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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

६८ क्षेमकुतूहलम्
भक्त के गुण- १. अग्निदीपक, २. पथ्य, ३. तृप्तिकर, ४. मूत्रवर्धक,
५. लघु, ६. सुधौत श्रावित पथ्य, ७. विशद, ८. गुणवान् । जिस धान्य का भक्त
(भात) बनाया जाता है, उसके गुण उसी प्रकार के होते हैं। यहाँ भात (भक्त) पाक का
प्रकार तथा उसका उत्तम गुण बताया गया है॥२२-२३॥
अथ सूपः
तां कण्डितां दधिविमर्दितमुद्गदालिं
संसाधितां लवणगन्धसमायुता च।
ते भुजते कुमुदहासकराधमूर्धा
येषां सदा हृदयाचारुगृहं निष्षण्णः ॥ २४ ॥
सूप (दालि-दाल)
कण्डिता, सुपक्व, लवण तथा सुगन्धित वेसवर, दधि से विमर्दित मुद्ग की दाल
का वह ही भोजन करते हैं, जिनके हृदयरूपी सुन्दर गृह में विकसित कुमुद की भाँति
अर्धचन्द्र को शिरोधार्य किए भगवान शंकर (शिव) निवास करते हैं॥२४॥
अथ मुद्गकुलमाषाः
अर्ध विकसितं स्विन्नाः कुल्माषा मुद्गमाषजाः ।
सैन्धवेन सबाह्लीकाःस्वात्रस्य तु गुणावहाः ॥ २५ ॥
मुद्गसूपो लघुर्ग्राही कफपित्तहरो हिमः ।
स्वादुर्नेत्र्योऽनिलहरः कुल्माषः शुक्रवर्धनः ॥ २६ ॥
मुद्ग-कुल्माष
मुद्ग (मूँग) तथा माष (उरद) आधाखिला हुआ परिपक्व कुल्माषा- की दाल,
सेंन्धा एवं केशर युक्त खाद्य पदार्थ से अन्न के गुणों में वृद्धि होती है।
क. मुद्ग (मूँग) की दाल लघु ग्राही, कफपित्तनाशक तथा शीतल होती है।
ख. माष (उरद) की दाल स्वादु, यक्षुष्य, वातनाशक तथा कफवर्धक होती है॥२५-२६॥
अथ माषः
माषसूपोऽथ कुल्माषः स्निग्धो वृष्योऽनिलापहः ।
उष्णः संतर्पणो बल्यः सुस्वादूरुचिकारकः ॥ २७॥
षष्ठोत्सवः ६९
माषसूप-कुल्माष
माषसूप (उरद की दाल) तक्षा कुल्माष की दाल स्निग्ध, वीर्यवर्धक, वातनाशक,
उष्ण, तृप्तिकर बल्य, स्वादु एवं रुचिकारक होती है॥२७॥
अथ घृतम्
करीषवह्निना तप्तं क्षीरं तदुषितं दधि।
तज्जमाज्यं न तत्त्वाजं नवीननवनीतजम् ॥ २८ ॥
घृत (सर्पि)
करीषाग्नि (उपलों की आग) के पकाये हुए दुग्ध से निर्मित दधि का घृत का
नवीन नवनीत (मक्खन) से निष्कासित आज घृत (बकरी के घी) के समान गुणवान
नहीं कहा जा सकता॥२८॥
मञ्जिष्ठावारिरुचिसारि तनूष्मधारि
सौरभ्यचारि रुचिकारि विलोमहारि।
भुङ्क्ते नरः स खलु सर्पिरिदं नवीनं
यः पार्वतीचरणमौलिमिलोलमौलिः ॥ २९ ॥
विशिष्ट घृत
मंजिष्ठा जल (वारि) के समान आकृति युक्त तन्द्र (पतला), सुगन्धित, रुचि-
कर तथा विलोमवातनाशक, इस नवीन घृत को वही व्यक्ति सेवन करता है, जो
देवी पार्वती के चरणों को (कमलों) को स्वहृदय में अपने शिर पर धारण करता
है॥२९॥
अथ सामान्यं घृतम्
घृतं रसायनं स्वादु पित्तानिलविषापहम् ।
आयुष्यं बृंहणं शीतं पापालक्ष्मीविनाशकम् ॥ ३० ॥
सामान्य घृत
१. रसायन, २. स्वादु, ३. पित्त वात हर, ४. विषघा, ५. आयुष्य, ६. बल्य,
७. शीतल, ८. पाप-दरिद्रा विनाशक।
ये घृत के सामान्य गुण-प्रभाव होते हैं॥३०॥

७० क्षेमकुतूहलम्
अथ गव्यं घृतम्
गव्यमग्निकरं सर्पिः कफपित्तानिलापहम्।
चक्षुष्यं बृंहणं शीतं विपाके मधुरं स्मृतम्॥३१॥
गव्य (गौ) घृत
१. जाठराग्निवर्धक, २. कफपित्तनाशक, ३. वात शामक, ४. चक्षुष्य, ५. बल्य,
शीतल, ७. मधुर-विपाकी। ये गौघृत (गाय के घी) के सामान्य गुण होते हैं॥३१॥
अथ माहिषं घृतम्
माहिषं मधुरं पाके रक्तपित्तानिलापहम्।
सुशीतं बृंहणं वृष्यं चक्षुष्यं रुचिकारकम्॥३२॥
माहिष (भैंस) का घृत (घी)
१. घृत पाक में मधुर, २. रक्तपित्तहर, ३. वातनाशक, ४. शीतल, ५. बल्य,
६. चक्षुष्य, ७. रुचिकर॥३२॥
अथाजं घृतम्
आज्यमाजं हि चक्षुष्यं दीपनं बलवर्धनम्।
श्वासे कासे क्षये पथ्यं लघु गव्याद्गुणावहम्॥३३॥
आज (बकरा की) घृत (घी)
१. चक्षुष्य, २. अग्निदीपन, ३. बल्य, ४. श्वासवर्धक, ५. कासहर (पथ्य),
६. क्षयनाशक (पथ्य)।
ये गोघृत के समान गुणवान्, गौघृत से भी अधिक गुणयुक्त होता है॥३३॥
अथान्नदृग्दोषपरिहारकश्लोकाः
अन्नं ब्रह्मा रसो विष्णुर्भोक्ता चैव महेश्वरः।
ध्यात्वा नारायणं देवमन्नदोषैर्न बाध्यते॥३४॥
या दृष्टिः सर्वलोकेषु दृष्ट्या च स्वभावतः।
आत्मदृग्दोषनाशाय संस्मरेन्नारदं मुनिम्॥३५॥
अन्नगत दृष्टि-दोष दूरी करण
अन्न में दृष्टि-दोष निवारणार्थ मन्त्र (श्लोक) इस प्रकार है-
षष्ठोत्सवः ७१
अन्न ब्रह्मा है, विष्णु है तथा शंकर भोक्त है। नारायण देवता का ध्यान करने
से अन्न को दृष्टिदोष दूषित नही करते। जो दृष्टि सभी संसार में है, जो दृष्टि स्वाभाविक
है, आत्मदृष्टि दोष को नाश करते हैं- इसके लिए नारद मुनि का स्मरण करना
चाहिए॥३४-३५॥
अञ्जनीगर्भसंभूतं कुमारं ब्रह्मचारिणम्।
दुष्टदृष्टिविनाशाय हनुमन्तं स्मराम्यहम्॥३६॥
भोजन पर दुष्ट दृष्टि का निवारण (रक्षण) करने के लिए, अंजनी के गर्भ से
उत्पन्न कुमार, ब्रह्मचारी, हनुमान का स्मरण किया जा रहा है॥३६॥
पठतीत्यादिकं वाक्यं भोजनादौ भिषग्वरः।
सर्वदोषविनाशाय भुक्तं शीघ्रं यथा पचेत्॥३७॥
उत्तम महानसिक वैद्य भोजन के प्रारम्भ में, मुख्य वाक्यों (श्लोकों-पूर्व में
लिखित) से समस्त दोषों के नाशनार्थ पाठ करते हैं, इससे युक्त आहार का पाचन शीघ्र
हो जाता है॥३७॥
पञ्चग्रासं तु मौनेने प्राणापानादिकाश्रितम्।
अन्यद्वैद्यसहालापैः कर्तव्यं भोजनं नृपैः॥३८॥
राजा को चाहिए, पंच ग्रास मौन होकर पंच वायु/प्राणों-यथा प्राण, अपान,
व्यान, उदान तथा समान को स्मरण करते हुए, विशेष अन्न (आहार) राजाओं के साथ
वार्तालाप करते हुए, उनके साथ भोजन ग्रहण में सहभागिता करनी चाहिए॥३८॥
अथ पर्पटः
मुद्द्जीरकवाहीकस्वर्जिका मरिचान्विताः ।
अरोचकजिगीषूर्णां पर्पटाः पुरतो भटाः॥३९॥
अङ्गारभृष्टास्ते श्रेष्ठा न तु स्नेहविपाचिताः।
पर्पटा लघवो रुच्या मुद्रजा विधिपाचिताः॥४०॥
पर्पट (पापड़)
पर्पट (पापड़) का निर्माण जीरक केशर, स्वर्जिका क्षार तथा मरिच के साथ मुद्ग
के साथ करते हैं। इसका सेवन से अरोचकनाशक सभी आहार द्रव्यों मे उत्तम माना
जाता हैं, जब कि स्नेह विपाचित (तैल आदि में मुनि) पापड़ (उसके समान) गुणकारी

७२ क्षेमकुतूहलम्
नहीं होते। सामान्यतः मुद्ग (मँग) के पापड़ लघु एवं रुचिकर आदि गुणों को प्रदान
करते है- (विधिपाचितः)॥३९-४०॥
अथ पटोलफलम्
फलं पटोलं विहितद्विखण्डं विशुद्धद्रव्यार्हत शुष्कपाकम्।
वाघारितं हिङ्कणे सहाज्ये ससैन्धवं बोधयति क्षुधां च॥४१॥
पटोलं पाचनं हृद्यं वृष्यं लध्वग्निदीपनम्।
स्निग्धोष्णं हन्ति कासार्शोज्वरदोषत्रयकृमीन्॥४२॥
पटोल फल (परवल)
पटोल के फलों के द्विखण्डों को घृत-हिंगु में भूनकर, विशुद्ध द्रव्य, (बेसवार) तथा
सैंधव लवण मिश्रित करने के साथ पकाते है (यह अग्निदीपन, पाचक, हृद्य, वृष्य, लघु,
स्निग्ध, उष्ण तथा कास-अर्श-ज्वर-त्रिदोष-कृमिनाशन होता है॥४१-४२॥
अथ ताहडी
निरस्थिवेसवाराढ्यं पलं पक्वं सतन्दुलैः।
घृतार्द्रमार्द्रकैर्युक्तं नाम्ना तत्ताहडी स्मृता॥४३॥
वातपित्तहरा गुर्वी शुक्रपुष्टिप्रदा भृशम्।
गुणानां यो विशेषोऽय मांसभेदात्स जायते॥४४॥
ताहड़ी (ताहरी)
अस्थिरहित वेसवार युक्त तन्दुल (चावल) से पतन, घृत सहित (आर्द्र) तथा
आर्द्रक युक्त मांस-को 'तहड़ी' नाम दिया जाता है। यह मल का आहार है। यह वात-
पित्तनाशक, गुरु तथा शुक्रपुष्टिदायक हैं; ताहडी के गुण अन्य मल के गुणों (मल मुखर
घटक द्रव्य) के अनुसार होती हैं॥४३-४४॥
अथ कृशरा
तन्दुलैः षष्टिसंभूतैः कण्डितैर्न च खण्डितैः।
अष्टभागयुतैर्मुद्गैः संयुक्तैर्द्वादशांशकैः॥४५॥
सार्द्रा नार्द्रा सुगन्धाना सवाहीका वरान्विता।
सस्नेहा कामिनीवेयं कृशरा शिशिरे हिता॥४६॥
कृशरा दुर्जरा बल्या गुर्वी वातविनाशिनी।
बलपुष्टिमलश्लेष्मपित्तविष्टम्भकृत्सरा ॥४७॥


षष्ठोत्सवः ७३
कृशरा (खिचड़ी)
अखण्डित तन्दुल (तण्डुल-चावल) अष्टभाग तथा मुद्ग द्वादश भाग, केशर एवं
सुगन्धित द्रव्य (वेसवार), हरिद्रा मिश्रित- शुष्क या आर्द्र पाक किया जाता है। यह
आहार-द्रव्य घृत के साथ खाने से, नवयौवक (कामिनी) स्त्री के समान शिशिर (हिम)
ऋतु में हितकारी है। यह दुर्जर, वस्त्र, मुद्र, वातनाशक, बल्य, पुष्टिदा, मल-कफ-
वातावरोध (आनाह-विष्टम्भ) जनक तथा सारक होती है॥४५-४७॥
अथ कर्चरी
क्षाराम्लकृतसंस्कारा शुष्का स्नेहविपाचिता।
अरोचकादिरोगाणां कर्चरी कण्ठकर्तरी॥४८॥
कर्चरी रुचिकृद्बल्या सुस्वादी त्वतिलेखनी।
उष्णा पित्तपरा प्रोक्ता कफकृत्सारका स्मृता॥४९॥
कर्चरी (कचरी)
क्षार एवं अम्ल पदार्थों के मिश्रण से पक्व शुष्क कर्चरी बनती है। यह अरोचक
आदि रोगनाशक, कण्ठ कर्चरी (गले को साफ करनेवाले) होती है। रुचि, बलवर्धन,
स्वादु, अतिलेखनी (मल पतला करने वाली), उष्ण, पित्त-कफकारक तथा सारक होती
हे॥४८-४९॥
अथ मूलकम्
सुकलितमतिसूक्ष्मं बालमूलस्य मूलं
लवणमथितमुच्चैः पीडितं पाणियुग्मे।
सुरभितमतिनिम्बूहिङ्गुधूपेन युक्तं
भवति जठरवह्नेस्तूर्णमुद्दीपनाय॥५०॥
मूलक (मूली)
बालमूलक (छोटी मूली) के अत्यन्त सूक्ष्म (पतले) मूल में लवण मिलाकर,
दोनों हाथों से मसलकर, निम्बूक स्वरस तथा भृष्ट हिंगु मिश्रितकर सुगंधित करते हैं।
यह मूलक का आहार-द्रव्य तुरन्त जाठराग्नि का प्रदीपन करता है॥५०॥
मूलकं वातलं रुच्यं वीर्योष्णं पाचनं लघु।
हन्ति दोषत्रयं श्वासं सुष्ठुयोगाच्च पीनसान्॥५१॥

७४ क्षेमकुतूहलम्
महत्तदेव विष्टम्भिर् रूक्षं दोषत्रयप्रदम्।
स्निग्धसिद्धं तदेव स्यद्गोषत्रयविनाशनम्॥५२॥
तत्पुष्पं श्लेष्मपित्तघ्नं फलं वातकफापहम्॥५३॥
वात मूलक (छोटी मूली) शाक के गुण- १. वातनिःसारक, २. रोचक,
३. उष्णवीर्य, ४. पाचक, ५. लघु, ६. त्रिदोष हर (रोगनाशक द्रव्यों के संयोग से),
७. श्वासवृद्धि, ८. पानसनाशक है।
मूलक (बड़ी मूली) आनाहकारक- १. रूक्ष, २. त्रिदोषवर्धक। घृत तलित
मूलक (मूली) त्रिदोषहर। मूलक पुष्प कफपित्तहर तथा फल (फली) वातकफ नाशक
होते हैं॥५१-५३॥
अथार्द्रकम्
भोजनाऽग्रेसदा पथ्यं जिह्वाकण्ठविशोधनम्।
अग्निसंजननं श्रेष्ठअठं लवणाऽर्द्रकभक्षणम्॥५४॥
आर्द्रक (अदरक)
भोजन के पूर्व (आहार भक्षण प्रारम्भ करने के पहले) आर्द्रक (अदरक) खण्ड
(टुकड़ों) को लवण (नमक) मिलाकर खाना सर्वद (सदैव) पथ्य, हितकर तथा
लाभदायक है (भोजनाग्रे सदा पथ्यं निवर्णर्द्रक भक्षणम्- अन्य ग्रन्थ/ संहिता)। यह
जिह्वा तथा कण्ठ का विशोधन कारक है तथा जठराग्नि का श्रेष्ठ रूप से (भलीप्रकार)
प्रदीपन करता है॥५४॥
मृत्त्वचारहितमङ्कुरवच्च क्षालितं सुविमलैर्बहुतोयैः।
मिश्रितं लवणाम्निम्बुपयोभिर्बालमार्द्रकमुमापतियोग्यम्॥५५॥
मृदा एवं वल्क रहित, अंकुर सहित आर्द्रक कन्द-स्वच्छ जल से धौत-सुविमल
कन्द, निम्बू स्वरस मिश्रित लघु खण्ड (आर्द्रक) भगवान् शंकर के सेवन योग्य है; यह
यह स्वादिष्ट तथा सर्वजन प्रिय होती हैं॥५५॥
तैलासूरीरजनिसिन्धुजपङ्कषद्भि-
प्रस्यन्दमाननवनिम्जुरसप्रसिक्तम्।
स्वादूत्तरं शिशिरवासरभोजनेषु
कस्येति वर्णनपथं खलु शृङ्गवेरम्॥५७॥


षष्ठोत्सवः ७५
तैल, राजिका, हरिद्रा तथा सैंधव को निम्बूक स्वरस में आर्द्रक मिश्रित कर;
स्वाद मुक्त शिशिर ऋतु में भोजन के साथ प्रार्थना का किसका विषय नही है। अर्थात्
सेवन योग्य है॥५७॥
एके वदन्त्यमृतमस्ति पुरेसुरणामन्येऽपि चारुवनिताधरपल्लवेषु।
ब्रूमो वयं सकलवैद्यमतानुसारं जम्बीरनीरपरिपूरितशृङ्गवेरे॥५८॥
अमृत रस स्वादी कहते हैं कि देवताओं के नगर (स्वर्ग) में अमृत है, तथा सुन्दर
स्त्री के अधर पल्लव में अमृत का वास बताया गया है (कुछ व्यक्तियों द्वारा)। परन्तु
समस्त वैद्यों का मत है कि जम्बीर (निम्बूक) स्वरस में परिपूरित (लुप्त) शृंगवेर
(अदरक) के अमृत से भी उत्तम होता है॥५८॥
वव्योष्णं दीपनं हृद्यं सस्नेहं लघु पाचनम्।
रोचनं प्रीणनं बल्यमार्द्रकं परिकीर्तितम्॥५९॥
आर्द्रक वृष्य, दीपन, हृद्य, स्निग्ध, लघु, पाचक, रुचिकर, प्रीणन (प्रसन्नतादायक)
तथा बल्य होता है॥५९॥
अथ हरीसाः
कृत्तं निरस्थि संपक्त्रमाज्ये स्वोपस्करान्वितम्।
मांसं गोधूमसंयुक्तं हरीसेत्याह सूदकः॥६०॥
हरीसा (आसा)
अस्थि रहित मांस खण्ड, उपस्कार (वेशवार) से युक्त, गोधूम के साथ घृत में
पकाकर, व्यंजन को पाचक (सूदक) गण हरीसा की संज्ञा देते हैं॥६०॥
बल्या समधुरा गुर्वी शीतोष्णाऽनिलपित्तहा।
स्निग्धा शुक्रप्रदा हृद्या सरा सन्धानकारिणी॥६१॥
हरीसा के गुण- बल्य, मधुर, गुरु, शीतोष्ण, वातपित्तनाशक, स्निग्ध, वीर्यवर्धक,
हृद्य, सर तथा सन्धानकारिणी॥६१॥
अथ मांस्रन्थनविधिः
ग्राम्यस्यानूपजस्यापि जाङ्गलस्याण्डजस्य च।
बिलौकसश्च मांसानां रन्थनस्योच्यते विधिः॥६२॥

मांसरन्धन क्रिया
मांस को पकाने की विधि यह है कि मांस (ग्राम्यज), आनूपज एवं जांगल
प्राणियों तथा अण्डज एवं विलेशय जन्तुओं के मांस का पाक किया जाता है॥६२॥
तलितं भृष्टकं स्विन्नं शुष्कं बहुरसं स्मृतम्।
तान्दूरं वण्टितं चैवं शूल्यं च पुटपाकजम्॥६३॥
तलित, भृष्टक, स्विन्न, शुष्क, बहुरस, तन्दूर (तान्दूर), वण्टित, शूल्य तथा
पुटपाकज आदि विभिन्न प्रकार मांस पाक के होते हैं॥६३॥
तलितं त्रिविधं प्रोक्तं भृष्टकं द्विविधं स्मृतम्।
सुस्विन्नमस्थिगलितं शुष्कं तद्रसव्रर्जितम्॥६४॥
सरसं रसवज्ज्ञेयं तान्दूरं वह्निपाचितम्।
वण्टितं तु शिलापिष्टं तत्पाको बहुधा स्मृताः॥६५॥
तलितं मांस के तीन प्रकार हैं- भृष्ट मांस दो प्रकार का होता है। अस्थि गलित
करने हेतु मांस स्विन्न, रसरहित को शुष्क तथा रसयुक्त को सुरस (सरस), अग्नि पर
पकाने मांस को तन्दूर शिला-पिष्ट मांस वण्टित पाक कहते हैं। यह मांसपाक विविध
प्रकार का होता है॥६४-६५॥
शूलेन पक्वं मांसं यत्तज्ज्ञेयं शूलपाचितम्।
गर्तयन्त्रेण यत्पक्वं तज्ज्ञेयं पुटपाकजम्॥६६॥
एवं बहुविधः पाकः सूपकारधिया कृतः।
यस्य जन्तोर्हि यन्मांसं तन्मासं तद्गुणावहम्॥६७॥
विशेषोऽत्र यदुद्दिष्टः स ज्ञेयः सुष्ठुपाकतः।
शूल (लौह के डंडी पर पकाये मांस का प्रकार) द्वारा पक्व मांस को शूल्य या
शूलपाचित मांस कहा जाता है। गर्ततन्त्र (भूधर तन्त्र) में पकाये मांस को पुटपाकज
मांस कहते हैं। उस प्रकार सूदक (पाचक) के मतानुसार अनेक प्रकार के पाठ होते हैं।
जिस प्राणी का मांस पका है, गुण इसी के अनुसार हो जाते हैं। परन्तु मांस में विशेष
गुण उसकी पाक विधि द्वारा आता है॥६६-६७॥
मांसप्रक्षालनस्य विधिः
एवं बहुविधं मांसं प्रत्यङ्गं च पृथक्कृतम्॥६८॥
स्थूलातिस्थूलविहितं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं च तत्।
खण्डशः कलितं मांसं धान्यहिङ्ग्वम्बुना क्रमात्॥६९॥
क्षालयित्वा पनुर्हिङ्गुतोयमिश्र पचेत्ततः।
मांस प्रक्षालन
मांस के अंग-प्रत्यंग पृथक कर, स्थूल से सूक्ष्म खण्ड बनाकर, हिंगु तथा
धान्यक जल से प्रक्षालन करते हैं, तदनन्तर हिंगु जल मिलाकर मांस का पाक
(अग्निपर) करते हैं॥६८-६९१/२॥
इति प्रक्षालनम्
अथ मांसवाचनविधिः
हिङ्ग्वार्द्रजीरमरिचैर्यैर्युक्तं वेसवारकम्॥७०॥
तच्च तैले पचेत्पूर्वमाज्ये वा सात्म्ययोगतः।
अर्धस्विन्ने क्षिपेत्तक्रमथवा दाडिमीरसम्॥७१॥
सिद्धे पाके च दातव्यं चूर्णमुद्धूलनस्य यत्।
मांस का तैल या घृत से युक्त (मतानुसार/ पाचन) पात्र (कढ़ाई आदि) में तप्त
कर, हिंगु, आर्द्रक, जीरक, मरिच आदि वेसवार सहित) पकाते हैं, तथा उसी में मांस
खण्ड को डाल देते हैं। अर्ध पका हो जाने पर, इसमें तक्र या दाडिम स्वरस मिश्रित
करते हैं, मांस सिद्ध (पक्व) हो जाने पर मसाले का चूर्ण भलीप्रकार मिला देते
हैं॥७०-७१॥
तैलपक्वमांसस्य गुणाः
मांसं तैलेन यत्सिद्धं तन्मांसं गुरु पित्तलम्॥७२॥
वीर्योष्णं रुचिदं वृष्यं वातघ्नं पुष्टिकारकम्।
तैल पक्व मांस
तैल के साथ पकाये मांस के गुण- गुरु (गरिष्ट), पित्तजनक, उष्णवीर्य, रुचि
कर, वृष्य, वातघ्न तथा पुष्टिकारक॥७२१/२॥
घृतपक्वमांसस्य गुणाः
मांसमाज्येन यत्सिद्धं लघु रुच्यमपित्तलम्॥७३॥
अनुष्णवीर्य बलदं हृद्यं दृष्टिप्रसादनम्।
क्षे. कु. 6

७८ क्षेमकुतूहलम् षष्ठोत्सवः ७९
घृत पक्व मांस
घृत के साथ पकाये मांस के गुण- लघु, रुचिकारक, पित्तशामक, शीत वीर्य,
बल्य, हृद्य एवं दृष्टि प्रसादन॥७३¹/२॥
अथ सुस्विन्नमांसरन्धनम्
सवेसवारपानीये हिङ्गुधान्यजलेऽथवा ॥ ७४ ॥
केवले वा जले स्वेदं मांसं सुस्विन्नको विधिः ।
पश्चाद्धाधारितं तप्ते स्नेहे सम्यक्करालिते ।। ७५ ।।
छमत्कारस्तथा कार्यो रुचिः स्यात्प्रतिवेशिनाम् ।
तत उद्धूलनं देयं शुद्धमांसमिति स्मृतम् ॥ ७६ ॥
सुस्विन्न मांसरन्धन विधि
वेसवार के जल में हिंगु एवं धान्यक के जल अथवा केवल जल में मांस पकाते
हैं। यह मॉस को सुस्विन्न करने की किया है।
सुस्विन्न मांस (पूर्वोक्त) को उष्ण तैल या घृत में तप्त (वघार) कर, मुतलित करे।
मांस को क्षमत्कार (छौंकने) की विशिष्ट रीति अपनायें, जिससे प्रतिविपीन (पड़ोस में/
निकट। या सह निवासियों) की रुचि में वृद्धि हो जाये। फिर मसाला का चूर्ण (उद्धूलन)
मिलाकर, शुद्ध मांस का निर्माण करते हैं॥७४-७६॥
सुस्विन्नमांस गुणाः
सुस्विन्नं कोमलं हृद्यं बल्यं वृष्यं रुचिप्रदम् ।
त्रिदोषशमनं चेति श्रेष्ठमग्निकरं परम् ॥ ७७ ॥
गुण (सुस्विन्न मांस)
कोमल, हृद्य, बल्य, वीर्यवर्धक (वृष्य), रुचिकर, त्रिदोषशामक, श्रेष्ठ अग्निकर
(दीपन)॥७७॥
अथ कोमलसुगन्धम्
कुठेर-पृथु-कर्चूर-गुञ्जापामार्गजस्तथा ।
कुठेरकादिजक्षारवारिणा चाशुकारिणा ॥ ७८ ॥
पाचितं धूपितं मांसं सुगन्धमतिकोमलम्।
कोमल सुगन्ध
कुठेरक, पृथु, गुंजा, अपामार्ग- इन सभी को शीघ्र प्रवेशीक्षार-जल के संयोग
मांस तथा सुगन्धित मांस, अति कोमल सुगन्धित होता है॥७८¹/२॥
सुगन्धं रुचिकृन्मांसं बल्यं वृष्यं रुजापहम् ।
अग्निसंजननं श्रेष्ठं ग्राम्यं वा जाङ्गलोद्भवम् ॥ ७९ ॥
सुगन्ध मांस गुण
ग्राम्य या जांगल प्राणि मांस रुचिकारक, बल्य, वीर्यवर्द्धक, रोगनाशक (रुजापहम्)
तथा श्रेष्ठ अग्नि संजनन (उत्तम दीपन)॥७९॥
अथाजमांसम्
तिलजतैलसुपाकपाचितं कासमर्दसुरसे विमर्दितम् ।
सूपधपभवधूमधूपितं मणिमन्थमथितं त्वजापलम् ॥ ८० ॥
यादृशा धातवो नृणां अजानामपि तादृशाः ।
अतो धातुविवृद्ध्यर्थमाजं मांसं प्रशस्यते ॥ ८१ ॥
अजा (बकरी) मांस
तिल तैल में सुपक्व कासमर्द (मसाले को छोंककर) भलीप्रकार सुमर्दित, सूप
(दाल) की सुगन्धित करने वाले सुगन्धित द्रव्यों के धूम से धूपित, सैंधव मिश्रण के
द्वारा अजा (बकरी) का मांस निर्माण करते हैं। जिसप्रकार मनुष्य की धातुएं हैं,
उसीप्रकार बकरी के शरीर में धातुओं की स्थिति होती है- इसप्रकार धातुवृद्धि हेतु
अजामांस को प्रशस्त (उत्तम-उत्तम) माना जाता है।८०-८१॥
अथ बर्करः
सहिङगुणाऽऽज्येन युतं सुपक्रमजासुतस्यामिषमल्पकस्य ।
एलालवङ्गोषणयोगयोगात् करोति पुष्टिं जठरानलस्य ॥ ८२ ॥
अजासुतस्य बालस्य मांसं गुरुतरं स्मृतम् ।
हृद्यं मृदुतरं श्रेष्ठं सुस्वादु बलदं भृशम् ॥ ८३ ॥
बर्कर (बाल बकरे) मांस
बर्कर (बकरी के बालक या छोटे बच्चे) का मांस में हिंगु भृष्ट कर, घृत में पक्व
मांस में एला, लवंग, मरिच का चूर्ण मिलाकर प्रयोग करने से अग्निदीपन गुण कहता

८० क्षेमकुतूहलम्
है। बर्कर का मांस गुरुतर, हृद्य, अधिक कोमल, उत्तम स्वादु तथा अति बल्य होता
है॥८२-८३॥
अथ बर्कररी
सिद्धार्थसंभवे तैले घृते चोपस्करान्विते।
साधितं त्वप्रसूतायाः पलमाजं गुणोत्तमम्॥८४॥
अप्रसूताजसंभूतं मांसं पीनसनाशनम्।
शुष्ककासेऽरुचौ शोषे हितमग्नेश्च दीपनम्॥८५॥
बर्कररी
बर्कररी (अप्रसूता बकरी जिसके बधान हुआ हो) का मांस, सर्षप तैल एवं घृत
में उपस्कार मिलाकर पकाते हैं, जो उत्तम गुणवान है। यह मांस पीनस, (दुर्गन्धयुक्त
नासास्स्राव) नाशक है, यह शुष्क मांस अरुचि, शोष (क्षय) रोग में पथ्य हितकर है,
तथा अग्निदीपन होता है॥८४-८५॥
अजासुतस्य पीनस्य यौवनस्थस्य साधितम्।
घृतरामठसिन्धूत्थोपस्करै रसवत्पलम्॥८६॥
वातपित्तहरं बल्यं सुस्वादु रुचिकारकम्।
हृद्यं पीनसकासार्शोदोषघ्नं पुष्टिकृद्वरम्॥८७॥
अजासुत
क. तरुण बर्कर के सुत (बच्चे) का मांस- यौवनस्थ, युवा बर्कर का घृत, हिंगु,
सैन्धव, उपस्कर (मसाले) के साथ पकाया रसवत् पल (रस-तरीदार) मांस
तैयार करते हैं।
ख. गुण- वातपित्तहर, बल्य, सुस्वादु, रुचिकार, हृद्य, पीनस-कास-अर्श नाशक
एवं श्रेष्ठ पुष्टिकरा८६-८७।।
अथ छिलोधिया
शूलनिष्काशिताण्ड्य मांसं कृत्तमजस्य च।
रन्धितं बहुधा सूदैराखुरादा च मस्त कम्॥८८॥
तन्मां मांसदं बल्य रुच्यं पित्तानिलापहम्।
सुस्वादु मधुरं पाके किञ्चित्कफकरं सरम्॥८९॥
षष्ठोत्सवः ८१
छिलोधिया (छैलेधिया)
क. स्थूल (मोटे) ताजे बर्कर (बकरे) का मांस जिसका अण्डकोश निष्कासित कर-
खुर से मस्तक तक का मांस स्विन्न (उबालकर)- रन्धित करते हैं- घृत, हिंगु
सैन्धव, वेसवार (मसाला) मिलाकर, सिद्ध (पकाकर) करते हैं।
ख. गुण- मांसजनन, बल्य, रुचिवर्धक पित्त-वातनाशक, स्वादु, मधुर पाकी,
किंचित कफकारक तथा सारक॥८८-८९॥
अथ मेषामांसम्
मेषस्य मांसं बहुधा निकृत्तं सुपाचितं रामठयुक्ततैले।
सुयोजितं बल्लिजसैन्धवाभ्यां रुचिं विधत्ते भुवि सर्वकाले॥९०॥
मेषमांसं गुरु स्निग्धं बल्यं पित्तकफप्रदम्।
मेदःपुच्छामिषं वृष्यं कफपित्तकरं गुरु॥९१॥
मेष
क. मेष (भेड़) का मांस- खण्ड करके, हींग से तैल में भ्रष्ट (छोंककर), घृत में
सिद्ध (पाक) करते हैं, फिर मरिच चूर्ण तथा सैन्धव मिश्रित करते हैं।
ख. गुण- प्रत्येक समय रुचिवर्धक, स्वादु, गरिष्ठ (विष्टम्भी), स्निग्ध, बल्य,
पित्तकफप्रदम् । मेष तथा पुच्छ मांस वृष्य, कफपित्त कारक एवं गुरु।।९०-९१।।
अथ गाडरमांसम्
कृत्तं संपाचितं तैले घृते चोपस्करान्विते।
मधुरं पाचनं बल्य कटूष्णं गाडरं पलम्॥९२॥
गाडर
गाडर का मांस के सूक्ष्म खण्डों को तैल तथा घृत में वेसवार (मसाला)
मिलाकर, सुपक्व करते हैं। मांस मधुर, पाचक बलकारक, कटु रस तथा उष्ण।।९२।।
अथ मृगीमांसम्
मृगमातृपलं सुकोमलं शतखण्डीकृतमाज्यभृष्टकम्।
दधिसैन्धवहिङ्गुकोषणैरुचिं शीघ्रमपोहेति शृतम्॥९३॥
मृगस्य जननी शीता असृक्पित्तविनाशिनी।
सन्निपातज्वरश्वासहरा मधुरपाकिनी॥९४॥

८२ क्षेमकुतूहलम्
मृग
क. मृग मातृ (मृग की माता) अर्थात् हरिणी के मांस के छोटे टुकड़े (शतखण्डी)
कोमल (मुलायम) को, घृत में भृष्ट (भून) कर, दधि-सैन्धव-हिंगु-मरिच चूर्ण
मिश्रित करके, पाक करते हैं।
ख. यह शीघ्र अरुचि (अरुचि शीघ्रप्रपोहति शृतम्) नाशक है। यह शीतलता, रक्तपित्त
हर, सन्निपात ज्वर एवं श्वासुरोग नाशक तथा मधुर विपाकी है॥९३-९४॥
अथ मृगमांसम्
मांसं मार्ग बहुशकलितं स्विन्नमीषच्च तोये
तप्ते स्नेहे जरणसहिते पाचितं शब्दमुच्चैः।
सार्द्रं सान्द्रं लवणसहितं दाडिमेनातिचुक्रं
खादन् वादन् कलयति शिरश्चन्द्रचूड़ोऽपि नूनम्॥ ९५॥
एणमांसं ग्राहि रुच्यं दोषत्रयापहम्।
षड्रसं बलदं पथ्यं लगग हृद्यं ज्वरापहम्॥ ९६॥
मृग
क. मृग (हिरण) के मांस के छोटे टुकड़ों से अरूप जल में उबालकर (स्विन्न) करते
हैं, फिर श्वेताजीरक के साथ साथ उष्ण (तप्त) तैल या घृत में पकाते हैं
(तीव्राग्नि), तथा सैन्धव एवं दाडिम (अनार) रस मिश्रित कर, मांस पाक
(सिद्ध) करते हैं। यह सान्द्र-आर्द्र मृग मांस खाते हुए, डमरु (कलमारी
शिराचन्द्र चूड़ोऽपि नूनम्) बजाते ही, भगवान शंकर भी अपना शिर में कम्पन
(हिलाते) हैं- जो मृग मांस की अति प्रशंसा का द्योतक है।
ख. एणमांस के गुण- शीतल ग्रही, रुचिकर, त्रिदोषहर, षट्रसी (छह रसों वाला),
बल्य, पथ्य, लघु, हृद्य एवं ज्वरघ्न हैं॥९५-९६॥
मांसं छिक्कारजं कृत्तमाज्ये तप्ते सुभृष्टकम्।
दधिसैन्धवहिङ्ग्वाढ्यं सुधूलेनावधूलितम्॥ ९७॥
छिक्कारं मधुरं स्वादु कफपित्तानिलापहम्।
विपाकं कटुकं प्रोक्तं विशेषेणाग्निवर्धनम्॥ ९८॥
षष्ठोत्सवः ८३
छिक्कार (मृगाल)
क. छिक्कार (मृगाल) को मांस के छोटे खण्ड (टुकड़ों) को उष्ण घृत में सुभृष्ट
(भूनकर) कर, दधि-सैन्धव-हिंगु का चूर्ण (सुधूलन) मिश्रित करते हैं।
ख. मृगाल मांस के गुण- मधुर, स्वादु, वात-पित्त एवं कफपित्तनाशक, कटुविपाकी
तथा विशेषता अग्निदीपन है॥९७-९८॥
अथ शशकस्य मांसम्
निरस्थिकृत्तं शलमेव शाशं सहिङ्गुनाऽऽज्येन कृतं सुपाकम्।
ससैन्धवं धूलनदत्तवासं करोति कोष्ठान्नमतिप्रकाशम्॥ ९९॥
शशः शीतो लघुः स्वादुग्राही पथ्योऽग्निदीपनः।
सन्निपातज्वरश्वासरक्तपित्तकफापहः ॥१००॥
शशक
क. शशक-शश (खरगोश) के मांस के टुकड़े (अस्थि रहित), हिंगुभृष्ट कर, घृत
में सुपक्व करते हैं, फिर उसमें सैंधवयुक्त मसाले का चूर्ण (उद्धूलन) मिश्रित
कर देते हैं; सुगन्धित स्वरूप का पक्व मांस।
ख. शशक मांस के गुण- शीतल, लघु (शीघ्रपाकी), स्वादु, ग्राही, पथ्य, अग्निदीपन,
सन्निपात ज्वर-श्वासवृद्धि रक्तपित्त कफ नाशक॥९९-१००॥
अथ पाठीमांसम्
पाठीमांसं बहुतरघृते स्वल्पवह्नौ विपक्वं
त्रैकं चूर्णं लवणसहितं शृङ्गबेरप्रभूतम्।
मध्ये तस्मिन् क्षिपति सुतरां कर्कशे हिङ्गु नाऽऽढ्यं
तेन घ्रातं नयति सुतरामाश्रयां संप्रकाशम्॥ १०१॥
पाठी
पाठी का मांस अधिक घृत में मन्दाग्नि से पाक करके, त्रिकटु (त्रैका चूर्ण,
सैंधव, आर्द्रक (अधिक मात्रा में) मिलाते हैं, तथा मांस के अर्धपक्व होने पर हिंगु
(पर्याप्त) डालते हैं।
इस पाठी मांस को सूंघने मात्र से (तेन घ्रातं नयति), उसके निकटतम व्यक्तियो
को अधिक प्रकाश या बल प्राप्त होता है (सुतरामाश्रयां संप्रकाशम्)॥१०१॥

८४ क्षेमकुतूहलम्
पाठी सुशीतमधुरा बल्या पित्तविनाशिनी।
वातहत्कफहाऽत्यर्थं शुक्रदा रुचिकृद्वरा ॥ १०२ ॥
पाठी मांस के गुण
शीतल, मधुर, बल्य, पित्तशामक, वात-कफनाशक, शुक्रदा, रुचिकर
(परम्)॥१०२॥
अथ साम्बरमांसम्
मांसं साम्बरसंभूतं पाचितं बहुधा घृते।
वेसवारोषणाकीर्णे हिङ्गुसैन्धवसंभृते ॥ १०३॥
बलपुष्टिकारं रुच्यं विष्टम्भि गुरु पाचनम्।
साम्बरं बलदं शीतं सुस्वादु पललं मतम् ॥ १०४॥
रसे पाके च मधुरं रक्तपित्तनिबर्हणम् ॥ १०५ ॥
साम्बर
साम्बर (सावर) मृग मांस के खण्डों को हिगु भृष्ट कर, सैन्धव-वेसवार-मरिच
चूर्ण मिलाते हैं- इसप्रकार मांस को सिद्धकर लेते हैं।
सोम्बर मांस के गुण- बल्य, पुष्टिकर, शीतल एवं स्वादु रस-पाक में मधुर,
रक्तपित शामक॥१०३-१०५॥
अथ चित्तलस्य मांसम्
असिततिलोद्भवतैलविपक्वं लवणयुतं नवहिङ्गुरसाढ्यम्।
त्रिकटुकयुक्तनिशार्द्रकमिश्रं बहुगुणचित्तलमांसमनर्घ्यम् ॥ १०६ ॥
विचित्रशम्बरौ शीतौ गुरुस्निग्धौ कफावहौ।
रसे पाके च मधुरौ रक्तपित्तविनाशनौ ॥ १०७ ॥
चित्तल
क. चित्तल (विशिष्ट जाति का मृग शाखिश्रृंग) के मांस-खण्डों को कृष्ण तिल तैल
में सैन्धव लवण, हिंगु, त्रिकटु, चूर्ण एवं आर्द्रक मिलाकर पकाया (सिद्ध
किया) मांस अति गुणवान् तथा उत्तम (बहुगुणवान्)।
ख. द्विजाति शाम्बर (विचित्र-चितकावर) मांस शीतल, गुरु, स्निग्ध, कफवर्धन,
मधुर (रस-विपाक) तथा रक्तपित शामक होता है॥१०६-१०७॥


षष्ठोत्सवः ८५
अथ रोजस्य मांसम्
तैले सुपाचितं तप्ते हिङ्गुसैन्धवसंयुते।
मांसं गवयसंभूतं सुस्विन्नं भूरिवारिणा ॥ १०८ ॥
गवयो मधुरो वृष्यः स्निग्धोष्णः कफपित्तलः।
गुरुर्विदाही विष्टम्भकारको विरसः सदा ॥ १०९ ॥
रोज (गवय)
क. रोज (गवय नील गाय) के मांस खण्डों को प्रभूत (पर्याप्त) जल में उबाल कर,
तप्त (गर्म)- तैल में हींग से भृष्ट (भूनकर), सैंधानमक मिलाकर विधिवत् पाक
कर लेते हैं।
ख. रोज-मांस मधुर, उष्ण वृष्य, स्निग्ध, वातपित्तजनन, गरिष्ठ (विष्टाम्), गुरु,
विदाही, मलावरोधक तथा सर्वदा विरस हमेशा फीका-स्वाद में हल्का) रहता/
होता है॥१०८-१०९॥
अथ वराहः
वराहस्य तनुं तप्ततोयैः प्रक्षालितां मुहुः।
तृणाग्निनाऽथवा दग्धां किञ्चित्तोयेन सेचिताम् ॥ ११० ॥
शस्त्रेण दर्शयेत्तत्र यथा निर्मलौमता भवेत्।
ततस्तत्तीक्ष्णशस्त्रेण पाटयित्वा यथोचितम् ॥ १११ ॥
गृह्णीयादामिषं तस्य पृथगङ्गविभागशः।
रन्धयेद्वहुधा ब्रघ्नं प्रलेहतलनादिकम् ॥ ११२ ॥
स्वेदनं बृंहणं वृष्यं शीतलं तर्पणं गुरु।
श्रमानिलहरं स्निग्धं वाराहं बलवर्धनम् ॥ ११३ ॥
वराह
क. वराह (सुअर) सम्पूर्ण मांस युक्त शरीर की उष्णजल से बहुप्रक्षालित करके
(अथवा तृणाग्नि से वराह) शरीर अंग को दहन करके) अल्प जल से पुनः
प्रक्षालन करें, शस्त्र से काटकर कूल (रोम) रहित कर लेते हैं (निलेमिका)।
तदनन्तर तीक्ष्ण शस्त्र से उचित टुकड़े कर लेते हैं (पाटन)। इस मांस द्रव्य से
विविध प्रकार के कल्प (पाक) निर्माण किये जा सकते हैं, यथा- प्रलेह, तलन
आदि (पाक विधि के अनुसार) बनाते हैं, मांस का सुपाक (रंधनेद्धुआ ब्रघ्नम्)।

चतुर्थ से षष्ठ उत्सव: शाक, सूप, दुग्ध-विकार एवं घृत-पक्व व्यंजन

[पृष्ठ ८६]

ख. गुण- मांसवर्धक-वृंहण, वस्त्र, शीतल, तर्पण, गुरु, श्रम, वातहर, स्निग्ध
तथा बलवर्धन। ११०-११३।।
अथ गोधा
गोधामुष्र्णाजलैर्भूयः क्षालितां खण्डशः कृताम्।
स्विन्नां च तोयतक्राभ्यां क्षालितां सूक्ष्मखण्डिताम्॥११४॥
तलयेद्वेसवाराम्लैः प्रलेहो वा विधानतः।
विपाके मधुरा गोधा वातपित्तप्रणाशिनी ॥११५॥
कषाया कटुका प्रोक्ता कफघ्नी बलवर्धिनी।
गोधा
क. विधि- गोधा मांस को उष्ण जल से बहुप्रक्षालित कर खण्ड करते हैं तथा
उबालने है- जल तथा तक्र से पुनः प्रक्षालित कर, वेसवार तथा अम्ल रस
मिलाकर, तलन करें या प्रलेह (पाक विधि अनुसार) का निर्माण कर लेते हैं।
ख. गुण- महार (विपाक), वातपित्तनाशक, कषाय, कटु रस, कफनाशक तथा
बल्य।।११४-११५१/२।।
अथ कच्छपः
तप्ततोये परिक्षिप्त सम्यगानीय कच्छपम् ॥ ११६॥
तन्मांसं कर्पराद्ग्राह्यं खण्डितं स्वल्पखण्डितम्।
पाचितं सार्षपे तैले हिङ्गुसैन्धवसंयुते ॥ ११७॥
वेसवारसमायुक्ते दाडिमेन सहाम्लिते।
कच्छपो बलकृच्छीघ्र वातजिच्छुक्रकारकः ॥ ११८॥
स्निग्धोष्णाः प्रीणनः सद्यो विपाके कटुकः सरः।
कच्छप
क. विधि- कच्छप (कछुए) के मांस को उष्ण जल में डालकर, उसके अस्थि भाग
को पृथक करके मांस निष्कासित कर- छोटे खण्ड बना लेते हैं। इसको हिंगु से
तैल में भृष्ट (छौंककर) करके, सैन्धव, वेसकार चूर्ण मिलाते हैं, फिर दाडिम
रस मिश्रित बनाकर अम्ल बना लेते हैं- इस प्रकार मांस पक्व (सिद्ध) हो
जाता है।


[पृष्ठ ८७]

ख. गुण- बल्य, आशु वातरोगहारी, वृष्य, स्निग्ध, उष्ण, सद्यः प्रसन्नतादायक,
कटुविपाकी तथा सारक।।११६-११८१/२।।
अथ प्रलेहा:
स्थूलानि मांसखण्डानि क्षालितानि च वारिणा ॥ ११९॥
तप्तस्नेहे विनिक्षिप्य दर्व्या संचालयन् पचेत्।
ततस्तत्र विनिक्षिप्य लवणं जलमल्पकम् ॥ १२०॥
पचेत्पटपटाशब्दं तस्मिन्मांसे प्रकुर्वति।
प्रक्षिपेद्दाडिमीनीरं बहु तेन पचेत्पुनः ॥ १२१॥
मांसपिण्डेषु सिद्धेषु देया शुण्ठी सजीरका।
तत उत्तार्य तन्मांसं पृथक्कुर्यात्प्रलेहतः॥ १२२ ॥
प्रलेहं वाससा पूतं स्थापयेदन्यभाजने।
हिङ्गुना घृतयुक्तेन धूप तत्रैव दापयेत् ॥ १२३॥
प्रलेह विधान (गौरीमतानुसारेण)
मांस के स्थूल (बड़े-मोटे) खण्ड (टुकडों) को जल से प्रक्षालित करके, तप्त
स्नेह में दवीं (कलछुल) से चलाकर, पकाते हैं। फिर सैन्धव चूर्ण को अल्प जल
मिलाकर; पटपटा शब्द वक होने तक, इस मांस द्रव्य का पाक करते हैं, पुनः दाडिम
स्वरस डालकर एक बार फिर पकाते हैं। इसके पश्चात् जीरक तथा शुण्ठी चूर्ण मिला
कर, अग्नि से उतारकर, मांस खण्डों को पृथक् कर लेते हैं (अन्य पात्र में स्थानान्तरित)।
तदनन्तर घृत सहिता हिंगु के धूम से सुगन्धित (सुवासित) कर लेते हैं। यह गौरी मत
के अनुसार 'प्रलेह' होता है।।११९-१२३।।
अथ पत्तलप्रलेहः
स एवाल्पामिषस्नेहः साधितः पत्तलः पुनः।
तथैव वाससा पूतो धूपितोऽपि च पत्तलः ॥ १२४॥
पत्तल प्रलेह
अल्प मांस तथा स्नेह डालकर सिद्ध किया (पूर्वोक्त विधिवत्) प्रलेह की
'पत्तल प्रलेह' संज्ञा होती है। इसको सुगन्धित करने की प्रक्रिया चूर्णवत् है
(वस्त्रपूत)।।१२४।।

८८ क्षेमकुतूहलम्
धनञ्जय प्रलेह
मांसकूष्माण्डकदलीशृङ्गवेराणि साधयेत्।
प्रलेहविधिना सम्यक् प्रलेहोऽयं धनञ्जयः ॥ १२५ ॥
धनञ्जय प्रलेह
मांस, कूष्माण्ड, कदली तथा शृंगवेर (आर्द्रक) - मिश्रित करके, प्रलेह विधि
(पूर्ववत्) के अनुसार सिद्ध (पाक) करते हैं- इसकी 'धनञ्जय प्रलेह' नामकरण होता
है।। १२५।।
अथ गौडदेशीयप्रलेहः
हिङ्ग्वार्द्रबीजपूरैर्लालवणैः संभृतेन च।
कुट्टितामिषपिष्टेन तक्रदाडिमबीजतः ॥ १२६ ॥
सोषणावेसवाराभ्यां प्रलेहोगौडदेशजः।
प्रलेहो रुचिरो हृद्यः कफानिलरुजापहः ॥ १२७ ॥
संग्राही पित्तकृत्किञ्चिच्छूलाध्मानगदाञ्जयेत्।
गौडदेशीय प्रलेह
क. विधि- मांस पिष्ट (पीठी) को हिंगु, आर्द्रक, बीजपूर, एला, लवण को दाडिम
एवं तक्र के साथ-कूटकर, उसमें मरिच तथा वेसवार तैयार करते हैं- यह
गौडीदेशीय प्रलेह होता है।
ख. गुण- रुचिकर, हृद्य, अतिपुष्टिकारक, वातपित्तनाशक, बल्य, मन्दाग्निहर
तथा कफनाशक।। १२६-१२७१/२।।
अथ पूरणम्
हिङ्गुधान्यजले मांसं सुन्वित्रं सूक्ष्मकुट्टितम् ॥ १२८ ॥
संयुक्तं हिङ्गुजीरार्द्रबीजपूरैलसैन्धवैः।
घृते तप्ते परिभ्रष्टं धूपितं मांसपूरणम् ॥ १२९ ॥
मांस्य पूरणं रुच्यं हृद्यं पुष्टिकारं परम्।
वातपित्तहरं बल्यं मन्दानिकफनाशनम् ॥ १३० ॥
मण्डकस्य कृतापट्टी पूरणेन प्रपूरिता।


षष्ठोत्सवः ८९
मांसपूरण (प्रपूरण प्रलेह)
क. विधि- हिंगु तथा धान्यक के जल में मांस को सुस्विन्न करके, सूक्ष्म कूटकर,
संतृप्त घृत में ठीक से भृष्ट करते हैं। जीरक, आर्द्रक, बीजपूर रस, एला, सैन्धव
का मिश्रण (भून) करें तथा सुगन्धित बना देते हैं इसका काम 'मांसपूरण' होता है।
ख. गुण- रोचक, हृद्य, अतिपुष्टिकारक, वातपित्तनाशक, बल्य, मन्दाग्निहर तथा
कफनाशक।। १२८-१३०१/२।।
अथ समोसा
वेष्ट्या शृङ्गाटकाकारं सन्धि लिम्पेत्कनिष्ठया ॥ १३१ ॥
घृते भृष्टा समोसेति नाम्ना चष्टे हि सूपकैः।
सुरुच्या वातजिद्बल्या वृष्या पित्तापहा गुरुः ॥ १३२॥
विशेषोऽत्र गुणे योहि मांसभेदाद्विविच्यते।
समोसा
क. विधि- मण्डक (गेहूँ की मैदा) की पट्टिका बनाकर, उसमें पूर्वोक्त पूरण
भरकर, शृंगाटक के आकार में (कनिष्ठिकी ऊँगली से संधि भलीभाँति बन्द कर
देते हैं), तथा घृत में पकाते हैं। इसको सूदक (पाचक) लोग समोसा कहते हैं।
ख. गुण- रुचिकारक-वातनाशक, बल्य, वीर्यवर्धन, पित्तनाशक तथा गरिष्ठ
(गुरु)। इसके विशेष गुणों का विवेचन प्रयुक्त मांस के गुणों के अनुसार होते
हैं।। १३१-१३२१/२।।
अथ पूरणप्रलेहः
मांसपूरणयोगेन लोष्ठाकारं विधाय च ॥ १३३॥
स्विन्नं कृत्तं घृते भृष्टं प्रलेहविधिना पचेत्।
पूरणस्य प्रलेहो यः स ज्ञेयो वातनाशनः ॥ १३४॥
श्लेष्मप्रकारकश्चैव मुखवैरस्यकृद्धरः।
पूरण प्रलेह
क. मांसपूरण के योग से, (मैदा की पट्टिका में मांसपूरण भरकर) लोष्ठाकार (ढेला)
के आकार का बनाकर, स्विन्न (उबाल) लेते हैं, फिर सूक्ष्म काटकर, घृत में
भृष्टकर, प्रलेह की विधि से पाक करते हैं।

९० क्षेमकुतूहलम् षष्ठोत्सवः ९१
ख. गुण- वातनाशक, कफकारक, मुखवैरस्यनाशक तथा गुरु होता है॥१३३- अथ हरितवर्णप्रलेहः
१३४¹/₂॥ मेथिका कासमर्द्दाम्लकल्केन च करालिते।
अथ शुक्लवर्णप्रलेहः घृते मांसं विनिक्षिप्य पचेच्छुक्लप्रलेहवत् ॥ १४१ ॥
घृतवेसनधान्याकहिङ्गुभृद्दधिसंयुते ॥ १३५ ॥ सिद्धं च गालयेद्वस्त्रैः कृत्वा वर्णप्रयोजनम्।
वस्त्रपूतेऽर्धसंपक्के स्विन्नं मांसं विनिक्षिपेत्। ताम्बूलं काष्ठजाङ्गारं देयं हरितहेतुना ॥ १४२ ॥
लवणं हिङ्गु निक्षिप्य शुण्ठीं क्षिप्त्वा सुपाचयेत् ॥ १३६ ॥ हरित वर्ण प्रलेह
एलां क्षिप्त्वाऽवतार्येत पटपूतं च धूपयेत्। मेथिका, कासमर्द (छौंक) अम्लिका कल्क से करालित, घृत में मांस (खण्ड)
शुक्लवर्ण प्रलेह डालकर शुक्ल प्रलेह (पूर्ववत्) पाक करते हैं, पक्व (सिद्ध) हो जाने पर, वस्त्र धौत
घृत, वेसन, धान्यक, हिंगु, दधि मिश्रित कर वस्त्रपूत करते हैं, अर्धपाक जाने करते हैं। ताम्बूल तथा काष्ठमांसाद हरित वर्ण बनाने हेतु मिश्रित कर देते हैं॥१४१-
पर स्विन्न मांस डाल देते हैं सैन्धव, शुण्ठी चूर्ण मिलाकर सुपक्व करते हैं तथा बड़ी १४२॥
इलायची (बृहदैला) का चूर्ण मिश्रित कर वस्त्रपूत (छान) लेते है, तथा सुगन्धित धूप अथ रक्तवर्णप्रलेहः
से सुन्धित कर लेते हैं॥१३५-१३६¹/२॥ रक्तवर्णप्रलेहस्य संसिद्धयर्थं विनिक्षिपेत्।
अथ पीतवर्णप्रलेहः करमर्दं दाडिमस्य स्थाने शेषं तु पूर्ववत् ॥ १४३ ॥
प्रलेहः पीतवर्णोऽपि कार्यः शुक्लप्रलेहवत् ॥ १३७॥ अरुचौ रुचिदः सद्यो नानावर्णप्रसाधितः।
विशेषोऽत्र हरिद्रायाः संसर्ग कुङ्कुमस्य वा। प्रलेहः कफवातघ्नः किञ्चित्पित्तकरः स्मृतः ॥ १४४॥
तप्तस्नेहे क्षिपेद्धिङ्गुसंयुक्तं कासमर्दनम् ॥ १३८ ॥ रक्तवर्ण प्रलेह
धान्यं च लवणाजाजी धौतं मांसं ततः क्षिपेत्। क. विधि- रक्तवर्ण प्रलेह पाक हेतु, दाडिम के स्थान पर करमर्द डालते हैं।
ततोऽर्धस्फुटिते मांसे दाडिमी बीजसंयुतम् ॥ १३९ ॥ शेषविधान पूर्ववत् (शुक्लवर्ण प्रलेह के समान)।
तक्रं शुण्ठीं विनिक्षिप्य सिद्धे हिंगु विनिक्षिपेत्। ख. गुण- सद्य रुचिकारक, विविध वर्णीय प्रलेह कफ-वातनाशक तथा किंचित
तत उत्तार्य वस्त्रेण गालयेद्धूपयेदपि ॥ १४० ॥ पित्तकारक होता है॥१४३-१४४॥
पीतवर्ण प्रलेह अथ भृष्टमांसम्
यह (पीतवर्ण) प्रलेह, शुक्लवर्ण प्रलेह के समान बनता है; केवल इसमें हरिद्रा अङ्गारकर्पराभ्यां च शूल्यन्त्रे पुरेऽथवा।
या कंकुम (केशर) का चूर्ण मिश्रित कर देते हैं। तप्त तैल में कासमर्द (छौंक या भर्जनं विविधं प्रोक्तं सूपकारविशारदैः ॥ १४५ ॥
मसाला) मिलाने के पश्चात, धान्यक-सैंधव-जीरक-धौत (धुला) मांस डालते हैं। मांस जलेन स्वेदयेत्पूर्वं प्रोतं शूलेऽन्तरन्तरम्।
के अर्ध स्फुटित (आधा खिल जाने पर) अनार बीज, तक्र तथा शुण्ठी डालकर सिद्ध दध्यार्द्रहिङ्गुलवणैर्लिप्ताङ्गारग्निना पचेत् ॥ १४६ ॥
करते हैं, फिर (अन्त में) हिंगु (घृत भृष्ट) मिला देते हैं। फिर अग्नि से उतार कर, तच्छूल्यं तु सुधासुल्यं रुच्यं वह्निप्रदं लघु।
सुगन्धित धूपित करते हैं॥१३७-१४०॥ तदेवाङ्गारपक्वं तु प्रत्तंसं वातनाशनम् ॥ १४७ ॥

९२ | क्षेमकुतूहलम्
धृष्टमांसम्
क. विधि- सूपकार विपादों (पाक शास्त्रियों) ने अंगर आँच तथा कर्पूर (खपरी)
द्वारा शूलयन्त्र (या पुर) में विभिन्न प्रकार की विधियों से मांस भूनने का विधान
किया है। सर्वप्रथम जल में स्वेदन तथा शूल (लोहे की छड़ या शलाका) में कुछ
अन्तर देकर मांस के खण्डों के यूथ (माला जैसे) बना लेते है, उसके बार दधि,
आर्द्रक, हिंगु तथा लवण से लेप करके, इस शूल को अंगार (अग्नि) पर पकाते
हैं। यह शूल्य मांस अमृत के समान हो जाता है।
ख. गुण- रुचिकर, दीपन, तथा लघु। यही मांस अंगार पक्व हो जाने पर उष्ण
होता है तथा वात का नाश करता है॥१४५-१४७॥
अथ यकृद्भृष्टम्
स्विन्नं यकृद्धृते तप्ते दध्नाऽऽलोड्य च भर्जितम्।
मात्रया दधिसिन्थूत्थरामठैलापरिप्लुतम् ॥ १४८ ॥
मरिचार्द्रकसंयुक्तं सुगन्धिद्रव्यवासितम्।
गतद्रवं सुधांतुल्यं परिशुष्कं तदुच्यते ॥ १४९ ॥
परिशुष्कं स्थिरं स्निग्धं रोचनं तर्पणं लघु।
बलमेधाग्निमांसौजः शुक्रवृद्धिकरं परम्॥ १५० ॥
यकृद्भृष्टम्
क. विधि- यकृत (कलेजी/ कलेजा/ जिगर) को स्विन्न करके, दधि में मिलाकर,
शीतल घृत में भृष्ट करते हैं। फिर मात्रानुसार दधि, सैन्धव, हिंगु, एला, मरिच
चूर्ण एवं आर्द्रक को मिश्रित करते हैं, तथा सम्पूर्ण मांस द्रव्य को सुगन्धित कर
लेते हैं। द्रवांश शुष्क हो जाने पर, परिशुष्क यकृत् को प्राप्त करें- इसे सुधा
(अमृत) के समान कहा गया है।
ख. परिशुष्क यकृत् स्थिर, स्निग्ध, रुचिकारक, तृप्तिकर एवं लघु होता है; यह
बल्य, मेध्य, मांस-ओज तथा वीर्यवर्धक (गरम) है॥१४८-१५०॥
अथ तान्दूरम्
अङ्गारपूर्णगर्तायामलग्नमवलम्बितम् ।
विहितं संभृतैर्मासं पक्वं तान्दूरमुच्यते ॥ १५१ ॥
षष्ठोत्सवः | ९३
तान्दूरम्
अग्नि-अंगार से पूर्ण गड्ढे (गर्त) में एकत्रित कर बिना लटकायें हुए।
(अलग्नमग्नविचितम्- दोलायन्त्र के समान) परिपक्व मांस को पकाने की विधि को
'तान्दूरमांस' नाम दिया जाता है। यह तान्दूरी रोटी पकाने की विधि का अन्तरमंद है,
जिसमें रोटी (गेहूँ के रोटी से बनी) के स्थान पर मांस प्रयोग है॥१५१॥
अथ सुस्वादुतान्दूरम्
पचेद्गर्तन्तरिक्षस्थंलम्बि संभारसंभृतम्।
चतुर्दिङ्मण्डलाकारे पार्श्वप्रज्वलितानले ।। १५२॥
विपक्वं सुरभि स्वादु तान्दूरमिति कीर्त्यते।
तन्दूर मांस पाक
एकगर्त का खात (गड्ढे) के मध्य (बीच) में संग्रह (एकत्रित) कर की लटका देते
हैं, तथा चारों ओर मण्डलाकार पार्श्व में प्रज्वलित (जली हुई आँच) अग्नि में पक्व
(पकाते) हैं।
यह गुणों में सुस्वाद, सुगंधित एवं स्वादिष्ट पाक 'तान्दूर मांस' नाम धारण
करता है॥१५२१/२॥
अथ शूलपक्वतान्दूरम्
कोष्ठिकायां ससंभारमलग्नमवलम्बितम् ॥ १५३ ॥
मांस विधाय बाह्याग्निज्वालया स्वेदितं वरम्।
तान्दूरं रुचिदं मांसं मृदु पथ्यतमं स्मृतम् ॥ १५४॥
सद्योहतं नवं स्थूलमन्यथा दोषकारकम्।
शूलपक्व तान्दूर
क. विधि- कोष्ठिका (गर्त की चतुर्मिति-चारदीवारी पर) एकत्रित करके-शूल
(अल्पका) में लिप्त (लगा) तथा लटकाकर, बाह्याग्नि की ज्वला (अग्नि की
लपट) से मांस को भलीभांति स्वेदित करते है- इस पाक की 'शूल पक्व
तान्दूर' नाम दिया जाता है।
ख. गुण- रुचिकारक, मृदु, पथ्यतम (बहुत हितकर। नवीन स्थूल तान्दूर मांस विशेष
लाभप्रद होता है; अन्यथा यह दोषजनक हो जाता है॥१५३-१५४१/२॥
क्षे. कु. 7

९४ क्षेमकुतूहलम्
अथ पुटपाकः
सूक्ष्मंयत्कुट्टितं मांसं संभृतं वेसवारकैः॥ १५५॥
छत्रं पत्रैर्मृदा सर्वं वेष्टितं वर्तुलाकृति।
पचेत्प्रज्वलिते गर्ते कणिक्यान्तितवेष्टितम्॥ १५६॥
पचेदेवं बीजपूरनारङ्गदलवेष्ट्यपि।
पुटपाक
मांस के सूक्ष्म खण्ड-कुट्टित वेसवार के साथ पीसकर-पक्ववृत्त, मृत्तिका से
वर्तुलाकृति में वेष्टित (बटलोही के आकार का गोला) तथा प्रज्वलित गर्त में रखकर,
ऊपर से अग्नि (किरीषआदि से) प्रदान करते हैं- पाकार्थ। इसको बीजपूर तथा नारिकेल
पत्रों से भी अविष्टित (ढकने) करने की विधि हैं, जिससे मांस पाक सम्यक् रूप से
सिद्ध हो जाये॥१५५-१५६¹/₂॥
अथ फलपुटपाकः
पिष्टं साम्लमनाम्लं वा संभृतं कोरिते फले॥ १५७॥
पूर्ववत्पुटितं वह्नौ विपचेत्फलसंज्ञकम्।
पुटपाकेन यन्मांसं पाचितं पाचकं हि तत्॥ १५८॥
सोष्मं तद्गुणवज्ज्ञेयं शीतं शुष्कं तु दुर्जरम्।
फलपुटपाक
क. विधि- मांस पिष्ट को, अम्ल सहित या रहित- चीरकर (फल के मध्य में
अवस्थित कर), पूर्ववत् पुटपाक विधि का अनुसरण करते हैं- यह 'फलपुटपाक'
की क्रिया है (पूर्ववत्)।
ख. गुण- पुटपाक का उष्मा सहित (गर्भ) सेवन करने से गुणवान सिद्ध होता है;
शीतल एवं शुष्क पुटपाक दुर्जर (देर से पचने वाला) मांस व पाक हो जाता
है॥१५७-१५८¹/₂॥
अथ राजिकमांसम्
मांसस्य पिष्टिका कृत्वा वेसवारेण योजिताम्॥ १५९॥
बहुधा क्रियते तस्या वटिकावटकादिकम्।
आम्रचिञ्चीफलाकारं लड्डुकावटकादिकम्॥ १६०॥
षष्ठोत्सवः ९५
शृङ्गाटकफलाकारं यथाबुद्धिप्रकारजम्।
कृत्वाऽपि बहुधाकारं स्वेदितंघृतभर्जितम्॥ १६१॥
वेसवायुते तक्रे क्वथिते च मनोरमे।
निक्षिप्य चालयेद्दुत्तार्थैलादिवासिते॥ १६२॥
एवं तु बहुधा कार्यो मांसमुद्गप्रलेहकः।
प्रलेहो वातजिद्बल्यस्तक्रमांसभवो रसः॥ १६३॥
प्रीणनो व्रणयुक्तानां शुक्रदः क्षीणरेतसाम्।
राजिक मांस
क. विधि- वेसवार मिश्रित मांस पिष्ट से विभिन्न प्रकार के वटक, वटिका, आम्र-
चिंचा फलाकार, लड्डू आकार, शृंगारकाकार तथा स्वेच्छानुसार वटक बनाकर,
स्वेदित करते हैं, फिर घृत में भृष्ट- वेसवार युक्त, तक्र में डालकर, एला से
सुगन्धित काढ़ी (क्वचित) में डाल देते हैं, फिर दवींचालन ((अग्नि से
हटाकर)। इस रीति से मांस तथा मुद्ग के विभिन्न प्रकार के प्रलेह-पुटपाक निर्मित
हो सकते हैं।
ख. गुण- प्रलेह वातनाशक तथा बल्य। तक्र एवं मांस निर्मित रस (शोरकातरी)
व्रणी तथा क्षीण वीर्य पुरुषों के लिए लाभकर है॥१५९-१६३¹/₂॥
अथ मांसेण्डरी
पिष्टे मांसेण्डरीं स्विन्नां मासूरे पर्णवेष्टिताम्॥ १६४॥
मरिचैः स्नेहलवणैः संस्कुर्याद् धूपयेत्ततः।
मांसस्येण्डरिका प्रोक्ता गुर्वी वृष्याऽनिलापहा॥ १६५॥
विशेषोऽत्र गुणानां यः स ज्ञेयो मांसभेदतः।
मांसेण्डरी
क. विधि- मसूर पिष्ट में मांस पूरण कर, 'मांसेण्डरी' निर्माण करते हैं, जिसको
पत्रावेष्ट कर स्विन्न करते हैं, फिर मरिच चूर्ण, स्नेह तथा लवण मिश्रित कर
पक्व (सिद्ध) करते हैं; तदनन्तर सुगन्धित धूपाचित कर लेते हैं- इस 'मांसेण्डरी'
नाम देते हैं।
ख. गुण- गुरु (विष्टम्भ), कृष्य तथा वातनाशक। विशेष गुण 'मांसेण्डरी' में प्रयुक्त
मांस द्रव्यानुसार होता है॥१६४-१६५¹/₂॥

९६ क्षेमकुतूहलम्
अथ कुट्टितं मांसम्
मांसमस्नायु संगृह्य सूक्ष्मं कृत्वा त कुट्टितम् ॥ १६६ ॥
वेसवारसुगन्धं तत्स्वेदितं पाचितं भवेत् ।
कुट्टितं पाचितं मांसं तन्मांसं लघु दीपनम् ॥ १६७ ॥
तत्रापि जाङ्गलं श्रेष्ठं जाङ्गलेष्वपि पक्षिणाम् ।
कुट्टित मांस
क. विधि- स्नायु रहित मांस के सूक्ष्म खण्डों का कुट्टन (कूटकर) सुगन्धित द्रव्य
मिलाकर स्वेदन कर पकाते हैं। यह 'कुट्टित मांस' कहा जाता है।
ख. गुण- यह लघु, पाचक तथा दीपन होता है। यह जांगल पक्षियों में उत्तम मांस
माना जाता है।।१६६-१६७ १/२ ।।
अथ मधुरमांसपाकः (क्षीरामृतम्)
घृताम्बुस्वेदिते मांसे शुण्ठिचूर्णं विनिक्षिपेत् ॥ १६८ ॥
दुग्धं च शर्करोपेतं पश्चात्सौगन्धिकं न्यसेत् ।
नातिसान्द्रं नातिशुष्कमिदंक्षीरामृतं स्मृतम् ॥ १६९ ॥
क्षीरामृतं बहुरसं न चोष्णं नातिशीतलम् ।
वातपित्तहरं वृष्यं सुस्निग्धमतिकोमलम् ॥ १७० ॥
मधुर मांसपाक (क्षीरामृतम्)
क. विधि- घृत तथा जल के साथ पाक्व मांस, में शुण्ठी चूर्ण डालते हैं, फिर दुग्ध
तथा शर्करा का मिश्रण कर देते हैं, तथा अन्त में सुगन्धित द्रव्य से सुवासित कर
देते हैं। यह पाक, अधिक गाढ़ा (सान्द्र) तथा न अधिक शुष्क (सूखा) होना चाहिए।
ख. गुण- यह बहुरसयुक्त पाक, न अधिक उष्ण एवं न अधिक शीतल, वातपित्त-
नाशक, वृष्य, सुस्निग्ध तथा अतिमृदु।।१६८-१७०।।
अथ मुण्डरन्थनम्
समग्रं विदहेन्मुण्डमग्निना स्थूलहेतिना।
प्रक्षाल्य तप्तपानीयैर्लोमनाशाय घर्षयेत् ॥ १७१ ॥
खण्डयित्वा पचेत्तैले घृते वापस्करान्विते ।
मुण्डामिषं वातहरं स्निग्धं गुरुतरं स्मृतम् ॥ १७२ ॥
षष्ठोत्सवः ९७
पशोर्यस्य हि यन्मुण्डं तन्मांसैकगुणावहम् ।
मुण्डस्य विधिना पाच्यं चरणं तु प्रलेहितम् ॥ १७३ ॥
चरणं वातहृद्बल्यं वृष्यं पित्तहरं गुरु।
मुण्डरन्थन विधान
क. विधि-पशु के सम्पूर्ण मुण्ड के तीव्र अग्नि में दहन करें, तप्त जल में- जल
से प्रक्षालन हेतु- रोगों (बालों) का घर्षण करके उनका निष्कासन कर देते हैं।
तत्पश्चात् मुण्ड के खण्ड करके स्नेह में पाक करते हैं- लवण तथा उपस्कार
मिलाकर, पाक कर लेते हैं। मुण्ड का भलीभाँति पकाते हैं तथा चरण (पैरों) को
प्रलेह की भाँति पकाना चाहिए।
ख. गुण- यह (मुण्ड मांस) वातनाशक, स्निग्ध, गुरु (गरिष्ठ) पशु के गुणानुसार
मुण्ड का भी गुण रहता है। पशु चरण (पक्व) वातनाशक, हृद्य, वृष्य,
पित्तशामक तथा गुरु होता है।।१७१-१७४।।
अथान्त्ररन्थनम्
अन्त्रिकां छिद्रमार्गेण धौतां निर्मलवारिणा ।
शृङ्खलासंज्ञितां कृत्वा स्वेदयेद्धिङ्गुवारिणा ॥ १७४ ॥
कर्तितां वेसवाराम्लैस्तलयेद्वा प्रलेहयेत् ।
अन्त्रिका गुर्विकाऽरूक्षा वातहृच्छ्लेष्मकारिणी ॥ १७५ ॥
निःसारा विरसोद्गारा तद्वज्ज्ञेया तु घण्टिका ॥ १७६ ॥
आन्त्रराधनम्
क. विधि- आन्त्र के छिद्र को स्वच्छ जल से प्रक्षालन करके, श्रृंखलाकार में हिंगु-
जल से स्वेदन करते हैं। तत्पश्चात् काटकर वेसवार तथा वेसवार तथा अम्ल जल
मिलाकर, तेल या प्रलेह बना लेते हैं।
ख. गुण- अन्त्रिका मास गुरु, अरूक्ष (स्निग्ध), वातनाशक, कफवर्धक, क्षार-
रहित, विरस, उद्गार जननी। इसी प्रकार घण्टे का (घाँटी) का भी गुण होता
है।।१७४-१७६।।
अथ राजिकामांसम्
स्विन्नं तक्राम्बुना मांसं घृतभृष्टं सुवासितम् ।
सुचूर्णं सैन्धवोपेतं दधिराजिकया युतम् ॥ १७७ ॥

९८ क्षेमकुतूहलम्
मांसासुरी तु वातघ्नी लघ्वी रुच्या बलप्रदा।
कफघ्नी पित्तला किञ्चित्सर्वाहारम्य पाचनी ॥ १७८ ॥
राजिका मांस
क. विधि- तक्र जल में मांस खण्ड का स्वेदन (उबाले) मांस को घृत में भृष्ट
(भून) कर सुवासित (सुगन्धित द्रव्यों) द्वारा करें, तदनन्तर राजिकाचूर्ण (राई),
सैंधव, वेसवार, दधि मिश्रित करके, राजिका मांस का पाक करते है।
ख. गुण- यह वातनाशक, लघु, रुचिकारक, बलप्रद, कफघ्नी, चिन्नल तथा
किंचित् सर्वाहारी पाचनी है।।१७७-१७८।।
अथ मांसपूरितवार्ताकिम्
वृन्तमुत्तार्य वार्त्ताकं कोरितं पूरयेद्दृढम्।
कुट्टिताख्येन मांसेन पूरितं पूरणेन वा ॥ १७९ ॥
ततस्तेनैव वृन्तेन तच्छिद्रं मुद्रितं पुनः।
सन्धिं कणिक्यया लिप्य प्रलेहविधिना पचेत् ॥ १८० ॥
मांसवृन्ताकसंभूतः प्रलेहो वातनाशनः।
रुचिपुष्टिकरश्चैव बल्यो वृष्यो रुजापहः ॥ १८१ ॥
क. विधि- वृन्ताक (बैंगन) के वृत्त तथा कोरित (गूदा) का निष्कासन कर, उत्तम
कुट्टित मांस-पुटपाक पक्व वेसवार युक्त की दृढतापूर्वकपूरित करते हैं अथवा
मृंगु-धान्यक के जल में स्वेदन किए मांस को, सूक्ष्म कुट्टित कर, हिंगु-जीरक,
आर्द्रक, निम्बू, एला, सैन्धव मिलाकर, संतृप्त घृत में भृष्ट करें तथा सुगन्धित
मांस से पूरित करते हैं।
ख. गुण- मांस वृन्ताक प्रलेह ग्राह्य, रुचिकर पुष्टिदा, बल्य, वृष्य तथा
रोगनाशक।।१७९-१८१।।
अथ पक्षिमांसप्रकारः
त्वक्पक्षरहितं मांसं स्विन्नं तक्रेण वा जले।
अथवा पुटपाकेन स्वेदितं वाऽथ दार्विके ॥ १८२ ॥
शलकास्थं पचेदग्नौ दधिसैन्धवहिङ्गुभिः।
संस्कृतं मरिचैलाभिरेतत्पक्वत मं स्मृतम् ॥ १८३ ॥
अथवा स्वेदितं मांसं पाचितं वैसवारिकम्।
षष्ठोत्सवः ९९
घृते द्रवे वा विरले प्रलेहविधिवत्पचेत् ॥ १८४॥
पक्षिमांस
क. विधि- पक्षियों के चर्म-पक्ष निष्कासित कर, तक्र या जल में स्वेदन करके,
काष्ठ या लौह शलका पर रख (लगा) कर, सैन्धव एवं हिंगु के साथ मरिच-
एला का चूर्ण डालकर पाक करते हैं। इस भलीभाँति पक्व मांस की पथ्यतम
मानते हैं अथवा स्विन्न (उबले) मांस को वेसवार मिश्रित कर, घृत या द्रव मे
पृथक्-पृथक् प्रलेह का पाक किया जाता है।।१८२-१८४।।
अथ महाबलपाकः
कृत्वा पक्षविहीनं तद्बीजपूरार्द्रसैन्धवैः।
लवङ्गैलायुतं पेष्यं लोष्टीकृत्य सुस्वेदितम् ॥ १८५ ॥
ततः कृतं शलाकास्थं भृष्टकं स्यान्माबलम्।
महाबलपाक (महाबलभूरिपाक)
क. विधि- पक्ष विहीन पक्षी में, बीजपूर स्वरस, आर्द्रक सैन्धव चूर्ण के साथ,
लवंग-एला-चूर्ण मिश्रित करके- जोष्ठीकृत (सिल पर घीस लेते हैं) तथा फिर
गोलक बनाकर, स्वेदन किया जाता है। तदन्तर काटकर शलाका पर रख
(लगा) कर, अग्निभृष्ट कर लेते हैं- इसी को महाबल या महाबलभूरिक पाक
कहा जाता है।।१८५१/२।।
अथ बलभूतिपाकः
त्वक्पक्षरहितं स्विन्नं गुम्फितं चान्तरान्तरम् ॥ १८६ ॥
शलाकायां च संपाच्यं भृष्टोपस्करसंयुतम्।
शूल्यं सर्वोत्तमं मांसं लघु रुच्यमपित्तलम् ॥ १८७ ॥
कफवातहरं श्रेष्ठं सर्वपाकोत्तमोत्तमम्।
बलभूतिपाक (महाबलभूरिपाक)
क. त्वक् (चमड़ी) तथा पक्ष (पंख) रहित पक्षी-मांस (के छोटे-टुकड़ों की) को
स्विन्न करके, शलाका में ग्रथित। गुण्ठित (माला की तरह बाँधकर) करके पकाते
हैं, फिर उपस्कर (वेसवार) सैंधवसहित, भृष्टकर (भून लेते) हैं।
ख. यह भृष्ट शल्य मांस सर्वोत्तम माना जाता है। लघु, रुचिकारक, पित्तनाशक,

१०० क्षेमकुतूहलम्
कफ-वातनाशक के रूप में श्रेष्ठ, तथा सर्वपाकों में उत्तमतम श्रेणी का
है।। १८४-१८७१/२।।
अथानूपजम्
स्वेद्यमानूपजं मांसं लुञ्चितं भजितं मनाक् ॥ १८८ ॥
क्षालितं वारिणाऽत्यर्थं वेसवारेण संयुतम्।
रन्धितं बहुधा भुक्तौ स्वेदितं वारिणा भृशम् ॥ १८९ ॥
सुस्विन्नं खण्डितं सर्वमङ्गाद्वेऽस्थिविवर्जितम्।
तप्तमाज्ये सबालीके बेसवारसमन्विते ॥ १९० ॥
भर्जितं पाचितं तोयैः पूर्ववत्स्वेदसंभवैः ।
प्रलेहतलने वाथ शूले वा बहुधा पचेत् ॥ १९१ ॥
आनूपं बलकृन्मांसं स्निग्धं गुरुतरं स्मृतम्।
धान्याङ्कुरचरा येऽत्र तेषां मांसं लघुत्तमम् ॥ १९२ ॥
विपाचितास्तिन्तिरित्तिरिवर्त्तिकाद्याः कपिञ्जला लावकपोतकाश्च।
एकैकशो द्रव्यचयानुयोगान्मण्डूकाकरूपा कथिता सुधानाम् ॥ १९३ ॥
उदकस्थलजातानां विधिरुक्तस्तु रन्धने।
पक्षिणो यस्य यन्मांसं तन्मांसं तद्गुणावहम् ॥ १९४॥
आनूपदेशजपक्षी मांस
क. विधि- आनूप (निम्न) देशज पक्षी के चर्म-पक्ष निष्कासित मांस की अल्प भृष्ट
कर, जलप्रक्षालन-स्वेदन करते हैं, फिर उपस्कार (वेसवार-लवण सहित)
मिश्रित कर, शुष्क पाक करते हैं, पुनः जल में स्वेदन करके, समस्त अंगों से
अस्थियाँ निकालकर, संतप्त घृत में (हिंगु सहित) उपस्कार के साथ) भूनते हैं,
तथा स्वेदन जल (पूर्व में अवशिष्ट) में पाक करते हैं। इसको प्रलेह के समान,
तलकर शूल पर कई प्रकार से पाक करके, निर्माण किया जा सकता है।
ख. गुण- आनूप देशज पक्षी का मांस बल्य, स्निग्ध एवं गुरुतर। धान्यांकुर चर
पक्षी का मधुर, सुपाकी तथा उत्तम। तित्तिर, वर्तिक, वर्तिक, कपिञ्जल, लावक,
कपोतक आदि पक्षियों के मांस से- अनेक द्रव्यों के संयोग से- अमृत के
मण्डूक के समान। माना गया है (अर्थात् अमृत के समान गुणकारी)।
जल तथा थल के निवासी पक्षियों के मांस की विधि उपरोक्त है, जिस पक्षी के


षष्ठोत्सवः १०१
जो मांस के गुण होते हैं, उसीप्रकार के उसके कल्पों (पाको) के गुण उसी के
समान होंगे।।१८४-१९४।।
अथ तित्तिरिः
तित्तिरिर्वर्णदो ग्राही हिक्कादोषत्रयापहः।
श्वासकासहरः कृष्णस्तस्माद्गौरोऽधिको गुणैः ॥ १९५॥
तित्तर-तिक्किरि
तित्तिर का मांस वर्णदायक, ग्राही, हिक्का-श्वास-त्रिदोष-कास नाशके। कृष्णतित्तिर
की अपेक्षा श्वेत तित्तिर का मांस अधिक गुणवान् ॥१९५॥
अथ वर्तीरः
वर्तीरोऽग्निकरः शीतो ज्वरदोषत्रयापहः।
सुरुच्यः शुक्रदो बल्यस्ततोऽल्पा वर्तिका स्मृता ॥ १९६ ॥
वर्तीर
वर्तिर (वर्तीर-बटेर) के मांस के गुण- यह हृद्य, शीतल, स्निग्ध, अग्निदीपन,
शीतल; ज्वर-त्रिदोषनाशक, रुचिकारक, वृष्य तथा बल्य होता है। वर्तिका (स्त्री बटेर)
के मांस के गुण अल्प होते हैं।।१९६।।
अथ लावकः
लावो हृद्यो हिमः स्निग्धो ग्राही वह्निप्रदीपनः।
पांसुलः श्लेष्मलस्तेषा मुष्णीवीर्योऽनिलापहः ॥ १९७॥
गौरकः कफवातघ्नो रूक्षो वह्निप्रदः परम्।
पौण्ड्रकः पित्तकृत्किञ्चिल्लघु श्लेष्मश्रमापहः ॥ १९८ ॥
दर्भरो रक्तपित्तघ्नो हृदामयहरो हि सः।
शीतलो रुचिकृद्वृष्यः पथ्यदः शीघ्रपाचनः ॥ १९९ ॥
लावक
लावक (लावा) के मांस के गुण- यह हृद्य, शीतल, स्निग्ध, ग्राही, दीपन,
पांसुल तथा कफकारक होता है। इन पक्षियों का मांस उष्णवीर्य होने से वातनाशक होता
है। गौरवर्णीय लावा का मांस कफवातनाशक, रूक्ष, उत्तम अग्निवर्धन है। पौण्ड्र देशज
लावा का मांस पित्तवर्धक, किंचित् लघु, कफघ्न, श्रमहर होता है। दर्भर लावा (मांस)

पृष्ठ १०२

रक्तपित्तनाशक, हृद्रोगनाशक, शीतल, रुचिकारक, उत्तम पथ्य (हितकर) तथा लघु
(शीघ्रपाकी) होता है॥१९७-१९९॥
अथ कपोतः
कपोतको गुरुः स्निग्धो रक्तपित्तानिलापहः।
संग्राही शुक्रलः शीतः सुस्वादूरुचिकारकः॥२००॥
कपोत
कपोत के मांस का गुण- गुरु, स्निग्ध, रक्तपित्त, वातनाशक, संग्राही, वृष्य,
शीतल, स्नायु एवं रुचिकारक होता है॥२००॥
अथ मयूरः
मायूरं पाचितं मांसं घृते स्वोपस्करान्विते।
ईषल्लवणसंयुक्तं मरिचैलासमान्वितम्॥२०१॥
मायूरं मुष्णं काषायं कफानिलहरं गुरुः।
वर्षाकाले न तत्सेव्यं दुष्टकीटाहिभक्षणात्॥२०२॥
मयूर
क. विधि- मयूर का मांस उपस्कार (मसाला) आदि के साथ घृत में पाक करते हैं;
इसमें अल्पलवण, मरिच, एला चूर्ण मिश्रित करते हैं।
ख. गुणः- उष्ण, कषाय, कफ, वातनाशक, तथा गुरु (दुष्पच) होता है। वर्षाकल
में मयूर का मांस निषिद्ध है, क्योंकि इस समय दुष्ट कीटों, सर्पों का भक्षण करने
के कारण मयूर- मांस दूषित हो जाया करता है॥२०१-२०२॥
अथ हिताहितम्
सद्योहतं भवेन्मांसं व्याधिहारि सदाऽमृतम्।
वयःस्थमकृशं सात्मयमन्यथा परिवर्जयेत्॥२०३॥
वृद्धानां दोषलं मांसं बालानां बलदं गुरु।
च्युतगर्भा गुरुर्योषिद्गर्भो गर्भवती तथा॥२०४॥
स्वयं मृतमबल्यं स्यादातीसारकरं गुरु।
विषामृतानां मांसं तु दोषत्रयरुगावहमू॥२०५॥
विहङ्गेषु पुमाञ्छेष्ठः श्रेष्ठा स्त्री पशुयोनिषु।


पृष्ठ १०३

पश्चिमाधों लघुः पुंसां स्त्रीणां पूर्वार्धमादिशेत्॥२०६॥
तुल्यजातिस्वल्पदेहा महादेहेषु पूजिताः।
अल्पदेहेषु शस्यन्ते ये स्युर्विपिनचारिणः॥२०७॥
हिताहित
हितकर तथा अहितकर मांस का विवेचन (वर्णन) किया जा रहा है।
क. सद्यभृत पशु-पक्षी का मांस रोगनाशक एवं अमृत के समान प्रभावकारी होता है,
आयुष्य तथा शारीरिक दौर्बल्यहर तथा सात्म्य होता है।
ख. इसके विपरीत (बिम्ब से मृत पशु-पक्षी का मांस) हानिकर होने से, परित्याग
होता है।
ग. सामान्यतः पशु-पक्षी मांस, दोषोत्पादक, अत्यन्त बलदायक एवं गुरु दुष्पाचक
होता है।
घ. च्युतगर्भा (गिरे हुए गर्भ) वाले/ वाली मादा, (स्त्री जाति) के। की पशु-पक्षी का
मांस गुरु (कठिनाई से पाचक होता है। इसी प्रकार (गर्भवती) मादा का मांस मृद
होता है।
ङ. स्वयं मृत पशु-पक्षी का मांस दुर्बल, अतिसारकारक एवं गुरु हुआ करता है।
च. विषाक्तप्रभाव से मृत पशु-पक्षी त्रिदोषजनक तथा रोग जनक होता है।
छ. पक्षी मांस श्रेष्ठ तथा पशु योनि में मादा का मांस उत्तम माना जाता है।
ज. स्त्रियों के अग्रभाग तथा पुरुषों में पृष्ठभाग (पशु-पक्षी) ग्रहणीय होता है तथा
लघु (पुरुषमांस) माना गया है।
झ. स्थूल शरीर के पशु-पक्षी की तुलना में, सूक्ष्म (छोटे) शरीर के पशु-पक्षी का
मांस गुणों में होता है। अल्पदेह वाले (पशु-पक्षी) की अपेक्षा विपिन (वनो मे)
विचरण करने वाले का मांस श्रेष्ठ हुआ करता है॥२०३-२०७॥
चेष्टावता परं मांसं हृद्यं रुच्यं लघु स्मृतम्।
देहमध्यं गुरु प्रायः सर्वेषां प्राणिनां मतम्॥२०८॥
पक्षक्षेपपाद्विहङ्गानां तदेव वरमुच्यते।
गुरूम्प्यण्डानि सर्वेषां गुर्वी ग्रीवा च पक्षिणाम्॥२०९॥

पृष्ठ १०४

१०४ क्षेमकुतूहलम्
ये मृगा विहगास्तोयदूरावासप्रचारकाः।
तेऽनभिष्यन्दिनः सर्वे विपरीता अतोऽन्यथा॥२१०॥
जलानूपभवाः सर्वे जलानूपचराश्च ये।
गुरुभक्ष्या गुरुतरं तेषां मांसमुदीरितम्॥२११॥
क. चेष्टावान् पशु-पक्षी का मांस गुण- हृद्य, रुच्य, लघु
ख. देह मध्य मांस गुण- प्राय, गुरु
ग. पक्षी (पंख) हिलाने (पशु-पक्षी) के कारण पक्षी- मांस उत्तम
घ. सर्वप्राणि अण्ड तथा ग्रीवा- गुरु
ङ. अजलीय पशु-पक्षी (निवास-विचरणकर्त्ता)- अनभिष्यन्दी
च. जल के निकटस्थ पशु-पक्षी का मांस- अभिष्यन्दी (पूर्व के विपरीत)
छ. जलीय प्रदेश- अल्प (निम्न) प्रदेशज तथा विचरणकर्त्ता प्राणियों का मांस-
अधिक गुरु (दुष्पाच्य)।
धान्योत्पत्तिप्रचाराणां लघु स्याल्लघुपक्षिणाम्।
ऊरुस्कन्धोदरं मूर्धा पादौ पाणी कटी तथा।
दृष्टित्वग्यकृदन्त्राणि गुरूण्याहुर्यथोत्तरम्॥२१२॥
ग्राम्यं मांसं वनजमथवाऽऽनूपजं वा बिलौकं
श्वेतं पीतं हरितमरुणं पाचितं सूपकारैः।
तल्यं शूल्यं सरसमधुरं स्वेदितं वाटितं वा
यस्य प्रायो यदभिरुचितं स्तूयते तेन तद्धि॥२१३॥
क. धान्योत्पत्तिदेशजश्चापि (विचरक) लघु पक्षी मांस- लघु
ख. प्राणियों के उरु, स्कन्ध, उदर, मूर्धा, पाद, हस्त, कटि, नेत्र, त्वक् (चर्म)
तथा यकृत एवं आन्त्र (का मांस)- उत्तरोत्तर गुरु
ग्राम्यज, वनज वा आनूपज, बिलौक (विलेशय) निवासी, श्वेत-पीत-हरित-अरुणवर्णीय
पशु-पक्षी के मांस को पाक करें। सूपकारों द्वारा विभिन्न प्रकार से तलित, शूल्य पक्व,
सरस, मधुर, स्वेदित या वाटित (वेष्टित) पर सिद्ध मांस- इनमें जो मांस उसकी रुचि
के अनुसार सुग्राह्य अभिलषित है, वह प्रायः उसी (भोक्ता) मांस की प्रशंसा (स्तुति)
करना स्वाभाविक है।।२१२-२१३।।


पृष्ठ १०५

षष्ठोत्सवः १०५
भक्तादिमांसपर्यन्तं सर्वमुक्तं मया भृशम्।
अथ मत्स्यभवा भक्ष्या उच्यन्ते सप्तमोत्सवे॥२१४॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्मविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
मांसप्रशंसनो नाम षष्ठोत्सवः॥६॥
उपसंहारात्मक रूपरेखा
इस उत्सव (प्रकरण) के अन्तर्गत भक्त (भात) से मांस तक पाक की विधि तथा
गुणों का विवेचन मैंने किया है। आगामी सप्तम उत्सव (प्रकरण) में मत्स्यज भक्ष्य
पदार्थों के पाक (निर्माण) तथा गुणावली प्रस्तुत की जायेगी।।२१४।।
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का षष्ठ उत्सव समाप्त॥

अथसप्तमोत्सवः

(सप्तम् प्रकरण)

अथ मत्स्यमांसप्रकार

मत्स्यखण्डानि संधृष्य क्षालयेत्प्रथमं जले।
ततो वेसनतक्राभ्यां बहुशः क्षालयेत्पुनः ॥ १ ॥

मत्स्य मांस निर्माण

मत्स्य (मछली) का साम्यक सघर्षण तथा खण्डित कर, जल से प्रक्षालन करते हैं, फिर वेसन (चणक्य सूक्ष्म चूर्ण) तथा तक्र (मट्ठा) क साथ बहुशः प्रक्षालन (धोते) करते हैं॥१॥

अथ गन्धनाशनम्

हरिद्राशुण्ठिधान्याककटुतैलैर्विमर्दयेत् ।
पक्षाल्य हिङ्गुना लिम्पेद् गन्धस्तेनोपशाम्यति ॥ २ ॥

मात्स्य गंध निवारण

प्रक्षालित मत्स्य मांस खण्डों को हरिद्रा- शुण्ठी-धान्यक-सर्षप तैल साथ विमर्दन करके, प्रक्षालन तथा हिंगु लेप का आवरण करें- इस क्रिया से मत्स्यगत गंध का शमन (निवारण/दमन) हो जाता है॥२॥

अथ मत्स्योत्तमरन्धनम्

तप्ततैले क्षिपेद्धान्यं कासमर्दं सहिङ्गकम्।
भृष्टं मत्स्यं सलवणं तक्रं क्षिप्त्वा पुनः पचेत् ॥ ३ ॥
अर्धपक्के क्षिपेदाप्रसिद्धचूर्णं सनागरम्।
दग्धं हिङ्गु विनिक्षिप्य साधयेन्मत्स्यमुत्तमम् ॥ ४॥

मत्स्योत्तमरन्थन (मत्स्य पाक विधि)

सुप्रक्षालित, गंधविहीन, खण्डशः (सुसंघर्षित) मत्स्य मांस की, संतप्त तैल में, धान्यक-कासमर्द (मसाला या छोंक), हिंगु भृष्ट के साथ करते (भूनते) हैं। इस मत्स्य को लवण सहित तक्र में पुनः पाक करते हैं, अर्धपक्ववान में, आम्र चूर्ण (अमचूर) शुण्टी चूर्ण मिला कर घृत संतप्त हिंगु डालकर, मत्स्य का पाक (सिद्ध) करते हैं॥३-४॥


सप्तमोत्सवः [पृष्ठ १०७]

अथ मत्स्यप्रलेहः

मांसप्रलेहवत्कार्यः प्रलेहो मत्स्यसंभवः ।
आदौ तैले खरे पक्वं सर्वमन्यद्धि पूर्ववत् ॥ ५॥
वर्णस्य करणे देयं पूर्वोक्तं द्रव्यकं हि यत् ।
उद्धूलनं सुगन्धाय दातव्यं पूर्वमीरितम् ॥ ६॥

मत्स्य प्रलेह

मांस प्रलेह के समान मत्स्य प्रलेह निर्माण विधि है, परन्तु मत्स्य खण्डों को खरपाक तैल में पाक कर लेते हैं (अन्य विधि मांस प्रलेह वत्) मत्स्य प्रलेह के वर्णीकरणार्थ, पूर्वोक्त द्रव्यों (वंकुम तथा रक्तचन्दन) का मिश्रण करते हैं, तथा सुगन्धित बनाने हेतु सुगन्धिद्रव्यों का उद् धूलन (चूर्ण) का संयोग कर देते हैं॥५-६॥

अथ मत्स्यखण्डप्रलेहः

सम्यक्पक्षालितं मत्स्यं वेसवारेण वेष्टितम्।
तत्तैले क्षिपेत्खण्डं हिङ्गुसैन्धवमिश्रितम् ॥ ७ ॥
प्रलेहविधिवत्साध्यो मत्स्यखण्डप्रलेहकः ।

मत्स्य खण्ड प्रलेह

सुपक्षालित मत्स्य मांस खण्ड के वेसकर से आवेष्टित कर, संतप्त तैल मे छोड़ते हैं, हिंगु तथा सैन्धव मिलाकर प्रलेह विधि से पाक करते हैं॥७ १/२॥

अथ मत्स्यपिष्टिका

गतत्वक्कण्टको मत्स्यो वेसवारेण संयुतः ॥ ८ ॥
शिलायां पेषितो भूयः प्रोच्यते मत्स्यपिष्टिका।
तैले विपाचयेत्पश्चाच्चतुर्थांशाम्लसंयुतम् ॥ ९ ॥
वेसवारेण च युतं शिलायां पेषयेत्पुनः ।
अनया पूर्ववत्कार्या मासस्येव प्रकारकाः ॥ १०॥
वटिका वटकाद्याश्च सूपकारधियोचिताः।