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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

१३६ क्षेमकुतूहलम्
अथ शमीफलम्
शमीफलं कोमलबीजसंयुक्तं तप्तोदकस्वेदितमेव केवलम्।
प्रलेहयोगे विधिना विपाचितं सराजिकं वा दधिसैन्धवान्वितम् ॥ ८९ ॥
शमी फल
क. विधि- शमी (छेंकुर) के फलों को कोमल, बीजरहित को संतप्त जल में केवल
स्वेदन (उबाल) करते हैं। इसकी प्रलेह विधि से पक्व (सिद्ध) कर, राजिका चूर्ण
या दधि सैन्धव लवण का मिश्रण कर देते हैं।
शमीफलं लघु स्वादु कुष्ठार्शःकफहत्सरम्।
सुरुच्यं पित्तलं रूक्षं मेध्यं केशविनाशनम् ॥ ९० ॥
ख. गुण- १. सुपाच्य २. लघु
३. स्वादु ४. कुष्ठ-अर्शनाशक
५. कफजन्य विकार नाशक ६. सर
७. रुचिकर ८. पित्तवर्द्धक
९. रूक्ष १०. मेध्य
११. केशविनाशनम्
अथ भैरण्डम्
भैरण्डं कोमलं ग्राह्यं फलं तक्रेण स्वेदितम्।
पाचितं कटुतैलेन हिङ्ग्वार्थं प्रतापितम् ॥ ९१ ॥
कफानिलहरं वृष्यं रूक्षमुष्णं च पित्तलम्।
अग्निसंजननं रुच्यं गुरु पाकेऽतिपिच्छिलम् ॥ ९२ ॥
भैरण्ड फल
क. विधि-कोमल (भैरण्ड) फलों को तक्र में स्वेदित करें, हिंगु से भृष्ट कर सर्षप
तैल में पाक कर लेते हैं- इस रीति से भैरण्ड फल शाक सिद्ध हो जाता है।
ख. गुण- १. कफ नाशक २. वातज
३. वीर्यवर्धक ४. रूक्ष
५. उष्ण ६. पित्तसंजनन
७. पाचकाग्निवर्धन ८. रुच्य
९. गुरु (दुष्पाच्य) १०. अतिपिच्छिल


अथाष्टमोत्सवः १३७
अथ कुटजफलम्
सलिलपरिचितं मुखैकृशानोरथ मथितेन विपाचितं सुतैले।
सुलवणसहितं सहिगुवासं रुचिजनकं गिरिमल्लिकाफलं स्यात् ॥ ९३ ॥
कौटजं सुलघु स्वादु मृदु ग्राहि च शीतलम्।
ज्वरहृद्रोगपित्तासृगुदावर्ताक्ष्यशूलजित् ॥ ९४ ॥
कुटज फल
क. विधि- कुटज (कुड़ा-कोरैया) को अग्नि तप्त जल में स्वेदित (उबालकर) संतप्त
तैल में पाक करते हैं। फिर सैंधव मिश्रित कर, हिंगु धूम से पाचित-सुवासित कर
लेते हैं। यह कुटजफल शाक सिद्ध हो गया-यह रुचिकारक होता है।
ख. गुण- १. सुलघु २. स्वादु
३. मृदु ४. ग्राहि
५. शीतल ६. ज्वर
७. हृद्रोग ८. क्षत
९. अर्श १०. शूल (रोगनाशक ६-१०)
अथ कदलीफलम्
सहिङ्गुकाज्ये हि कृताधिवासं
मोचाफलं सैन्धवसारशालि।
एलामरीचप्रतिवर्धयोगा-
त्रिहन्ति मान्द्यं जठरानलस्य ॥ ९५ ॥
कादल्यं मधुरं शीतं फलं विष्टम्भि पित्तजित्।
स्निग्धं गुरुतरं दाहक्षतक्षयसमीरजित् ॥ ९६ ॥
कदली फल
क. विधि-फल (मोचाफल) त्वक (छिलका) रहित, कर्तन (काट) कर, हिंगु (भृष्ट)
आज्य (घृत) में पाक करते हैं, फिर सैंधव-एला-मरिच चूर्ण मिलाकर, शाक सिद्ध
करते हैं। यह पाचनकाग्नि को तीव्र करता (निहन्तिमान्द्य जठरान लस्य)।
ख. गुण- १. मधुर २. शीत
३. विष्टम्भि ४. पित्तजित्

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