क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० क्षेमकुतूहलम् षष्ठोत्सवः ९१
ख. गुण- वातनाशक, कफकारक, मुखवैरस्यनाशक तथा गुरु होता है॥१३३- अथ हरितवर्णप्रलेहः
१३४¹/₂॥ मेथिका कासमर्द्दाम्लकल्केन च करालिते।
अथ शुक्लवर्णप्रलेहः घृते मांसं विनिक्षिप्य पचेच्छुक्लप्रलेहवत् ॥ १४१ ॥
घृतवेसनधान्याकहिङ्गुभृद्दधिसंयुते ॥ १३५ ॥ सिद्धं च गालयेद्वस्त्रैः कृत्वा वर्णप्रयोजनम्।
वस्त्रपूतेऽर्धसंपक्के स्विन्नं मांसं विनिक्षिपेत्। ताम्बूलं काष्ठजाङ्गारं देयं हरितहेतुना ॥ १४२ ॥
लवणं हिङ्गु निक्षिप्य शुण्ठीं क्षिप्त्वा सुपाचयेत् ॥ १३६ ॥ हरित वर्ण प्रलेह
एलां क्षिप्त्वाऽवतार्येत पटपूतं च धूपयेत्। मेथिका, कासमर्द (छौंक) अम्लिका कल्क से करालित, घृत में मांस (खण्ड)
शुक्लवर्ण प्रलेह डालकर शुक्ल प्रलेह (पूर्ववत्) पाक करते हैं, पक्व (सिद्ध) हो जाने पर, वस्त्र धौत
घृत, वेसन, धान्यक, हिंगु, दधि मिश्रित कर वस्त्रपूत करते हैं, अर्धपाक जाने करते हैं। ताम्बूल तथा काष्ठमांसाद हरित वर्ण बनाने हेतु मिश्रित कर देते हैं॥१४१-
पर स्विन्न मांस डाल देते हैं सैन्धव, शुण्ठी चूर्ण मिलाकर सुपक्व करते हैं तथा बड़ी १४२॥
इलायची (बृहदैला) का चूर्ण मिश्रित कर वस्त्रपूत (छान) लेते है, तथा सुगन्धित धूप अथ रक्तवर्णप्रलेहः
से सुन्धित कर लेते हैं॥१३५-१३६¹/२॥ रक्तवर्णप्रलेहस्य संसिद्धयर्थं विनिक्षिपेत्।
अथ पीतवर्णप्रलेहः करमर्दं दाडिमस्य स्थाने शेषं तु पूर्ववत् ॥ १४३ ॥
प्रलेहः पीतवर्णोऽपि कार्यः शुक्लप्रलेहवत् ॥ १३७॥ अरुचौ रुचिदः सद्यो नानावर्णप्रसाधितः।
विशेषोऽत्र हरिद्रायाः संसर्ग कुङ्कुमस्य वा। प्रलेहः कफवातघ्नः किञ्चित्पित्तकरः स्मृतः ॥ १४४॥
तप्तस्नेहे क्षिपेद्धिङ्गुसंयुक्तं कासमर्दनम् ॥ १३८ ॥ रक्तवर्ण प्रलेह
धान्यं च लवणाजाजी धौतं मांसं ततः क्षिपेत्। क. विधि- रक्तवर्ण प्रलेह पाक हेतु, दाडिम के स्थान पर करमर्द डालते हैं।
ततोऽर्धस्फुटिते मांसे दाडिमी बीजसंयुतम् ॥ १३९ ॥ शेषविधान पूर्ववत् (शुक्लवर्ण प्रलेह के समान)।
तक्रं शुण्ठीं विनिक्षिप्य सिद्धे हिंगु विनिक्षिपेत्। ख. गुण- सद्य रुचिकारक, विविध वर्णीय प्रलेह कफ-वातनाशक तथा किंचित
तत उत्तार्य वस्त्रेण गालयेद्धूपयेदपि ॥ १४० ॥ पित्तकारक होता है॥१४३-१४४॥
पीतवर्ण प्रलेह अथ भृष्टमांसम्
यह (पीतवर्ण) प्रलेह, शुक्लवर्ण प्रलेह के समान बनता है; केवल इसमें हरिद्रा अङ्गारकर्पराभ्यां च शूल्यन्त्रे पुरेऽथवा।
या कंकुम (केशर) का चूर्ण मिश्रित कर देते हैं। तप्त तैल में कासमर्द (छौंक या भर्जनं विविधं प्रोक्तं सूपकारविशारदैः ॥ १४५ ॥
मसाला) मिलाने के पश्चात, धान्यक-सैंधव-जीरक-धौत (धुला) मांस डालते हैं। मांस जलेन स्वेदयेत्पूर्वं प्रोतं शूलेऽन्तरन्तरम्।
के अर्ध स्फुटित (आधा खिल जाने पर) अनार बीज, तक्र तथा शुण्ठी डालकर सिद्ध दध्यार्द्रहिङ्गुलवणैर्लिप्ताङ्गारग्निना पचेत् ॥ १४६ ॥
करते हैं, फिर (अन्त में) हिंगु (घृत भृष्ट) मिला देते हैं। फिर अग्नि से उतार कर, तच्छूल्यं तु सुधासुल्यं रुच्यं वह्निप्रदं लघु।
सुगन्धित धूपित करते हैं॥१३७-१४०॥ तदेवाङ्गारपक्वं तु प्रत्तंसं वातनाशनम् ॥ १४७ ॥