क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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शिरदुला
क. विधि- शिरदुला (नलिनी) के कली (कलिका नैव दलिता) बिना कटी, तक्र में
स्वेदन तथा पीडित करते हैं; इस द्रव्य की प्रभूत (अधिक) घृत में वेसवार
(मसाला) डालकर, मरिच-शुण्ठी-हिंगु (भृष्ट) चूर्ण मिलाकर पाक करते हैं।
ख. गुण- १. रुच्य २. तिक्तरस
३. केश्य ४. मोह
५. भ्रम ६. उष्ण
७. उदरोग ८. प्लीहवृद्धि
९. वात-पित्त-कफ जनित रोग (नाशक ४-५, ७-९)
अथ अगस्तिकुसुमम्
आगस्त्यं कुसुमं तथा मृदुफलं केनाहृतं जन्तुना
धन्यं चाद्य दिनं यदद्य मिलितं कस्यास्यमालोकितम्।
स्विन्नं तक्रयुतं सुहिङ्गुलुलितं तप्ते घृते पाचितं
भोक्त्रा सत्वरभाषितं प्रियतमे नाद्यापि संपाचितम् ॥ १७०॥
आगस्त्यं पित्तकफजिच्चातुर्थकहरं हिमम्।
तत्फलं पीनसश्लेष्मवातन्नक्तान्ध्यनाशनम् ॥ १७१ ॥
अगस्त्य (अगस्ति)
अगस्त्य (अगस्ति) का पुष्प (फूल) तथा मृदु फल (मुलायम फल) किस मनुष्य के
द्वारा लिया गया है (केनाहृतं जन्तुनाम्), जिसकी आज (दिन) को प्राप्ति हो गयी (धन्यं
चाद्य दियं मिलितं कस्यास्मावलोकितम्), आज का दिवास श्रेष्ठ है, किसका मुख प्रातःकाल
ही अवलोकन किया। यह अगस्त्य पुष्प तथा फल की उपलब्धि की व्यंगात्मक/ वक्रोक्ति
पूर्वक प्रशंस है आज का दिन धन्य है, जब अगस्त्य पुष्प की प्राप्ति हुई है।
क. विधि- अगस्त्य का पुष्प तथा मृदु फल तक्र में स्वेदित करके, हिंगु (भृष्ट) देने
के व्यह, घृत में पाक करते हैं- इस (सरल) रीति से अगस्त्य शाक सिद्ध हो
जाता है।
इस शाक को भक्षण करने वाला कहता है, हे ! प्रियत में आज भी अगस्त्य के
शाक का पाक किया है या नही अर्थात् भोक्त की यही शाक भक्षण की प्रबल
अभिलाषा है।
अथाष्टमोत्सवः १५९
ख. गुण- पुष्पशाक १. वात-पित्तहारक फलशाक
२. चतुर्थिक ज्वर १. पीनस
३. शीतल २. कफ-वातजन्य रोग
४. कफजनित रोग ३. नक्तान्ध्य
५. पित्तजनित रोग (नाशक- १-३)
६. (नाशक- २, ४-५)
अथ अरणीपुष्पम्
अग्निमन्थभवबालबुण्डिका
समरात्रमुदके सुसंधिता।
तक्रसिक्तघृतपाकपाचिता
हिङ्गुना जनितवासवासिता ॥ १७२ ॥
अग्निमन्थोऽतिहृद्यश्च त्रिदोषशमनः सरः।
आध्मानच्छर्दिहा शोथचक्षूरोगविषापहः ॥ १७३ ॥
अरणी पुष्प
क. विधि- अरणी (अग्निमन्थ बुण्डिका) को नवीन (बाल) कलिका को ग्रहण
करके, एक सप्ताह (सप्त रात्रि) पर्यन्त जल में स्थापित कर देना चाहिए (फिर
तक्र में स्वेदन (उबाल देते) करते हैं; सुगंधित कर घृत में पाक कर लेते हैं।
ख. गुण- १. अत्यधिक वल्य २. त्रिदोषशामक
३. सारक ४. आध्मान
५. वमन ६. शोथ
७. नेत्ररोग ८. विषजन्य विकार
(नाशक- ४-८)
अथ शणपुष्पम्
सुस्विन्नं शाणकं पुष्पं तक्रे तैले विपाचितम्।
हिङ्गुना वासितं वेल्लसुचूर्णेनावचूर्णितम् ॥ १७४॥
शणपुष्पं सरं बल्यमसृग्प्रदरनाशनम्।
मधुरं रुचिदं पाके किञ्चिद्विष्टम्भाकारकम् ॥ १७५॥