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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 136 में से

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पृष्ठ 49

९२ | क्षेमकुतूहलम्
धृष्टमांसम्
क. विधि- सूपकार विपादों (पाक शास्त्रियों) ने अंगर आँच तथा कर्पूर (खपरी)
द्वारा शूलयन्त्र (या पुर) में विभिन्न प्रकार की विधियों से मांस भूनने का विधान
किया है। सर्वप्रथम जल में स्वेदन तथा शूल (लोहे की छड़ या शलाका) में कुछ
अन्तर देकर मांस के खण्डों के यूथ (माला जैसे) बना लेते है, उसके बार दधि,
आर्द्रक, हिंगु तथा लवण से लेप करके, इस शूल को अंगार (अग्नि) पर पकाते
हैं। यह शूल्य मांस अमृत के समान हो जाता है।
ख. गुण- रुचिकर, दीपन, तथा लघु। यही मांस अंगार पक्व हो जाने पर उष्ण
होता है तथा वात का नाश करता है॥१४५-१४७॥
अथ यकृद्भृष्टम्
स्विन्नं यकृद्धृते तप्ते दध्नाऽऽलोड्य च भर्जितम्।
मात्रया दधिसिन्थूत्थरामठैलापरिप्लुतम् ॥ १४८ ॥
मरिचार्द्रकसंयुक्तं सुगन्धिद्रव्यवासितम्।
गतद्रवं सुधांतुल्यं परिशुष्कं तदुच्यते ॥ १४९ ॥
परिशुष्कं स्थिरं स्निग्धं रोचनं तर्पणं लघु।
बलमेधाग्निमांसौजः शुक्रवृद्धिकरं परम्॥ १५० ॥
यकृद्भृष्टम्
क. विधि- यकृत (कलेजी/ कलेजा/ जिगर) को स्विन्न करके, दधि में मिलाकर,
शीतल घृत में भृष्ट करते हैं। फिर मात्रानुसार दधि, सैन्धव, हिंगु, एला, मरिच
चूर्ण एवं आर्द्रक को मिश्रित करते हैं, तथा सम्पूर्ण मांस द्रव्य को सुगन्धित कर
लेते हैं। द्रवांश शुष्क हो जाने पर, परिशुष्क यकृत् को प्राप्त करें- इसे सुधा
(अमृत) के समान कहा गया है।
ख. परिशुष्क यकृत् स्थिर, स्निग्ध, रुचिकारक, तृप्तिकर एवं लघु होता है; यह
बल्य, मेध्य, मांस-ओज तथा वीर्यवर्धक (गरम) है॥१४८-१५०॥
अथ तान्दूरम्
अङ्गारपूर्णगर्तायामलग्नमवलम्बितम् ।
विहितं संभृतैर्मासं पक्वं तान्दूरमुच्यते ॥ १५१ ॥
षष्ठोत्सवः | ९३
तान्दूरम्
अग्नि-अंगार से पूर्ण गड्ढे (गर्त) में एकत्रित कर बिना लटकायें हुए।
(अलग्नमग्नविचितम्- दोलायन्त्र के समान) परिपक्व मांस को पकाने की विधि को
'तान्दूरमांस' नाम दिया जाता है। यह तान्दूरी रोटी पकाने की विधि का अन्तरमंद है,
जिसमें रोटी (गेहूँ के रोटी से बनी) के स्थान पर मांस प्रयोग है॥१५१॥
अथ सुस्वादुतान्दूरम्
पचेद्गर्तन्तरिक्षस्थंलम्बि संभारसंभृतम्।
चतुर्दिङ्मण्डलाकारे पार्श्वप्रज्वलितानले ।। १५२॥
विपक्वं सुरभि स्वादु तान्दूरमिति कीर्त्यते।
तन्दूर मांस पाक
एकगर्त का खात (गड्ढे) के मध्य (बीच) में संग्रह (एकत्रित) कर की लटका देते
हैं, तथा चारों ओर मण्डलाकार पार्श्व में प्रज्वलित (जली हुई आँच) अग्नि में पक्व
(पकाते) हैं।
यह गुणों में सुस्वाद, सुगंधित एवं स्वादिष्ट पाक 'तान्दूर मांस' नाम धारण
करता है॥१५२१/२॥
अथ शूलपक्वतान्दूरम्
कोष्ठिकायां ससंभारमलग्नमवलम्बितम् ॥ १५३ ॥
मांस विधाय बाह्याग्निज्वालया स्वेदितं वरम्।
तान्दूरं रुचिदं मांसं मृदु पथ्यतमं स्मृतम् ॥ १५४॥
सद्योहतं नवं स्थूलमन्यथा दोषकारकम्।
शूलपक्व तान्दूर
क. विधि- कोष्ठिका (गर्त की चतुर्मिति-चारदीवारी पर) एकत्रित करके-शूल
(अल्पका) में लिप्त (लगा) तथा लटकाकर, बाह्याग्नि की ज्वला (अग्नि की
लपट) से मांस को भलीभांति स्वेदित करते है- इस पाक की 'शूल पक्व
तान्दूर' नाम दिया जाता है।
ख. गुण- रुचिकारक, मृदु, पथ्यतम (बहुत हितकर। नवीन स्थूल तान्दूर मांस विशेष
लाभप्रद होता है; अन्यथा यह दोषजनक हो जाता है॥१५३-१५४१/२॥
क्षे. कु. 7