क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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१५४ क्षेमकुतूहलम्
कौसुम्भ (कुसुम्भ)
क. विधि- कुसुम्भ (बैर) का मृदु (कोमल) शाक को कासमर्द (वेसवार-मसाला से
सुगन्धित करके तथा मर्दन पूर्वक) सैंधव मिलाकर, तप्त तैल में डालकर पाक
करते हैं। इस रीति से कौसुम्भ शाक प्रस्तुत है।
ख. गुण- १. कासजित २. रूक्ष
३. उष्णवीर्य ४. पित्तजनन
५. स्वादु ६. मधुरविपाकी
७. सुपाच्य (लघु) ८. रुच्य (रुचिवर्धन)
९. सर (सुखविरेचक)
अथ शिखाली
श्रीबालकदलं ग्राह्यमारनालेन तापितम्।
पिण्डितालोडितं तैले कासमर्दसमन्विते॥ १५७॥
वातपित्तहराबल्या विबन्धाध्माननाशिनी।
कफकृन्मूत्रकृच्छ्रघ्नी भेदनी सा रसायिनी॥ १५८॥
शिवाली
क. विधि- शिवाली (श्रीबालक) के पत्रों (दल) को आरनाल के साथ उबालते
(तापितम्) है, निचोड़कर पिण्डी की आवृत्ति में बनाते हैं। तत्पश्चात् सुगन्धित
द्रव्य कासमर्द (मसाला) आदि सम्मिलित करके, तैल में पाक करते हैं।
ख. गुण- १. वातघ्न २. पित्तशामक
३. वल्य ४. विबन्ध हर
५. आध्मान नाशक ६. मूत्रकृच्छ्र नाशक
७. मलभेदन ८. रसायन
अथ जीवन्तीशाकम्
जीवन्त्या कोमलं पत्रं स्विन्नं तक्रे सुपिण्डितम्।
हिङ्गुना भर्जितं तैले तक्रं क्षिप्त्वा प्रलेहितम्॥ १५९॥
जीवन्ती बृंहणी वृष्या गुर्वी रुच्या रसायनी।
चक्षुष्या सर्वदोषघ्नी प्रोक्ता मधुरपाकिनी॥ १६०॥
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अथाष्टमोत्सवः १५५
इति पत्रशाकाधिकारः।
जीवन्ती
क. विधि- मृदु (कोमल) पत्रों को तक्र में स्विन्न (उबाल) करते हैं, निचोड़कर पिण्डी
के आकार का बना लेते हैं; फिर हिंगु (भृष्ट) कर तक्र में डालकर, प्रलेह की भाँति
पाक कर लेते हैं। इस रीति से जीवन्ती शाक (प्रलेह ८) का निर्माण हो जाता है।
ख. गुण- १. बृंहण २. वृष्य
३. गुरु ४. रुच्य
५. रसायन ६. चक्षुष्य
७. सर्वदोषघ्न ८. मधुर विपाकी
पत्रशाक प्रमेद पूर्ण।
अथ पुष्पशाकम्
अथ करीरकुसुमम्
कारीरं कुसुमं सुधर्मनिहितं
सद्गारिणा संयुतं
समहेन विपाचितं सलवणं
हिङ्ग्वाढ्यतैले भृशम्।
क्षिप्तं तक्रवरं सुकाञ्जिकमथो
सद्वेसनेनान्वितं
भोक्तार केन समर्चितः प्रतिदिनं
श्रीपार्वतीशः स्वयं॥ १६१॥
कारीरं कुसुमं भेदि कटुकं कफनाशनम्।
पित्तहृद्रुचिरं भव्यं कषायं पथ्यपदं भृशम्॥ १६२॥
करीरपुष्प
क. विधि- करीर पुष्प सुघर्म निहित (धूप में सूखे हुए), जल में स्विन्न (उबाले)
हुए, लवण तथा हिंगु से युक्त तैल (अधिक) में भर्जित करते (भूनते) हैं। इसे
एक सप्ताह तक पाक करते हैं, बेसन या तक्र मिलाकर।