क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 136 में से
संदर्भ में पढ़ें१४८ क्षेमकुतूहलम्
शिखा के साथ चणक शाक को अम्ल तक्र में स्वेदन करते (उबालते) हैं; फिर हिंगु
तथा लवण के साथ, घृत में भर्जित कर शुण्ठी चूर्ण को मिश्रित कर देते हैं।
ख. गुण- १. दुर्जर (दुष्पाच्य) २. वातकारक
३. विष्टम्भकारक (पुष्परहित शाक) ४. हृद्य
क्षाराम्लभावसहजाश्चणकप्रवालाः
संमर्दितामरिचसैन्धवशृङ्गवेरैः।
संचूर्णिताः कटुकतैलयुतैः समस्तै-
र्भृष्टैः सुहिङ्गुजकणैः परिदत्तवासाः ॥१३५॥
क्षारीय शाक : चणक
प्राकृतिक (स्वाभाविक) रूप से क्षारीय एवं अम्ल चणक के मृदु प्रबल (पत्रों) को
सम्यक् मर्दन करके, मरिच-सैंधव-शुण्ठी चूर्ण सहित, कटुतैल (सरसों के तैल) में
भर्जित (भून) कर लेते हैं; फिर हिंगु (भृष्ट) से सुगन्धित (परिवासक) करते हैं।।१३५।।
चाणकं शाकमुद्दिष्टं दुर्जरः कफवातकृत्।
विष्टम्भजननं हृद्यं विशेषात्पुष्पवर्जितम्॥१३६॥
अथ चञ्चुशाकम्
चञ्चुशाकजमिदं मृदुपत्रं
स्वेदितं तुषजलेन नितान्तम्।
तैलहिङ्गलवणैः सुपाचितं
कस्य नो दिशति चेतसोत्सवम्॥१३७॥
चञ्चुः शीता सरा रूक्षा स्वादुर्दोषत्रयापहा।
धातुपुष्टिकरा बल्या मेध्या पिच्छिलिका हि सा॥१३८॥
चञ्चुशाक
क. विधि- चञ्चु के मृद पत्रों (मुलयम पत्ते) को तुषोदक में स्विन्न करके (उबाल
कर), तैल-हिंगु-लवण के साथ पाक करते हैं। इस रीति से सिद्ध शाक से किसी
भोक्ता के मन में आनक उत्पन्न नहीं होगा- सभी भक्षण कर्त्तव्यों को प्रसन्ननता
दायक होता है।
अथान्नभोगोत्सवः १४९
ख. गुण- १. शीत २. सरा
३. रूक्ष ४. स्वादु
५. त्रिदोषहर ६. धातुपुष्टिकर
७. बल्य ८. मेध्य
९. पिच्छिल
अथ नाडी(ली) शाकम्
नालेन रहिता नाली सुस्विन्ना मुष्टिपीडिता।
घृते तप्ते परिक्षिप्ता चिञ्चिणीपत्रसंयुता॥१३९॥
नाली सरा लघुः शीता पित्तनुत्कफवातला।
व्रणशोथहरा ज्ञेया लिप्ता शोथघ्निका मता॥१४०॥
नाडी शाक
क. विधि- नाड़ी (नली) शाक-वाली रहित-को स्विन्न करते (उबालते) हैं, तथा
मुष्टि (मुट्ठी) से मर्दित कर-भर्जित कर- पिण्डी कर लेते हैं; तप्त घृत में चिंचा
इमली केक पत्रों के साथ (अग्निपर) घृत में डाल देते हैं। इस रीति से नाड़ीशाक
सिद्ध हो जाता है।
ख. गुण- १. सर २. सुवाच्य
३. शीतल ४. पित्तशामक
५. कफजनन ६. वाल कारक
७. व्रण ८. शोथ (नाशक-७-८)
९. नाड़ी का लेप शोथनाशक
अथ पालिक्यशाकम्
पालिक्यं दलितं शाकं तिलतैले विपाचितम्।
अम्लद्रव्यसमाकीर्णं हिङ्गुसैन्धवसंयुतम्॥१४१॥
पालिक्या वातला शीता भेदिनी श्लेष्मला गुरुः।
विष्टम्भजननी चैव नेत्ररोगकरी हि सा॥१४२॥
पालकी शाक
क. विधि- पालकी को कर्तन करके, तिलतैल में अम्ल द्रव्य का चूर्ण, हिंगु तथा
सैन्धव चूर्ण डालकर शाक को पक्व कर लेते हैं।