क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ क्षेमकुतूहलम्
५. स्निग्ध ६. गुरुतर
७. दाह ८. क्षत
९. समीर (वातजन्य रोग नाशक (७-९)
अथ राजमाषादिफलम्
राजमाषमकुष्ठादिफलं बीजविवर्जितम्।
पक्वं घृतेऽथ पत्रं च सर्वोपस्करसंयुतम्॥९७॥
राजमाषं सुहृद्यं च कफपित्तहरं परम्।
आध्मानवातकृद्ग्राहि तत्पत्रं तद्गुणावहम्॥९८॥
राजमाष तथा अन्य फल
क. राजमाष लोहा तथा मकुष्ठ (मोठे-वनमुद्गोकि फल-बीज बहिष्कृत- समस्त
उपस्कर (मसाले जैसे नमक हिंग सहित) डालकर, घृत में पाक करते हैं। यही विधि
(इनके) का शाक में अनुसरण की जाती है (सर्वोपस्कार संयुक्तम्)।
ख. गुण- १. हृद्य २. कफपित्त सुनिवारण
३. आध्मान ४. वातजरोगकर
५. ग्राही ६. पत्रशाक (समान गुण)
अथैरण्डफलम्
तक्रे संस्वेदितं पूर्वं बालमैरण्डजं बालमैरण्डजं फलम्।
पाचितं तिलजे तैले सर्वोपस्करसंयुतम्॥९९॥
ऐरण्डं वातजिद्बल्यं कषायं वातनाशनम्।
आमवातहरं स्निग्धं रुच्यमुष्ण तु पाचकम्॥१००॥
एरण्ड फल
क. विधि- बाल एरण्ड फलों का तक्र में स्वेदन (उबाल कर), जीरक के साथ,
घृत में लवण एवं आर्द्रक युक्त वेसवार (मसाला) मिलाकर पाक करते हैं तिल
के तैल का प्रयोग)।
ख. गुण- १. वातघ्न २. बल्य
३. कषाय रस ४. वातजित
५. आमवातनाशक ६. स्निग्ध
अथाष्टमोत्सवः १३१
७. रुचिकारक ८. उष्णवीर्य
९. पाचक
अथ कोहड
कोहडं क्षीरसंस्विन्नं घृते पक्वं सजीरके।
लवणार्द्रकसंयुक्तं वेसवारेण वेष्टितम्॥१०१॥
पित्तघ्नं मधुरं शीतं रक्तपित्तविनाशनम्।
विष्टम्भजननं हृद्यं सुरुच्यं कफदं सरम्॥१०२॥
कोहड़ फल
क. विधि- फलों को दुग्ध में स्विन्न करें (उबालें); फिर जीरक के साथ घृत में
लवण-आर्द्रक युक्त वेसवार (मसाले) के साथ पाक करते हैं- इस रीति से शाक
सिद्ध हो गया (कोहड़-मथुआ) फलों को निर्मित)।
ख. गुण- १. पित्तघ्ना २. मधुरविपाकी
३. शीतवीर्य ४. मलावरोधक विष्टम्भजनन
५. हृद्य ६. सुरुच्य
७. कफ जनन ८. क्षर (मुखविरेचक)
फलशाकाधिकार समाप्त।
अथ पत्रशाकम्
अथ वास्तुकम्
कृतयवसविवेचम्लानवास्तूंकशाकं
क्वथितमिलिततक्रं तैलहिङ्गुप्रसक्तम्।
लवणमरिचयुक्तं स्पृष्टराद्धं सफेनं
चपलयति रसज्ञां वीक्षणादेव पुंसाम्॥१०३॥
वास्तूकं पाचनं रुच्यं लघु शुक्रबलप्रदम्।
सरं प्लीहार्शः पित्तासृक्कृमिदोषत्रयापहम्॥१०४॥
क. विधि- म्लान (मुरझाये) वास्तुक (बथुआ) के क्षुपो (कृतपवस विवेचम्लान-
घासों-वितो आदि में उत्पन्न होने से) या पत्रों को, तक्र में स्विन्न (उबालकर),
तैल-हिंगु में प्रसक्त करके, लवण-मरिच-चूर्ण के साथ (फेन सहित) पाक करते