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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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७४ क्षेमकुतूहलम्
महत्तदेव विष्टम्भिर् रूक्षं दोषत्रयप्रदम्।
स्निग्धसिद्धं तदेव स्यद्गोषत्रयविनाशनम्॥५२॥
तत्पुष्पं श्लेष्मपित्तघ्नं फलं वातकफापहम्॥५३॥
वात मूलक (छोटी मूली) शाक के गुण- १. वातनिःसारक, २. रोचक,
३. उष्णवीर्य, ४. पाचक, ५. लघु, ६. त्रिदोष हर (रोगनाशक द्रव्यों के संयोग से),
७. श्वासवृद्धि, ८. पानसनाशक है।
मूलक (बड़ी मूली) आनाहकारक- १. रूक्ष, २. त्रिदोषवर्धक। घृत तलित
मूलक (मूली) त्रिदोषहर। मूलक पुष्प कफपित्तहर तथा फल (फली) वातकफ नाशक
होते हैं॥५१-५३॥
अथार्द्रकम्
भोजनाऽग्रेसदा पथ्यं जिह्वाकण्ठविशोधनम्।
अग्निसंजननं श्रेष्ठअठं लवणाऽर्द्रकभक्षणम्॥५४॥
आर्द्रक (अदरक)
भोजन के पूर्व (आहार भक्षण प्रारम्भ करने के पहले) आर्द्रक (अदरक) खण्ड
(टुकड़ों) को लवण (नमक) मिलाकर खाना सर्वद (सदैव) पथ्य, हितकर तथा
लाभदायक है (भोजनाग्रे सदा पथ्यं निवर्णर्द्रक भक्षणम्- अन्य ग्रन्थ/ संहिता)। यह
जिह्वा तथा कण्ठ का विशोधन कारक है तथा जठराग्नि का श्रेष्ठ रूप से (भलीप्रकार)
प्रदीपन करता है॥५४॥
मृत्त्वचारहितमङ्कुरवच्च क्षालितं सुविमलैर्बहुतोयैः।
मिश्रितं लवणाम्निम्बुपयोभिर्बालमार्द्रकमुमापतियोग्यम्॥५५॥
मृदा एवं वल्क रहित, अंकुर सहित आर्द्रक कन्द-स्वच्छ जल से धौत-सुविमल
कन्द, निम्बू स्वरस मिश्रित लघु खण्ड (आर्द्रक) भगवान् शंकर के सेवन योग्य है; यह
यह स्वादिष्ट तथा सर्वजन प्रिय होती हैं॥५५॥
तैलासूरीरजनिसिन्धुजपङ्कषद्भि-
प्रस्यन्दमाननवनिम्जुरसप्रसिक्तम्।
स्वादूत्तरं शिशिरवासरभोजनेषु
कस्येति वर्णनपथं खलु शृङ्गवेरम्॥५७॥


षष्ठोत्सवः ७५
तैल, राजिका, हरिद्रा तथा सैंधव को निम्बूक स्वरस में आर्द्रक मिश्रित कर;
स्वाद मुक्त शिशिर ऋतु में भोजन के साथ प्रार्थना का किसका विषय नही है। अर्थात्
सेवन योग्य है॥५७॥
एके वदन्त्यमृतमस्ति पुरेसुरणामन्येऽपि चारुवनिताधरपल्लवेषु।
ब्रूमो वयं सकलवैद्यमतानुसारं जम्बीरनीरपरिपूरितशृङ्गवेरे॥५८॥
अमृत रस स्वादी कहते हैं कि देवताओं के नगर (स्वर्ग) में अमृत है, तथा सुन्दर
स्त्री के अधर पल्लव में अमृत का वास बताया गया है (कुछ व्यक्तियों द्वारा)। परन्तु
समस्त वैद्यों का मत है कि जम्बीर (निम्बूक) स्वरस में परिपूरित (लुप्त) शृंगवेर
(अदरक) के अमृत से भी उत्तम होता है॥५८॥
वव्योष्णं दीपनं हृद्यं सस्नेहं लघु पाचनम्।
रोचनं प्रीणनं बल्यमार्द्रकं परिकीर्तितम्॥५९॥
आर्द्रक वृष्य, दीपन, हृद्य, स्निग्ध, लघु, पाचक, रुचिकर, प्रीणन (प्रसन्नतादायक)
तथा बल्य होता है॥५९॥
अथ हरीसाः
कृत्तं निरस्थि संपक्त्रमाज्ये स्वोपस्करान्वितम्।
मांसं गोधूमसंयुक्तं हरीसेत्याह सूदकः॥६०॥
हरीसा (आसा)
अस्थि रहित मांस खण्ड, उपस्कार (वेशवार) से युक्त, गोधूम के साथ घृत में
पकाकर, व्यंजन को पाचक (सूदक) गण हरीसा की संज्ञा देते हैं॥६०॥
बल्या समधुरा गुर्वी शीतोष्णाऽनिलपित्तहा।
स्निग्धा शुक्रप्रदा हृद्या सरा सन्धानकारिणी॥६१॥
हरीसा के गुण- बल्य, मधुर, गुरु, शीतोष्ण, वातपित्तनाशक, स्निग्ध, वीर्यवर्धक,
हृद्य, सर तथा सन्धानकारिणी॥६१॥
अथ मांस्रन्थनविधिः
ग्राम्यस्यानूपजस्यापि जाङ्गलस्याण्डजस्य च।
बिलौकसश्च मांसानां रन्थनस्योच्यते विधिः॥६२॥