क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ क्षेमकुतूहलम्
मांसासुरी तु वातघ्नी लघ्वी रुच्या बलप्रदा।
कफघ्नी पित्तला किञ्चित्सर्वाहारम्य पाचनी ॥ १७८ ॥
राजिका मांस
क. विधि- तक्र जल में मांस खण्ड का स्वेदन (उबाले) मांस को घृत में भृष्ट
(भून) कर सुवासित (सुगन्धित द्रव्यों) द्वारा करें, तदनन्तर राजिकाचूर्ण (राई),
सैंधव, वेसवार, दधि मिश्रित करके, राजिका मांस का पाक करते है।
ख. गुण- यह वातनाशक, लघु, रुचिकारक, बलप्रद, कफघ्नी, चिन्नल तथा
किंचित् सर्वाहारी पाचनी है।।१७७-१७८।।
अथ मांसपूरितवार्ताकिम्
वृन्तमुत्तार्य वार्त्ताकं कोरितं पूरयेद्दृढम्।
कुट्टिताख्येन मांसेन पूरितं पूरणेन वा ॥ १७९ ॥
ततस्तेनैव वृन्तेन तच्छिद्रं मुद्रितं पुनः।
सन्धिं कणिक्यया लिप्य प्रलेहविधिना पचेत् ॥ १८० ॥
मांसवृन्ताकसंभूतः प्रलेहो वातनाशनः।
रुचिपुष्टिकरश्चैव बल्यो वृष्यो रुजापहः ॥ १८१ ॥
क. विधि- वृन्ताक (बैंगन) के वृत्त तथा कोरित (गूदा) का निष्कासन कर, उत्तम
कुट्टित मांस-पुटपाक पक्व वेसवार युक्त की दृढतापूर्वकपूरित करते हैं अथवा
मृंगु-धान्यक के जल में स्वेदन किए मांस को, सूक्ष्म कुट्टित कर, हिंगु-जीरक,
आर्द्रक, निम्बू, एला, सैन्धव मिलाकर, संतृप्त घृत में भृष्ट करें तथा सुगन्धित
मांस से पूरित करते हैं।
ख. गुण- मांस वृन्ताक प्रलेह ग्राह्य, रुचिकर पुष्टिदा, बल्य, वृष्य तथा
रोगनाशक।।१७९-१८१।।
अथ पक्षिमांसप्रकारः
त्वक्पक्षरहितं मांसं स्विन्नं तक्रेण वा जले।
अथवा पुटपाकेन स्वेदितं वाऽथ दार्विके ॥ १८२ ॥
शलकास्थं पचेदग्नौ दधिसैन्धवहिङ्गुभिः।
संस्कृतं मरिचैलाभिरेतत्पक्वत मं स्मृतम् ॥ १८३ ॥
अथवा स्वेदितं मांसं पाचितं वैसवारिकम्।
षष्ठोत्सवः ९९
घृते द्रवे वा विरले प्रलेहविधिवत्पचेत् ॥ १८४॥
पक्षिमांस
क. विधि- पक्षियों के चर्म-पक्ष निष्कासित कर, तक्र या जल में स्वेदन करके,
काष्ठ या लौह शलका पर रख (लगा) कर, सैन्धव एवं हिंगु के साथ मरिच-
एला का चूर्ण डालकर पाक करते हैं। इस भलीभाँति पक्व मांस की पथ्यतम
मानते हैं अथवा स्विन्न (उबले) मांस को वेसवार मिश्रित कर, घृत या द्रव मे
पृथक्-पृथक् प्रलेह का पाक किया जाता है।।१८२-१८४।।
अथ महाबलपाकः
कृत्वा पक्षविहीनं तद्बीजपूरार्द्रसैन्धवैः।
लवङ्गैलायुतं पेष्यं लोष्टीकृत्य सुस्वेदितम् ॥ १८५ ॥
ततः कृतं शलाकास्थं भृष्टकं स्यान्माबलम्।
महाबलपाक (महाबलभूरिपाक)
क. विधि- पक्ष विहीन पक्षी में, बीजपूर स्वरस, आर्द्रक सैन्धव चूर्ण के साथ,
लवंग-एला-चूर्ण मिश्रित करके- जोष्ठीकृत (सिल पर घीस लेते हैं) तथा फिर
गोलक बनाकर, स्वेदन किया जाता है। तदन्तर काटकर शलाका पर रख
(लगा) कर, अग्निभृष्ट कर लेते हैं- इसी को महाबल या महाबलभूरिक पाक
कहा जाता है।।१८५१/२।।
अथ बलभूतिपाकः
त्वक्पक्षरहितं स्विन्नं गुम्फितं चान्तरान्तरम् ॥ १८६ ॥
शलाकायां च संपाच्यं भृष्टोपस्करसंयुतम्।
शूल्यं सर्वोत्तमं मांसं लघु रुच्यमपित्तलम् ॥ १८७ ॥
कफवातहरं श्रेष्ठं सर्वपाकोत्तमोत्तमम्।
बलभूतिपाक (महाबलभूरिपाक)
क. त्वक् (चमड़ी) तथा पक्ष (पंख) रहित पक्षी-मांस (के छोटे-टुकड़ों की) को
स्विन्न करके, शलाका में ग्रथित। गुण्ठित (माला की तरह बाँधकर) करके पकाते
हैं, फिर उपस्कर (वेसवार) सैंधवसहित, भृष्टकर (भून लेते) हैं।
ख. यह भृष्ट शल्य मांस सर्वोत्तम माना जाता है। लघु, रुचिकारक, पित्तनाशक,