सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 45

८४ क्षेमकुतूहलम्
पाठी सुशीतमधुरा बल्या पित्तविनाशिनी।
वातहत्कफहाऽत्यर्थं शुक्रदा रुचिकृद्वरा ॥ १०२ ॥
पाठी मांस के गुण
शीतल, मधुर, बल्य, पित्तशामक, वात-कफनाशक, शुक्रदा, रुचिकर
(परम्)॥१०२॥
अथ साम्बरमांसम्
मांसं साम्बरसंभूतं पाचितं बहुधा घृते।
वेसवारोषणाकीर्णे हिङ्गुसैन्धवसंभृते ॥ १०३॥
बलपुष्टिकारं रुच्यं विष्टम्भि गुरु पाचनम्।
साम्बरं बलदं शीतं सुस्वादु पललं मतम् ॥ १०४॥
रसे पाके च मधुरं रक्तपित्तनिबर्हणम् ॥ १०५ ॥
साम्बर
साम्बर (सावर) मृग मांस के खण्डों को हिगु भृष्ट कर, सैन्धव-वेसवार-मरिच
चूर्ण मिलाते हैं- इसप्रकार मांस को सिद्धकर लेते हैं।
सोम्बर मांस के गुण- बल्य, पुष्टिकर, शीतल एवं स्वादु रस-पाक में मधुर,
रक्तपित शामक॥१०३-१०५॥
अथ चित्तलस्य मांसम्
असिततिलोद्भवतैलविपक्वं लवणयुतं नवहिङ्गुरसाढ्यम्।
त्रिकटुकयुक्तनिशार्द्रकमिश्रं बहुगुणचित्तलमांसमनर्घ्यम् ॥ १०६ ॥
विचित्रशम्बरौ शीतौ गुरुस्निग्धौ कफावहौ।
रसे पाके च मधुरौ रक्तपित्तविनाशनौ ॥ १०७ ॥
चित्तल
क. चित्तल (विशिष्ट जाति का मृग शाखिश्रृंग) के मांस-खण्डों को कृष्ण तिल तैल
में सैन्धव लवण, हिंगु, त्रिकटु, चूर्ण एवं आर्द्रक मिलाकर पकाया (सिद्ध
किया) मांस अति गुणवान् तथा उत्तम (बहुगुणवान्)।
ख. द्विजाति शाम्बर (विचित्र-चितकावर) मांस शीतल, गुरु, स्निग्ध, कफवर्धन,
मधुर (रस-विपाक) तथा रक्तपित शामक होता है॥१०६-१०७॥


षष्ठोत्सवः ८५
अथ रोजस्य मांसम्
तैले सुपाचितं तप्ते हिङ्गुसैन्धवसंयुते।
मांसं गवयसंभूतं सुस्विन्नं भूरिवारिणा ॥ १०८ ॥
गवयो मधुरो वृष्यः स्निग्धोष्णः कफपित्तलः।
गुरुर्विदाही विष्टम्भकारको विरसः सदा ॥ १०९ ॥
रोज (गवय)
क. रोज (गवय नील गाय) के मांस खण्डों को प्रभूत (पर्याप्त) जल में उबाल कर,
तप्त (गर्म)- तैल में हींग से भृष्ट (भूनकर), सैंधानमक मिलाकर विधिवत् पाक
कर लेते हैं।
ख. रोज-मांस मधुर, उष्ण वृष्य, स्निग्ध, वातपित्तजनन, गरिष्ठ (विष्टाम्), गुरु,
विदाही, मलावरोधक तथा सर्वदा विरस हमेशा फीका-स्वाद में हल्का) रहता/
होता है॥१०८-१०९॥
अथ वराहः
वराहस्य तनुं तप्ततोयैः प्रक्षालितां मुहुः।
तृणाग्निनाऽथवा दग्धां किञ्चित्तोयेन सेचिताम् ॥ ११० ॥
शस्त्रेण दर्शयेत्तत्र यथा निर्मलौमता भवेत्।
ततस्तत्तीक्ष्णशस्त्रेण पाटयित्वा यथोचितम् ॥ १११ ॥
गृह्णीयादामिषं तस्य पृथगङ्गविभागशः।
रन्धयेद्वहुधा ब्रघ्नं प्रलेहतलनादिकम् ॥ ११२ ॥
स्वेदनं बृंहणं वृष्यं शीतलं तर्पणं गुरु।
श्रमानिलहरं स्निग्धं वाराहं बलवर्धनम् ॥ ११३ ॥
वराह
क. वराह (सुअर) सम्पूर्ण मांस युक्त शरीर की उष्णजल से बहुप्रक्षालित करके
(अथवा तृणाग्नि से वराह) शरीर अंग को दहन करके) अल्प जल से पुनः
प्रक्षालन करें, शस्त्र से काटकर कूल (रोम) रहित कर लेते हैं (निलेमिका)।
तदनन्तर तीक्ष्ण शस्त्र से उचित टुकड़े कर लेते हैं (पाटन)। इस मांस द्रव्य से
विविध प्रकार के कल्प (पाक) निर्माण किये जा सकते हैं, यथा- प्रलेह, तलन
आदि (पाक विधि के अनुसार) बनाते हैं, मांस का सुपाक (रंधनेद्धुआ ब्रघ्नम्)।