क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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है। (भलीभाँति पकाकर)। यह वास्तुक शाक अवलोकन मात्र से पुरुषों की जिह्वा
को चंचल वसाने की विशिष्ट प्रभाव युक्त होता है (चपलपति रसज्ञां वीक्षणादेव
पुसोम)॥१०३-१०४॥
ख. गुण-
१. पाचन
२. रुच्य
३. लघु
४. शुक्रवर्धन
५. बल्य
६. क्षर
७. प्लीहावृद्धि
८. अर्श
९. रक्तपित
१०. कृमिरोग
११. त्रिदोष हर (रोगनाशक-७-११)
अथ चौराई
आलोलितं नविनकोमलतण्डुलीय-
मुद्बाष्षितं सलिलकाञ्जिकमेलके च।
पिण्डीकृतं लवणतैलविपाच्यमेत-
न्मन्दाग्निमङ्कुरयति घृतहिङ्गुवासम्॥ १०५॥
तण्डुलीय
क. विधि- चौलाई (तण्डुलीयक) के कोमल शाकक्षुप (नवीन) को कर्त्तन कर, जल
मिश्रित कांजिक में स्वेदन (वाष्पित) करके, जल निष्कासित कर लेते है- पिण्डो
रूप में बना लेते हैं। इसे घृत तथा हिंगु-लवण के सुगन्धित रूप में पक्व कर लेते
हैं।
ख. गुण- यह (तुण्डलीयक) शाक अभिमांद्य नाशक होता है॥१०५॥
कतिपयकरमर्दकैरुपेतं
नवदलकोमलतण्डुलीयशाकम्।
तैलरसपरिपाकहिङ्गुसङ्गं
लवणविपाचितमग्निमान्द्याथि॥ १०६॥
करमर्दकयुक्त तण्डुलीय शाक
किंचित करमर्द (करौंदा) सहित नवीन पत्र (नवदल कोमल) युक्त तण्डुलीय को
स्वच्छ करके, हिंगु (भृष्ट) के साथ तैल के साथ पकाकर, सैंधव चूर्ण का (यथोचित)
मिश्रण करते हैं यह शाक मन्दाग्नि नाशक होता है॥१०६॥
अथाष्टमोत्सवः १४१
तण्डुलीयो लघुः शीतो रूक्षः पित्तकफास्रजित्।
सृष्टमूत्रमलो रुच्य दीपनो रक्तपित्तहा॥१०७॥
तण्डुलीय शाक (मुफ्त) के गुण-कर्म इस प्रकार है-
१. शीतवीर्य
२. रूक्ष
३. पित्तजन्य व्याधि
४. कफजनित रोग
५. रक्तजविकार (नाशक ३-४)
६. मलमूत्र सृष्टिकार
७. रुचिसंवर्धक
८. अग्निदीपन
९. रक्तपित्तशामक
अथ कसोंदी
पत्राधिका प्रथमकोमलकासमर्दी
दालीगलद्विमलतण्डुलपिष्टलिप्ता।
सिद्धा घृतेन मरिचैरवचूर्णिता च
जायेत साऽपि रुचिसंजननी जनानाम्॥१०८॥
कासमर्दी लघुः स्वादुः कासदोषविनाशिनी।
ग्राहिणी रक्तपित्तार्शोविषदोषहरा स्मृता॥ १०९॥
क. विधि- कासमर्द (कसोंदी) के पत्राधिका क्षुप से प्रथम को मल कासमर्दी (पत्र
द्रव्य) को चणक दाली भिष्टी तथा अमल एण्डुल (चावल) की पिष्ट (पिट्ठी) में
लिप्त करके, मरिच चूर्ण मिश्रित कर, घृत में पाक करते हैं। इस रीति से पक्व
शाक व्यक्तियों की आहारभक्षण में रुचि की वृद्धि करता है।
ख. गुण-
१. लघु (सुपाच्य)
२. कासघ्न
३. ग्राही
४. रक्तपित्त
५. अर्श
६. विषजन्य दोष (नाशक ४-६)
अथ देवदालीशाकम्
देवदालीदलं तक्रे स्वेदितं खण्डितं भृशम्।
वेसवारयुते स्वाज्ये भर्जितं हिङ्गुना दृढम्॥११०॥
देवदाजी सरा तिक्ता ह्याम्लपित्तविनाशिनी।
कुष्ठघ्नी कामलाशोथविषघ्नी च रसायनी॥१११॥
क्षे. कु. 10