सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 87

१६८ क्षेमकुतूहलम्
(भिंसौड़ा-भिस) को कष्यज (अगाधजल) से निष्कासित कर, दुर्बल तारा के प्रकाश
(अनुतारकप्रभवः) में कन्द के छोटे-छोटे खण्ड टुकड़े (सकृत्त खण्डाः) बना लेते
हैं; इसको प्रलेह-विधि से बुद्धिमान् (सुधिया) मनुष्य पाक करते हैं (विपाचिताः)।
ख. गुण- १. दुर्जर (दुष्पाच्य) २. शीत (शीतल)
३. पित्तनाशक ४. कफ जनन
५. वातजनन ६. कषाय रस
७. मधुर रस ८. स्वादु (स्वादिष्ट)
९. विष्टम्भ (मलावरोधक) १०. आध्मान कर
संख्याऽनन्ता कति कति न ते शाकपाकप्रभेदाः
किं तैरुक्तैरहितविरसैरल्यसत्त्वप्रदुष्टैः।
मूलं पत्रं कुसुममथवा पल्लवंवा फलं वा
भक्त्या राद्धं भवति चतुरैः सर्वमेवातिरुच्यम्॥२०३॥
शाक पाक : सामान्य ज्ञातव्य
अ. शाक संख्या- अनन्त संख्य युक्त शाक क्या पाक भेद से नहीं हैं अर्थात्
शाकों की संख्या अपरिगणनीय है, परन्तु उनका नामोल्लेख का वर्णन करने से
कोई लाभ नहीं, जो अहितकर, विरस, अल्प सत्त्वं (बलहीन) तथा प्रदूषित होते
हैं।
आ. स्वभक्ति पाक- मूल, पत्र, कुसुम (पुष्प), पल्लव (नवीन पत्र) तथा फल
(कन्द-दण्ड-नाल सहित)- ये जो भी शाक (वर्गों में उल्लिखित) हैं ये सभी
शाक चतुर (बुद्धिमान) सूपदक (पाचक) पर निर्भर करता है, कि वह श्रद्धापूर्वक
(भक्ति से) इनका पाक करे, तब ये शाक उत्पन्न रुचिकर (सर्वमेतातिरुच्यम्)
सिद्ध होते हैं।
अतिजीर्णमकालोत्थं रूक्षंसिद्धमभूमिजम्।
जरठं कोमलं चातिशीतव्यालादिदूषितम्॥२०४॥
तत्स्र्वं वर्जनीयं हि भिषजा हितकारिणा।
सुशुष्कं सकलं शाकं नाश्नीयान्मूलकैर्विना॥२०५॥
अथाष्टमोत्सवः १६९
इ. वर्जित शाक
इन शाकों या उनकी विशिष्ट अवस्थाओं को निषिद्ध शाकों की श्रेणी में रखा गया
है, यथा-
१. अत्यन्त जीर्ण (जीर्ण-शीर्ण स्थिति)
२. अतिरूक्ष (बहुत शुष्क)
३. निकृष्टस्थानोत्पन्न (निन्दनीय स्थल में उगा हुआ)
४. अतिपुराण (बहुत पुराना)
५. अतिकोमल (बहुत मुलायम)
६. हिम, सर्प आदि से दूषित (शीत व्यालादि दूषित)
७. अकालोत्थ (असमय-ऋतु के विपरीत उत्पन्न)
इन समस्त प्रकार के शाक-द्रव्यों को भिषक् (महानस से सम्बन्धित) को वर्जित
कोटि में रखना चाहिए। समस्त प्रकार के शुष्क शाकों का भक्षण नहीं करे,
(सशुष्कशाकम्), परन्तु मूलक शाक सेवनीय होता है।
सर्वं शाकमचक्षुष्यमजिग्नेयमपौरुषम्।
विना पटोलवास्तूककाकमाचीपुनर्नवाः॥२०६॥
हानिकारक शाक
१. पटोल (परवल)
२. वास्तुक (बथुआ) इन चार प्रकार के शाकों (१-४) को छोड़कर सर्वप्रकार
३. काकमाची (मकोय) के शाक नेत्र, नासा तथा पौरुष (पुरुषत्व) के लिए
४. पुनर्नवा (सोठी) हानिकर होते हैं।
सर्वासां शाकजातीनां प्रकारः कथितो मया।
सन्धानवटकादीनामुच्यते तदनन्तरम्॥२०७
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्मविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
मत्स्यमांसप्रशंसनो नामहृष्टमोत्सवः।।८।।
उपसंहारात्मक रूपरेखा
मैंने समस्त प्रकार के शाको के प्रकारो भेदो-जातियो) का वर्णन किया है। इसके
पश्चात् (आगामी उत्सवनवम मे) सन्धान तथा वटक के विषय में वर्णन करेंगे।
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का विविधशाक
निर्माण वर्णन नामक आठवां उत्सव समाप्त॥