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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 136 में से

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१६० | क्षेमकुतूहलम्
शणपुष्पम्
क. विधि- शणपुष्प (सनई के फूल) को तक्र में स्वेदन (उबाल कर) करते हैं, इसे
तप्त तैल में हिंगु से सुगन्धित कर, अम्ल पदार्थ का चूर्ण मिश्रित करके-पाक
चूर्ण करते हैं।
ख. गुण-
१. सर | २. बल
३. असृक प्रदर | ४. मधुर
५. रुचिद | ६. मधुर विपाकी
७. रुचिवर्धन | ८. अल्प विबन्धकारक
(नाशक-४-८)
अथ मधूकपुष्पम्
सद्यश्च्युतं स्थूलमधूकपुष्पं
संशोधितं केसरधूलिवर्जितम्।
संपाचितं शुभ्रसिताघृताभ्यां
सजीरकं जीवनदं हि जीविनाम्॥ १७६॥
बृंहणीयं सुमधुरं मधूककुसुमं गुरु।
वातपित्तप्रशमनं हृद्यं रुच्यं मुखप्रियम्॥ १७७॥
इति पुष्पाधिकारः।
मधूक पुष्प
क. विधि- स्वयं-तुत्वारित (सद्यच्युत) पतित (गिरे हुए) मधूक के स्थूल (बड़े)
पुष्प (फूलों) को लेकर, पुष्प केशर को निकाल देते हैं, तथा जल से प्रक्षालित
(धोकर), शुद्ध कर लेते हैं। तदनन्तर, इस द्रव्य को घृत में भृष्ट जीरक (छोंक)
देते हैं, फिर श्वेत शर्कर मिलाकर, पाक कर लेते हैं। यह प्राणियों (जीविनाम्)
को जीवन (जीवनदंहि) प्रदान करता है।
ख. गुण-
१. वृंहणीय (मांस वर्धन) | २. सुमधुर
३. गुरु (गरिष्ठ) | ४. वातपित्त शामक
५. हृद्य | ६. रुच्य
७. मुख प्रियम् (मुँह को अच्छा बनाने वाला)
पुष्पाधिकार समाप्तः


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अथाष्टमोत्सवः | १६१
अथ पल्लवाः ।
अथ तोरई पत्र शाकम्
कोशातकीवल्लिभवाग्रपल्लवाः
सुपीडितास्तक्रयुताः सुसंभृताः।
संभर्जिताः सैन्धवहिङ्गुनाऽधिके
तैलेऽतिरुच्या तनुपुष्टिदायिकाः॥ १७८॥
कोशातकी पल्लव
कोशातकी (तोरई) नामक वल्ली (लता) के अग्रभाग में उपलब्ध पल्लवों
(कोमल पत्रों) को एकत्र करते हैं, जिनको तक्र (मट्ठा) में स्वेदिह (उबालकर) पीड़ित
(कर), पिण्डाकार बनाकर, अधिक मात्रा में तैल में, हिंगु (भृष्ट) कर सैंधव लवण
(छोंककर) भून लेते हैं (संभर्जितः)। इस रीति से सिद्ध शाक शरीर को दृढ़ता प्रदान
करता है, अतिरुचिंदायक है (अतिसच्च तनु हरदायिकाः)।
अथाम्रपल्लवाः
स्विन्ना निष्पीडिताः कामं कोकिलाहापल्लवाः।
घृतसिन्धूत्थसंंसिद्धा रुच्या रामठवासिताः॥ १७९॥
सर्पिषा खण्डयुक्तेन तलयेदाम्रपल्लवम्।
लवङ्गाद्र्रकसंयुक्तमरुचौ रुचिकारकम्॥ १८०॥
आम्रपल्लव
सर्वप्रथम कोकिलाहार (आम्र) के मृदु पत्रों या पल्लवों को एकत्र करते हैं; इनकी
घृत एवं खण्ड में तलते (तलयेदाम्रपल्लवम्) हिंगु (भृष्ट) सहित, इसी में लवंग (लौंग)
एवं आर्द्रक (अदरक) की चूर्ण मिश्रित कर देते हैं। यह शाक अरुचि का निवारण कर,
रुचिकारक होता है।
अथ निम्बपल्लवाः
निम्बस्य कोमलतराणि दलानि भृष्ट्वा
स्वाज्ये क्षिपेत्तदनु सैन्धवयुक्ततक्रे।
शालेयतण्डुलकणैः सह रामठेन
वाधारितं ददति रोचनमेव लेह्यम्॥ १८१॥