष्टतमे सुतैले
संवासितं हिङ्गुकणेन रुच्यम्॥ १५१॥
पुनर्नवा
क. अति स्वादु-मीठा (पौनर्नवं शाकमतीव मिष्टम्) पुनर्नवा के क्षुप (प्रसारी) को
संस्वेदित (उबाल) कर, हाथों की मुट्ठी (कर-मुष्टिभिरेव पिष्टम्) से पीस-मसल
कर, अत्यधिक मीठे तैल (मिष्टतमे सुतैले)- जैसे श्रेष्ठ कोटि के तिलतैल पर
अथाष्टमोत्सवः १५३
पाक करते हैं (संपाचितम्), तथा (तदनन्तर) हिंगुकणों द्वारा सुधूपित कर लेते
हैं। इस रीति से पुनर्नवा का शाक सिद्ध हो जाता है॥१५१॥
पौनर्नवं हि चाक्षुष्यं तिक्तं रूक्षं कफापहम्।
शोथपाण्डुक्षयश्वासज्वरहृद्रोगनाशनम् ॥ १५२॥
ख. गुण- १. चक्षुष्य २. तिक्त रस
३. रूक्ष ४. कफनाशक
५. शोथ ६. पाण्डु
७. क्षय ८. श्वास
९. ज्वर १०. हृद्रोग (नाशक ५-१०)
अथ चित्रावलीशाकम्
विचित्रं चित्रकं शाकं कासमर्दविमर्दितम्।
तत्तैले सबाहीके पाचितं तक्रसंभृतम्॥ १५३॥
चित्रकः कटुकः पाके वह्निकृत्पाचको लघुः।
श्लेष्मानिलहरो ग्राही रुच्यो वृष्यतरो हि सः॥ १५४॥
चित्रावली (चित्रक)
क. विधि- कासमर्द (मसाले) के साथ, विचित्र चित्रक के शाक का मर्दन करते हैं,
फिर हिंगु सहित तप्त तैल में तक्र मिश्रित करके पाक कर लेते हैं। इस रीति से
चित्रावली शाक सिद्ध हो जाता है।
ख. गुण- १. कटुरस (विपाकी) २. अग्निदीपन (वह्निकृत्)
३. पाचक (पचने में सहायक) ४. लघु (सुपाच्य)
५. कफघ्न ६. वातघ्न
७. ग्राही (मल को बाँधने वाला) ८. रुच्य (रुचि संजनन)
९. वृष्यहर (अत्यन्त वीर्यवर्धन)
अथ कौसुम्भम्
कौसुम्भं कोमलं शाकं कासमर्दविमर्दितम्।
पाचितं तप्तके तैले मन्मन्थविमन्धितम्॥ १५५॥
कौसुम कासजिच्छाकं रूक्ष्मुष्णं च पित्तलम्।
सुस्वादु मधुरं पाके लघु रुच्यं सरं हि तत्॥ १५६॥