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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

१३० क्षेमकुतूहलम्
कारवेल्लीफल
कारवेल्ली (करेला) का फल बाह्य स्वरूप में मरकत मणि के समान श्यामवर्ण,
आभ्यन्तर प्रवाल जैसा रक्तवर्ण फल, यह भोक्ता की कामना है, यह उसके प्रत्येक ग्रास
में रहे॥६६॥
कारवेल्लीफलं तक्रे स्वेदितं हिङ्गुमर्दितम्।
भर्जितं नवनीतेन सैन्धवेन समन्वितम् ॥ ६७॥
अथ कर्कोटकफलम्
विदलितमुखमीषत्कारवेलं कठोरं
पुलकितमिव तैले साधितं रामठेन।
चरितमरिचचूर्णं सैन्धवेनातिपूर्णं
पुलकितरसनाग्रं लोलतामातनोति ॥ ६८॥
१. विधि- कारवेल्लक फल को तक्र में स्वेदित (उबाल) कर, हिंगु मर्दित करके,
नवनीत के साथ भर्जित कर (भून) लेते हैं, फिर सैंधव मिश्रित करते हैं- यह
शाक निर्माण की रीति है।
२. कठोर प्रकार के कारवेल्लक का मुख काट (दलित) कर, हिंगु मिलाकर (भृष्ट)
संतप्त तैल में सिद्ध (पाक) करके सैंधव एवं मरिच चूर्ण मिलाकर शाक-
विधि को पूर्ण करते हैं। इस रीति से निर्मित शाक का आहार करने से जिह्वा
का अग्रभाग-चंचल प्रकार का-और लोलुप हो जाता है (जिह्वा लौल्य के
वशीभूत)॥६७-६८॥
कारवेल्लीफलं भेदि लघु तिक्तं च शीतलम्।
पित्तास्रकामलापाण्डुकफमेदः कृमीञ्जयेत्॥६९॥
ख. गुण-कर्म- १. भेदन (सारक-रेचक) २. लघु (सुपाच्य)
३. तिक्त ४. शीतल
५. रक्तपित्त-कामला-पाण्डु-मेदरोग-कृमिरोग
६. कफजनित विकार
अथ कर्कोटकफलम्
ईषद्विभिन्नमरिचैः परिपूर्णगर्भं
तैलेन राद्धमथ सैन्धवजातयोगम्।
अथाष्टमोत्सवः १३१
बाह्लीकयुक्तपयसा विहिताभिषेकं
कर्कोटकीफलमिदं रुचिकृन्नराणाम् ॥ ७० ॥
कर्कोटक फल
क. विधि- कर्कोटकी (कर्कोटक) फल के मुख का अल्प विदारण करके, उसके अन्दर
मरिच चूर्ण-सैंधव का पूरण करें तथा तप्त तैल में-अल्प पाक (सिद्ध) करते हैं,
तदनन्तर हिंगु युक्त जल मिलाकर पकाते हैं फिर अग्नि से हटा लें॥७०॥
फलं कार्कोटकं कुष्ठकिलासारुचिनाशनम्।
भेद्यं रुचिकरं वृष्यं कटु पाके च दीपनम् ॥ ७१ ॥
ख. गुण-कर्म- १. अरुचिहर २. भेदन
३. रुचिकर ४. वृष्य
५. दीपन ६. कटुविपाकी
अथ हरितचणकरन्थनम्
सुहरितहरिमन्थः क्षोदक्षुण्णो नखाग्रैः
प्रथममुदकसिक्तो वेसवारेण सिद्धः।
लवणमरिचसङ्गात्तैलहिङ्गुप्रसङ्गा-
च्छिखर्यति हि भोक्तुर्जाठरं मन्दवह्निम् ॥ ७२ ॥
हरितचणक-हरिमन्थ
क. विधि- हरिमन्थ (हरा चना) को फलों को ऊँगली (नख) से अग्रभाग को
विदीर्ण कर, बीजों का निष्क्रमण करें तथा कुचलें (क्षोदक्षुण्णो नखाग्रै)। जल से
प्रक्षालनोपरान्त तेल से हिंगु (भृष्टकर) पाक करते हैं, फिर लवण-मरिच का चूर्ण
मिश्रित कर देते हैं।
ख. गुण- हरिमन्थ शाक खाने से पाचकाग्नि (जो मन्द हो गयी हो) को तीव्र हो
जाती है॥७२॥
छोलाविधानकफलं परिगृह्य शुद्धं
तप्ते घृते सपचितं क्वथितोष्णाभ्याम्।
संसाधितं सुरभितं शुचिरामठेन
जिह्वातले विशति नर्तति च प्रकामम् ॥ ७३ ॥