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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

९६ क्षेमकुतूहलम्
अथ कुट्टितं मांसम्
मांसमस्नायु संगृह्य सूक्ष्मं कृत्वा त कुट्टितम् ॥ १६६ ॥
वेसवारसुगन्धं तत्स्वेदितं पाचितं भवेत् ।
कुट्टितं पाचितं मांसं तन्मांसं लघु दीपनम् ॥ १६७ ॥
तत्रापि जाङ्गलं श्रेष्ठं जाङ्गलेष्वपि पक्षिणाम् ।
कुट्टित मांस
क. विधि- स्नायु रहित मांस के सूक्ष्म खण्डों का कुट्टन (कूटकर) सुगन्धित द्रव्य
मिलाकर स्वेदन कर पकाते हैं। यह 'कुट्टित मांस' कहा जाता है।
ख. गुण- यह लघु, पाचक तथा दीपन होता है। यह जांगल पक्षियों में उत्तम मांस
माना जाता है।।१६६-१६७ १/२ ।।
अथ मधुरमांसपाकः (क्षीरामृतम्)
घृताम्बुस्वेदिते मांसे शुण्ठिचूर्णं विनिक्षिपेत् ॥ १६८ ॥
दुग्धं च शर्करोपेतं पश्चात्सौगन्धिकं न्यसेत् ।
नातिसान्द्रं नातिशुष्कमिदंक्षीरामृतं स्मृतम् ॥ १६९ ॥
क्षीरामृतं बहुरसं न चोष्णं नातिशीतलम् ।
वातपित्तहरं वृष्यं सुस्निग्धमतिकोमलम् ॥ १७० ॥
मधुर मांसपाक (क्षीरामृतम्)
क. विधि- घृत तथा जल के साथ पाक्व मांस, में शुण्ठी चूर्ण डालते हैं, फिर दुग्ध
तथा शर्करा का मिश्रण कर देते हैं, तथा अन्त में सुगन्धित द्रव्य से सुवासित कर
देते हैं। यह पाक, अधिक गाढ़ा (सान्द्र) तथा न अधिक शुष्क (सूखा) होना चाहिए।
ख. गुण- यह बहुरसयुक्त पाक, न अधिक उष्ण एवं न अधिक शीतल, वातपित्त-
नाशक, वृष्य, सुस्निग्ध तथा अतिमृदु।।१६८-१७०।।
अथ मुण्डरन्थनम्
समग्रं विदहेन्मुण्डमग्निना स्थूलहेतिना।
प्रक्षाल्य तप्तपानीयैर्लोमनाशाय घर्षयेत् ॥ १७१ ॥
खण्डयित्वा पचेत्तैले घृते वापस्करान्विते ।
मुण्डामिषं वातहरं स्निग्धं गुरुतरं स्मृतम् ॥ १७२ ॥
षष्ठोत्सवः ९७
पशोर्यस्य हि यन्मुण्डं तन्मांसैकगुणावहम् ।
मुण्डस्य विधिना पाच्यं चरणं तु प्रलेहितम् ॥ १७३ ॥
चरणं वातहृद्बल्यं वृष्यं पित्तहरं गुरु।
मुण्डरन्थन विधान
क. विधि-पशु के सम्पूर्ण मुण्ड के तीव्र अग्नि में दहन करें, तप्त जल में- जल
से प्रक्षालन हेतु- रोगों (बालों) का घर्षण करके उनका निष्कासन कर देते हैं।
तत्पश्चात् मुण्ड के खण्ड करके स्नेह में पाक करते हैं- लवण तथा उपस्कार
मिलाकर, पाक कर लेते हैं। मुण्ड का भलीभाँति पकाते हैं तथा चरण (पैरों) को
प्रलेह की भाँति पकाना चाहिए।
ख. गुण- यह (मुण्ड मांस) वातनाशक, स्निग्ध, गुरु (गरिष्ठ) पशु के गुणानुसार
मुण्ड का भी गुण रहता है। पशु चरण (पक्व) वातनाशक, हृद्य, वृष्य,
पित्तशामक तथा गुरु होता है।।१७१-१७४।।
अथान्त्ररन्थनम्
अन्त्रिकां छिद्रमार्गेण धौतां निर्मलवारिणा ।
शृङ्खलासंज्ञितां कृत्वा स्वेदयेद्धिङ्गुवारिणा ॥ १७४ ॥
कर्तितां वेसवाराम्लैस्तलयेद्वा प्रलेहयेत् ।
अन्त्रिका गुर्विकाऽरूक्षा वातहृच्छ्लेष्मकारिणी ॥ १७५ ॥
निःसारा विरसोद्गारा तद्वज्ज्ञेया तु घण्टिका ॥ १७६ ॥
आन्त्रराधनम्
क. विधि- आन्त्र के छिद्र को स्वच्छ जल से प्रक्षालन करके, श्रृंखलाकार में हिंगु-
जल से स्वेदन करते हैं। तत्पश्चात् काटकर वेसवार तथा वेसवार तथा अम्ल जल
मिलाकर, तेल या प्रलेह बना लेते हैं।
ख. गुण- अन्त्रिका मास गुरु, अरूक्ष (स्निग्ध), वातनाशक, कफवर्धक, क्षार-
रहित, विरस, उद्गार जननी। इसी प्रकार घण्टे का (घाँटी) का भी गुण होता
है।।१७४-१७६।।
अथ राजिकामांसम्
स्विन्नं तक्राम्बुना मांसं घृतभृष्टं सुवासितम् ।
सुचूर्णं सैन्धवोपेतं दधिराजिकया युतम् ॥ १७७ ॥