क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ क्षेमकुतूहलम्
भक्त के गुण- १. अग्निदीपक, २. पथ्य, ३. तृप्तिकर, ४. मूत्रवर्धक,
५. लघु, ६. सुधौत श्रावित पथ्य, ७. विशद, ८. गुणवान् । जिस धान्य का भक्त
(भात) बनाया जाता है, उसके गुण उसी प्रकार के होते हैं। यहाँ भात (भक्त) पाक का
प्रकार तथा उसका उत्तम गुण बताया गया है॥२२-२३॥
अथ सूपः
तां कण्डितां दधिविमर्दितमुद्गदालिं
संसाधितां लवणगन्धसमायुता च।
ते भुजते कुमुदहासकराधमूर्धा
येषां सदा हृदयाचारुगृहं निष्षण्णः ॥ २४ ॥
सूप (दालि-दाल)
कण्डिता, सुपक्व, लवण तथा सुगन्धित वेसवर, दधि से विमर्दित मुद्ग की दाल
का वह ही भोजन करते हैं, जिनके हृदयरूपी सुन्दर गृह में विकसित कुमुद की भाँति
अर्धचन्द्र को शिरोधार्य किए भगवान शंकर (शिव) निवास करते हैं॥२४॥
अथ मुद्गकुलमाषाः
अर्ध विकसितं स्विन्नाः कुल्माषा मुद्गमाषजाः ।
सैन्धवेन सबाह्लीकाःस्वात्रस्य तु गुणावहाः ॥ २५ ॥
मुद्गसूपो लघुर्ग्राही कफपित्तहरो हिमः ।
स्वादुर्नेत्र्योऽनिलहरः कुल्माषः शुक्रवर्धनः ॥ २६ ॥
मुद्ग-कुल्माष
मुद्ग (मूँग) तथा माष (उरद) आधाखिला हुआ परिपक्व कुल्माषा- की दाल,
सेंन्धा एवं केशर युक्त खाद्य पदार्थ से अन्न के गुणों में वृद्धि होती है।
क. मुद्ग (मूँग) की दाल लघु ग्राही, कफपित्तनाशक तथा शीतल होती है।
ख. माष (उरद) की दाल स्वादु, यक्षुष्य, वातनाशक तथा कफवर्धक होती है॥२५-२६॥
अथ माषः
माषसूपोऽथ कुल्माषः स्निग्धो वृष्योऽनिलापहः ।
उष्णः संतर्पणो बल्यः सुस्वादूरुचिकारकः ॥ २७॥
षष्ठोत्सवः ६९
माषसूप-कुल्माष
माषसूप (उरद की दाल) तक्षा कुल्माष की दाल स्निग्ध, वीर्यवर्धक, वातनाशक,
उष्ण, तृप्तिकर बल्य, स्वादु एवं रुचिकारक होती है॥२७॥
अथ घृतम्
करीषवह्निना तप्तं क्षीरं तदुषितं दधि।
तज्जमाज्यं न तत्त्वाजं नवीननवनीतजम् ॥ २८ ॥
घृत (सर्पि)
करीषाग्नि (उपलों की आग) के पकाये हुए दुग्ध से निर्मित दधि का घृत का
नवीन नवनीत (मक्खन) से निष्कासित आज घृत (बकरी के घी) के समान गुणवान
नहीं कहा जा सकता॥२८॥
मञ्जिष्ठावारिरुचिसारि तनूष्मधारि
सौरभ्यचारि रुचिकारि विलोमहारि।
भुङ्क्ते नरः स खलु सर्पिरिदं नवीनं
यः पार्वतीचरणमौलिमिलोलमौलिः ॥ २९ ॥
विशिष्ट घृत
मंजिष्ठा जल (वारि) के समान आकृति युक्त तन्द्र (पतला), सुगन्धित, रुचि-
कर तथा विलोमवातनाशक, इस नवीन घृत को वही व्यक्ति सेवन करता है, जो
देवी पार्वती के चरणों को (कमलों) को स्वहृदय में अपने शिर पर धारण करता
है॥२९॥
अथ सामान्यं घृतम्
घृतं रसायनं स्वादु पित्तानिलविषापहम् ।
आयुष्यं बृंहणं शीतं पापालक्ष्मीविनाशकम् ॥ ३० ॥
सामान्य घृत
१. रसायन, २. स्वादु, ३. पित्त वात हर, ४. विषघा, ५. आयुष्य, ६. बल्य,
७. शीतल, ८. पाप-दरिद्रा विनाशक।
ये घृत के सामान्य गुण-प्रभाव होते हैं॥३०॥