क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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१३२ | क्षेमकुतूहलम्
हरितेन भृतं क्वापि निर्माणाम्छोलकं क्वचित्।
कथ्यते स्थौल्यकफकृत्किंचिद्वातकरं सरम्॥७४॥
छोला विधानफल
त्वक रहित (शुद्ध) चणक (चना)- जिसे आजकल 'छोला' आदि नामों से
जानते हैं- को संतृप्त घृत में पाक करें; शुण्ठी तथा मरिच चूर्ण की- हिंगु से सुगन्धित
कर मिला देते हैं।
यह विशिष्ट चणक (छोला) जिह्वा तल पर प्रवेश करते ही या चेष्ट नाचने लगता
हैं (जिह्वातले विशति नर्तति)- जिह्वा को स्वाद से प्रिय बना देता है (कटु-तिक्त आदि
रसों के चखने पर)।
पाकान्तर-यह छोला हरा या शुष्क चने (पानी में भिगोकर) का निर्माण किया
जाता है।
मुखगुण-स्थूलता वृद्धिकर, कफवर्धन, अल्पवात कारक तथा सर।।७३-
७४।।
अथ कार्पासफलम्
फलमथ दलशाकं स्वेदितं मुष्टिपिष्टं
क्वथिततिलजतैले हिङ्गुना लब्धवासम्।
वणफलवपत्र स्वादुतां संदधानं
भवति रुचिदमुच्चैरम्लचूर्णेन सार्धम्॥७५॥
कार्पासफल
क. विधि- कार्पास (कपास) के फलों तथा पत्रों को जल में स्विन्न (उबालकर)
करके, मुष्टि (मुट्ठी) से पीस (मसल) लेते हैं; तदनन्तर तिल के तैल में पाक
करके, हिंगु से सुगन्धित करते हैं; फिर आम्रचूर्ण (अमचूर) मिला देते हैं। यह
कार्पास फल सिद्ध हो जाता है॥७५॥
कर्पासफलमत्युष्णं कषायं मधुरं गुरु।
वातश्लेष्महरं रुच्यं विशेषेणस्थिवर्जितम्॥७६॥
ख. गुण- शाक स्वादु होते हुए भी (भोजन) में रुचि को भलीप्रकार वृद्धि करता
हैं। इसके गुण-कर्म रोगोपयोग निम्नांकित है-
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अथाष्टमोत्सवः | १३३
१. उष्ण | २. कषाय | शाक में प्रायः सभी गुण विद्यमान
३. मधुर रस | ४. गुरु | हैं, जो अस्थि-वृद्धिकृत करके पाक
५. वात-कफ नाशक | ६. रुचिकर | करते हैं (विशेषेण्यस्थिविर्णीतम्)।
अथ करीरफलम्
फलं करीरस्य हि बीजवर्जितं
संस्थापितं सोदकभाजने तु।
सुचिक्कणे चाष्टदिनं सुसंस्थितं
वृन्ताकरीत्या सुधिया विपाचितम्॥७७॥
करीरफल
क. विधि- करीर फल (बीज निष्क्रमित) को जल-परिपूर्ण स्निग्ध पात्र में अष्ट
दिनावधि तक रखने के पश्चात्, वृन्ताक शाक वत पाक करना चाहिए- यह
बुद्धिमान (सुधिया) व्यक्ति का कार्य है।
करीरं कटुकं ग्राहि फलमुष्णं रुचिप्रदम्।
कफपित्तदरं किंचित्कषायं वातहृद्धरम्॥७८॥
ख. गुण- १. कटुरस-अल्प कषाय | २. ग्राही
३. उष्ण | ४. रुचिकारक
५. कफपित्त वर्धन | ६. वातरोग हर (परम्)
अथ कपिकच्छू फलम्
कोमलं रोमरहितं स्विन्नमाज्ये विपाचितम्।
सोपस्करे सबाल्हीके सिन्धुजेन समन्वितम्॥७९॥
क. विधि- कोमल रहित फल (फली) को (जल में) स्विन्न करके, हिंगु तथा
उपस्कर (मसाला) मिलाकर घृत में पाक करते हैं, तथा सैंधव चूर्ण का मिश्रण
कर देते हैं- यह शाक का निर्माण हो गया है।।७९।।
कपिकच्छूफलं वृष्यं मधुरं बृंहणं गुरु।
स्निग्धं शीतानिलहरं दुष्टव्रणविनाशनम्॥८०॥
ख. गुण- १. वृष्य | २. मधुर
३. वल्य | ४. गुरु (गरिष्ठ)