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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

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५. स्निग्ध ६. शीत
७. वातरोग नाशक ८. दुष्ट व्रणहर॥८०॥
अथ विषाणीफलम्
द्विखण्डं खण्डितं बालं फलं विषाणसंज्ञकम्।
तप्ते हिङ्गुयुते स्वाज्ये भर्जितं सैन्धवान्वित्॥८१॥
विषाणं शीतलं बल्यं पित्तघ्नं रुचिकारकम्।
पाके लघूतरं प्रोक्तं विशेषाद्विषनाशनम्॥८२॥
विषाण (विषाणी) फल
क. विधि- बालविषाणी (सिंघाड़ा) का द्विखण्ड खण्डित (दो-टुकड़ों में) करके,
हिंगु भृष्ट संतप्त घृत में, सैंधव मिलायें। इस रीति से शाक निर्माण हो गया है।
ख. गुण- १. शीतल २. वल्य
३. पित्तशामक ४. रुचिकारक
५. लघूपाकी (अत्यन्त) ६. विषनाशक (विशेषतः)
अथोदुम्बरफलम्
फलमौदुम्बरं बालमम्लतक्रेण स्वेदितम्।
वेसवारभृते स्वाज्ये पाचितं सैन्धवान्वितम्॥८३॥
शीतं कषायमधुरं रक्तपित्तप्रणाशनम्।
मूत्रकृच्छ्रहरं सम्यग्विबन्धामानकारकम्॥८४॥
उदुम्बर फल
क. विधि- उदुम्बर (गूलर) को अम्ल तक्र में स्वेदन (उबाल) कर, वेसवार
(मसाला) के साथ, घृत में पाक करके, सैन्धव चूर्ण मिश्रित कर देते हैं। इस
प्रकार उदुम्बर फल शाक का निर्माण हो जाता है।
ख. गुण-
१. शीत २. कषाय ३. मधुर रस ┐
४. रक्तपित्त शामक ५. मूत्रकृच्छ निवारक (सम्यक् रूपेण) ├ कारक
६. विबन्ध ७. आध्मान ┘


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अथाष्टमोत्सवः
अथार्द्रकचर्चम्
नापक्वं नातिपक्वं च खण्डितं त्वग्विवर्जितम्।
वेसवारघृतक्षारैः सिद्धं पित्ताग्निवर्धनम्॥८५॥
आर्द्रक चर्चर्
क. विधि- अर्धपक्व (नापक्वं नातिएकवं) खण्डित, त्वक (विवर्जित-छिलका) निकालकर।
वेसवार (मसाला), लवण, घृत के साथ पाक करके, सिद्ध कर लेते है।
ख. गुण- पित्त वर्धक तथा पाचकाग्नि संजनन (वर्धक)॥८५॥
अथ कर्कटीफलम्
त्वग्बीजरहिता प्रौढा गुलिकाकारखण्डिता।
तलिता सुघृते तप्ते कर्कटी वा प्रलेहिता॥८६॥
विपाण्डुखण्डं घृतदुग्धराद्धं विभावितं वल्लिशर्कराभ्याम्।
कृतैलवासं च कटूष्णमेतत्प्रतिक्षणं रोचकमादधाति॥८७॥
कर्कटी फल
क. विधि-
i) कर्कटी (ककड़ी)- त्वक् (छिलका) बीज रहित, गुलिका के आकार का खण्ड
(टुकड़ा) बनाते हैं, इसको घृत में पाक कर लेते हैं। यह कर्कटी फलशाक सिद्ध
हो गया है। इसे संतृप्त घृत में तलन द्वारा अथवा प्रलेह बनाते हैं।
ii) अपक्व कर्कटो खण्डों को दुग्ध में विभावित करके, घृत में संतप्त करते हैं, मरिच
चूर्ण तथा शर्करा मिश्रित कर सुगन्धित बना लेते हैं। एला चूर्ण भी मिलते हैं। यह
कटु सव उष्ण है। भोक्ता को प्रतिक्षण रोचक लगने लगती है॥८६-८७॥
कर्कटी शीतला रूक्षा ग्राहिणी मधुरा गुरुः।
रुच्या पित्तहरा पक्वा पाकोष्णा पित्तकृत्सरा॥८८॥
ख. गुण-
१. शीतल २. रूक्ष
३. ग्राही ४. मधुर
५. गुरु (मरिष्ठ) ६. रुच्य
६. पित्तहरा ८. उष्णपाकी
९. पित्तसंजनन १०. सरा (रेचक)