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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 136 में से

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पृष्ठ 86

१६६ क्षेमकुतूहलम्
अथ सूरणशाकम्
अम्लीकापचूर्णेन मिश्रितेन जलेन वा।
काञ्जिकेनाऽथवा क्वाथ्यः सूरणो रौद्रताँ ज्यजेत् ॥ १९५ ॥
दिग्धो बाह्लीकतोयै रजनिरसयुतैर्गोचरे सूर्यमेरोः
संक्षिप्योत्क्षिप्य पात्रे तिलरससहिते साधितः सैन्धवेन।
जातः स्निग्धः सुगन्धिर्मरिचपरिचितः पाकरागं दधानो
दुर्नामघ्नस्तु कन्दः सपदि मदयते प्रार्थितो जाठराग्निम् ॥ १९६ ॥
सूरण शाक
क. विधि- १) चिंचा (अम्लीका) पत्रों (चूर्ण) के जल अथवा कांजिक में क्वथित
(उबाला हुआ) सूरण अपना रौद्ररूप (भयंकरता) का परित्याग कर देता है।
२) सूरण ग्रह सुमुहूर्त में सम्पन्न करने का विधान है- उदयाचल मेरुपर्वत (सूर्यमेरोः)
के ऊर्ध्व गोचर (रजनिरसयुतैर्गोचरे) होने पर सूरण कन्द उबाल (स्वेदन) करके
(वल्कलसहित रहित अवस्था में काटकर) रजनिरस (हरिद्रा रस) तथा हिंगु जल
(बाह्लीक तोय) के साथ, तिलतैल (तिल रस सहित) युक्त पात्र में- सैन्धव
सहित-पाक कर लेते हैं, एवं फिर सुगन्धित पदार्थ तथा मरिचचूर्ण कर मिश्रण
कर देते हैं।
ख. गुण- इस सूरण कन्द शाक का सेवन से दुर्नाम (अर्श) का नाश होता है तथा
पाचकाग्नि प्रदीप्त हो जाती है।
कन्दस्तूदरमृत्तिकाभिरहितः संवेष्टितोऽसौ मृदा '
कारीषानलपाचितस्त्वगयुतः क्षोदीकृतो मिश्रितः।
शुद्धः सैन्धवतैलजीरकरजज्जम्बीरनारार्द्रकै-
र्जड्यं पाण्डुरता तथैव हरते वह्नेरयं पूरणः ॥ १९७॥
सूरण कद शाक : अन्य प्रकार
अ. सूरण कन्द की प्राकृतिक चिपकी मृत्तिका (भूमिगत) को निष्कासित-स्वच्छ
करके, मृदा (मिट्टी) का अविष्टन (लेप) करते हैं; इसको करीषानल (उपलों की
आग) में पका लेते हैं। जब शीतल हो जाये, तब वल्कल (त्वक्) विहीन करके,
क्षोदित (मसलकर) भर्त्ता बनाते हैं, जिसमें सैन्धव, तिल तैल, जीरक चूर्ण,
परिपक्व जम्बीर रस एवं आर्द्रक का मिश्रण कर देते हैं।।१९७।।


अथाष्टमोत्सवः १६७
इस प्रकार का सूरणकन्द (भर्त्ता रूप) शरीर जाड्य (जड़ता) एवं पाण्डु रोग नाशक
हैं, एवं पाचकाग्नि वर्धन होता है।
सूरणं कटुतैलेन तलित्वाऽम्लरसैः सह।
शोषयेद्वेसवाराढ्यं यथा भोक्तुरभीप्सितम् ॥ १९८ ॥
आ. स्विन्न सूरण कन्द (उबाले हुए) सूरणकन्द (त्वक् रहित) को काटकर, कटु तैल
(सरसों के तैल) में तलन करते हैं (तलते हैं) इसमें अम्लरस के साथ वेसवार
(मसाला) छोड़कर, शुष्क करते हैं अथवा भोक्ता की इच्छानुसार (रुचि) के
अनुसार निर्माण करना चाहिए।
मृल्लिप्तं सौरणं कन्दं पक्त्वाऽग्नौ पुटपाकवत् ।
अद्यात्सपैललवणं रामठेनानुवासितम् ॥ १९९ ॥
इ) मृत्तिका आलेपित सूरण कन्द (मृल्लिप्तम्) को पुटपाक विधान के अनुसार
अग्नि में पाक करते हैं, फिर हिंगु (भृष्ट) को तैल तथा सैन्धव में सुगन्धित
बनाकर प्रस्तुत करते हैं।
सूरणोऽग्निकरो रूक्षः कासार्शःकर्तनो लघुः ।
सन्धानयोगसंप्राप्तादस्तिगुणकारकः ॥ २०० ॥
ई) सूरण कन्द अग्नि (पाचकाग्नि) वर्धन तथा रूक्ष है, कासहर, अर्श (कर्तन) एवं
सुपाच्य है (संधान योग संप्राप्तम्) संधान विधि से निर्माण करने पर, इसके
गुणों में वृद्धि हो जाती है (अस्तिगुण कारक)।
अथ मृणालकन्दशाकम्
बिसाङ्कुरा भोक्तृशोङ्कुरोथिताः
समाहृताः कृष्पलगादगाधतः ।
संकृत्तखण्डास्तनुतारकप्रभाः
प्रलेहयोगैः सुधिया विपाचिताः ॥ २०१ ॥
मृणालं दुर्जरं शीतं पिच्छलं कफवातकृत् ।
कषायं मधुरं स्वादु विष्टम्भाध्मानकारकम् ॥ १०२ ॥
मृणालकन्द शाक
क. विधि- भोक्ता के यश को अंकुरित (वृद्धि) करनेवाले, मृणालकन्द-बिसांकुर