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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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७२ क्षेमकुतूहलम्
नहीं होते। सामान्यतः मुद्ग (मँग) के पापड़ लघु एवं रुचिकर आदि गुणों को प्रदान
करते है- (विधिपाचितः)॥३९-४०॥
अथ पटोलफलम्
फलं पटोलं विहितद्विखण्डं विशुद्धद्रव्यार्हत शुष्कपाकम्।
वाघारितं हिङ्कणे सहाज्ये ससैन्धवं बोधयति क्षुधां च॥४१॥
पटोलं पाचनं हृद्यं वृष्यं लध्वग्निदीपनम्।
स्निग्धोष्णं हन्ति कासार्शोज्वरदोषत्रयकृमीन्॥४२॥
पटोल फल (परवल)
पटोल के फलों के द्विखण्डों को घृत-हिंगु में भूनकर, विशुद्ध द्रव्य, (बेसवार) तथा
सैंधव लवण मिश्रित करने के साथ पकाते है (यह अग्निदीपन, पाचक, हृद्य, वृष्य, लघु,
स्निग्ध, उष्ण तथा कास-अर्श-ज्वर-त्रिदोष-कृमिनाशन होता है॥४१-४२॥
अथ ताहडी
निरस्थिवेसवाराढ्यं पलं पक्वं सतन्दुलैः।
घृतार्द्रमार्द्रकैर्युक्तं नाम्ना तत्ताहडी स्मृता॥४३॥
वातपित्तहरा गुर्वी शुक्रपुष्टिप्रदा भृशम्।
गुणानां यो विशेषोऽय मांसभेदात्स जायते॥४४॥
ताहड़ी (ताहरी)
अस्थिरहित वेसवार युक्त तन्दुल (चावल) से पतन, घृत सहित (आर्द्र) तथा
आर्द्रक युक्त मांस-को 'तहड़ी' नाम दिया जाता है। यह मल का आहार है। यह वात-
पित्तनाशक, गुरु तथा शुक्रपुष्टिदायक हैं; ताहडी के गुण अन्य मल के गुणों (मल मुखर
घटक द्रव्य) के अनुसार होती हैं॥४३-४४॥
अथ कृशरा
तन्दुलैः षष्टिसंभूतैः कण्डितैर्न च खण्डितैः।
अष्टभागयुतैर्मुद्गैः संयुक्तैर्द्वादशांशकैः॥४५॥
सार्द्रा नार्द्रा सुगन्धाना सवाहीका वरान्विता।
सस्नेहा कामिनीवेयं कृशरा शिशिरे हिता॥४६॥
कृशरा दुर्जरा बल्या गुर्वी वातविनाशिनी।
बलपुष्टिमलश्लेष्मपित्तविष्टम्भकृत्सरा ॥४७॥


षष्ठोत्सवः ७३
कृशरा (खिचड़ी)
अखण्डित तन्दुल (तण्डुल-चावल) अष्टभाग तथा मुद्ग द्वादश भाग, केशर एवं
सुगन्धित द्रव्य (वेसवार), हरिद्रा मिश्रित- शुष्क या आर्द्र पाक किया जाता है। यह
आहार-द्रव्य घृत के साथ खाने से, नवयौवक (कामिनी) स्त्री के समान शिशिर (हिम)
ऋतु में हितकारी है। यह दुर्जर, वस्त्र, मुद्र, वातनाशक, बल्य, पुष्टिदा, मल-कफ-
वातावरोध (आनाह-विष्टम्भ) जनक तथा सारक होती है॥४५-४७॥
अथ कर्चरी
क्षाराम्लकृतसंस्कारा शुष्का स्नेहविपाचिता।
अरोचकादिरोगाणां कर्चरी कण्ठकर्तरी॥४८॥
कर्चरी रुचिकृद्बल्या सुस्वादी त्वतिलेखनी।
उष्णा पित्तपरा प्रोक्ता कफकृत्सारका स्मृता॥४९॥
कर्चरी (कचरी)
क्षार एवं अम्ल पदार्थों के मिश्रण से पक्व शुष्क कर्चरी बनती है। यह अरोचक
आदि रोगनाशक, कण्ठ कर्चरी (गले को साफ करनेवाले) होती है। रुचि, बलवर्धन,
स्वादु, अतिलेखनी (मल पतला करने वाली), उष्ण, पित्त-कफकारक तथा सारक होती
हे॥४८-४९॥
अथ मूलकम्
सुकलितमतिसूक्ष्मं बालमूलस्य मूलं
लवणमथितमुच्चैः पीडितं पाणियुग्मे।
सुरभितमतिनिम्बूहिङ्गुधूपेन युक्तं
भवति जठरवह्नेस्तूर्णमुद्दीपनाय॥५०॥
मूलक (मूली)
बालमूलक (छोटी मूली) के अत्यन्त सूक्ष्म (पतले) मूल में लवण मिलाकर,
दोनों हाथों से मसलकर, निम्बूक स्वरस तथा भृष्ट हिंगु मिश्रितकर सुगंधित करते हैं।
यह मूलक का आहार-द्रव्य तुरन्त जाठराग्नि का प्रदीपन करता है॥५०॥
मूलकं वातलं रुच्यं वीर्योष्णं पाचनं लघु।
हन्ति दोषत्रयं श्वासं सुष्ठुयोगाच्च पीनसान्॥५१॥