क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 136 में से
संदर्भ में पढ़ें[पृष्ठ ८६]
ख. गुण- मांसवर्धक-वृंहण, वस्त्र, शीतल, तर्पण, गुरु, श्रम, वातहर, स्निग्ध
तथा बलवर्धन। ११०-११३।।
अथ गोधा
गोधामुष्र्णाजलैर्भूयः क्षालितां खण्डशः कृताम्।
स्विन्नां च तोयतक्राभ्यां क्षालितां सूक्ष्मखण्डिताम्॥११४॥
तलयेद्वेसवाराम्लैः प्रलेहो वा विधानतः।
विपाके मधुरा गोधा वातपित्तप्रणाशिनी ॥११५॥
कषाया कटुका प्रोक्ता कफघ्नी बलवर्धिनी।
गोधा
क. विधि- गोधा मांस को उष्ण जल से बहुप्रक्षालित कर खण्ड करते हैं तथा
उबालने है- जल तथा तक्र से पुनः प्रक्षालित कर, वेसवार तथा अम्ल रस
मिलाकर, तलन करें या प्रलेह (पाक विधि अनुसार) का निर्माण कर लेते हैं।
ख. गुण- महार (विपाक), वातपित्तनाशक, कषाय, कटु रस, कफनाशक तथा
बल्य।।११४-११५१/२।।
अथ कच्छपः
तप्ततोये परिक्षिप्त सम्यगानीय कच्छपम् ॥ ११६॥
तन्मांसं कर्पराद्ग्राह्यं खण्डितं स्वल्पखण्डितम्।
पाचितं सार्षपे तैले हिङ्गुसैन्धवसंयुते ॥ ११७॥
वेसवारसमायुक्ते दाडिमेन सहाम्लिते।
कच्छपो बलकृच्छीघ्र वातजिच्छुक्रकारकः ॥ ११८॥
स्निग्धोष्णाः प्रीणनः सद्यो विपाके कटुकः सरः।
कच्छप
क. विधि- कच्छप (कछुए) के मांस को उष्ण जल में डालकर, उसके अस्थि भाग
को पृथक करके मांस निष्कासित कर- छोटे खण्ड बना लेते हैं। इसको हिंगु से
तैल में भृष्ट (छौंककर) करके, सैन्धव, वेसकार चूर्ण मिलाते हैं, फिर दाडिम
रस मिश्रित बनाकर अम्ल बना लेते हैं- इस प्रकार मांस पक्व (सिद्ध) हो
जाता है।
[पृष्ठ ८७]
ख. गुण- बल्य, आशु वातरोगहारी, वृष्य, स्निग्ध, उष्ण, सद्यः प्रसन्नतादायक,
कटुविपाकी तथा सारक।।११६-११८१/२।।
अथ प्रलेहा:
स्थूलानि मांसखण्डानि क्षालितानि च वारिणा ॥ ११९॥
तप्तस्नेहे विनिक्षिप्य दर्व्या संचालयन् पचेत्।
ततस्तत्र विनिक्षिप्य लवणं जलमल्पकम् ॥ १२०॥
पचेत्पटपटाशब्दं तस्मिन्मांसे प्रकुर्वति।
प्रक्षिपेद्दाडिमीनीरं बहु तेन पचेत्पुनः ॥ १२१॥
मांसपिण्डेषु सिद्धेषु देया शुण्ठी सजीरका।
तत उत्तार्य तन्मांसं पृथक्कुर्यात्प्रलेहतः॥ १२२ ॥
प्रलेहं वाससा पूतं स्थापयेदन्यभाजने।
हिङ्गुना घृतयुक्तेन धूप तत्रैव दापयेत् ॥ १२३॥
प्रलेह विधान (गौरीमतानुसारेण)
मांस के स्थूल (बड़े-मोटे) खण्ड (टुकडों) को जल से प्रक्षालित करके, तप्त
स्नेह में दवीं (कलछुल) से चलाकर, पकाते हैं। फिर सैन्धव चूर्ण को अल्प जल
मिलाकर; पटपटा शब्द वक होने तक, इस मांस द्रव्य का पाक करते हैं, पुनः दाडिम
स्वरस डालकर एक बार फिर पकाते हैं। इसके पश्चात् जीरक तथा शुण्ठी चूर्ण मिला
कर, अग्नि से उतारकर, मांस खण्डों को पृथक् कर लेते हैं (अन्य पात्र में स्थानान्तरित)।
तदनन्तर घृत सहिता हिंगु के धूम से सुगन्धित (सुवासित) कर लेते हैं। यह गौरी मत
के अनुसार 'प्रलेह' होता है।।११९-१२३।।
अथ पत्तलप्रलेहः
स एवाल्पामिषस्नेहः साधितः पत्तलः पुनः।
तथैव वाससा पूतो धूपितोऽपि च पत्तलः ॥ १२४॥
पत्तल प्रलेह
अल्प मांस तथा स्नेह डालकर सिद्ध किया (पूर्वोक्त विधिवत्) प्रलेह की
'पत्तल प्रलेह' संज्ञा होती है। इसको सुगन्धित करने की प्रक्रिया चूर्णवत् है
(वस्त्रपूत)।।१२४।।