क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ क्षेमकुतूहलम्
अथ पुटपाकः
सूक्ष्मंयत्कुट्टितं मांसं संभृतं वेसवारकैः॥ १५५॥
छत्रं पत्रैर्मृदा सर्वं वेष्टितं वर्तुलाकृति।
पचेत्प्रज्वलिते गर्ते कणिक्यान्तितवेष्टितम्॥ १५६॥
पचेदेवं बीजपूरनारङ्गदलवेष्ट्यपि।
पुटपाक
मांस के सूक्ष्म खण्ड-कुट्टित वेसवार के साथ पीसकर-पक्ववृत्त, मृत्तिका से
वर्तुलाकृति में वेष्टित (बटलोही के आकार का गोला) तथा प्रज्वलित गर्त में रखकर,
ऊपर से अग्नि (किरीषआदि से) प्रदान करते हैं- पाकार्थ। इसको बीजपूर तथा नारिकेल
पत्रों से भी अविष्टित (ढकने) करने की विधि हैं, जिससे मांस पाक सम्यक् रूप से
सिद्ध हो जाये॥१५५-१५६¹/₂॥
अथ फलपुटपाकः
पिष्टं साम्लमनाम्लं वा संभृतं कोरिते फले॥ १५७॥
पूर्ववत्पुटितं वह्नौ विपचेत्फलसंज्ञकम्।
पुटपाकेन यन्मांसं पाचितं पाचकं हि तत्॥ १५८॥
सोष्मं तद्गुणवज्ज्ञेयं शीतं शुष्कं तु दुर्जरम्।
फलपुटपाक
क. विधि- मांस पिष्ट को, अम्ल सहित या रहित- चीरकर (फल के मध्य में
अवस्थित कर), पूर्ववत् पुटपाक विधि का अनुसरण करते हैं- यह 'फलपुटपाक'
की क्रिया है (पूर्ववत्)।
ख. गुण- पुटपाक का उष्मा सहित (गर्भ) सेवन करने से गुणवान सिद्ध होता है;
शीतल एवं शुष्क पुटपाक दुर्जर (देर से पचने वाला) मांस व पाक हो जाता
है॥१५७-१५८¹/₂॥
अथ राजिकमांसम्
मांसस्य पिष्टिका कृत्वा वेसवारेण योजिताम्॥ १५९॥
बहुधा क्रियते तस्या वटिकावटकादिकम्।
आम्रचिञ्चीफलाकारं लड्डुकावटकादिकम्॥ १६०॥
षष्ठोत्सवः ९५
शृङ्गाटकफलाकारं यथाबुद्धिप्रकारजम्।
कृत्वाऽपि बहुधाकारं स्वेदितंघृतभर्जितम्॥ १६१॥
वेसवायुते तक्रे क्वथिते च मनोरमे।
निक्षिप्य चालयेद्दुत्तार्थैलादिवासिते॥ १६२॥
एवं तु बहुधा कार्यो मांसमुद्गप्रलेहकः।
प्रलेहो वातजिद्बल्यस्तक्रमांसभवो रसः॥ १६३॥
प्रीणनो व्रणयुक्तानां शुक्रदः क्षीणरेतसाम्।
राजिक मांस
क. विधि- वेसवार मिश्रित मांस पिष्ट से विभिन्न प्रकार के वटक, वटिका, आम्र-
चिंचा फलाकार, लड्डू आकार, शृंगारकाकार तथा स्वेच्छानुसार वटक बनाकर,
स्वेदित करते हैं, फिर घृत में भृष्ट- वेसवार युक्त, तक्र में डालकर, एला से
सुगन्धित काढ़ी (क्वचित) में डाल देते हैं, फिर दवींचालन ((अग्नि से
हटाकर)। इस रीति से मांस तथा मुद्ग के विभिन्न प्रकार के प्रलेह-पुटपाक निर्मित
हो सकते हैं।
ख. गुण- प्रलेह वातनाशक तथा बल्य। तक्र एवं मांस निर्मित रस (शोरकातरी)
व्रणी तथा क्षीण वीर्य पुरुषों के लिए लाभकर है॥१५९-१६३¹/₂॥
अथ मांसेण्डरी
पिष्टे मांसेण्डरीं स्विन्नां मासूरे पर्णवेष्टिताम्॥ १६४॥
मरिचैः स्नेहलवणैः संस्कुर्याद् धूपयेत्ततः।
मांसस्येण्डरिका प्रोक्ता गुर्वी वृष्याऽनिलापहा॥ १६५॥
विशेषोऽत्र गुणानां यः स ज्ञेयो मांसभेदतः।
मांसेण्डरी
क. विधि- मसूर पिष्ट में मांस पूरण कर, 'मांसेण्डरी' निर्माण करते हैं, जिसको
पत्रावेष्ट कर स्विन्न करते हैं, फिर मरिच चूर्ण, स्नेह तथा लवण मिश्रित कर
पक्व (सिद्ध) करते हैं; तदनन्तर सुगन्धित धूपाचित कर लेते हैं- इस 'मांसेण्डरी'
नाम देते हैं।
ख. गुण- गुरु (विष्टम्भ), कृष्य तथा वातनाशक। विशेष गुण 'मांसेण्डरी' में प्रयुक्त
मांस द्रव्यानुसार होता है॥१६४-१६५¹/₂॥