क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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मृग
क. मृग मातृ (मृग की माता) अर्थात् हरिणी के मांस के छोटे टुकड़े (शतखण्डी)
कोमल (मुलायम) को, घृत में भृष्ट (भून) कर, दधि-सैन्धव-हिंगु-मरिच चूर्ण
मिश्रित करके, पाक करते हैं।
ख. यह शीघ्र अरुचि (अरुचि शीघ्रप्रपोहति शृतम्) नाशक है। यह शीतलता, रक्तपित्त
हर, सन्निपात ज्वर एवं श्वासुरोग नाशक तथा मधुर विपाकी है॥९३-९४॥
अथ मृगमांसम्
मांसं मार्ग बहुशकलितं स्विन्नमीषच्च तोये
तप्ते स्नेहे जरणसहिते पाचितं शब्दमुच्चैः।
सार्द्रं सान्द्रं लवणसहितं दाडिमेनातिचुक्रं
खादन् वादन् कलयति शिरश्चन्द्रचूड़ोऽपि नूनम्॥ ९५॥
एणमांसं ग्राहि रुच्यं दोषत्रयापहम्।
षड्रसं बलदं पथ्यं लगग हृद्यं ज्वरापहम्॥ ९६॥
मृग
क. मृग (हिरण) के मांस के छोटे टुकड़ों से अरूप जल में उबालकर (स्विन्न) करते
हैं, फिर श्वेताजीरक के साथ साथ उष्ण (तप्त) तैल या घृत में पकाते हैं
(तीव्राग्नि), तथा सैन्धव एवं दाडिम (अनार) रस मिश्रित कर, मांस पाक
(सिद्ध) करते हैं। यह सान्द्र-आर्द्र मृग मांस खाते हुए, डमरु (कलमारी
शिराचन्द्र चूड़ोऽपि नूनम्) बजाते ही, भगवान शंकर भी अपना शिर में कम्पन
(हिलाते) हैं- जो मृग मांस की अति प्रशंसा का द्योतक है।
ख. एणमांस के गुण- शीतल ग्रही, रुचिकर, त्रिदोषहर, षट्रसी (छह रसों वाला),
बल्य, पथ्य, लघु, हृद्य एवं ज्वरघ्न हैं॥९५-९६॥
मांसं छिक्कारजं कृत्तमाज्ये तप्ते सुभृष्टकम्।
दधिसैन्धवहिङ्ग्वाढ्यं सुधूलेनावधूलितम्॥ ९७॥
छिक्कारं मधुरं स्वादु कफपित्तानिलापहम्।
विपाकं कटुकं प्रोक्तं विशेषेणाग्निवर्धनम्॥ ९८॥
षष्ठोत्सवः ८३
छिक्कार (मृगाल)
क. छिक्कार (मृगाल) को मांस के छोटे खण्ड (टुकड़ों) को उष्ण घृत में सुभृष्ट
(भूनकर) कर, दधि-सैन्धव-हिंगु का चूर्ण (सुधूलन) मिश्रित करते हैं।
ख. मृगाल मांस के गुण- मधुर, स्वादु, वात-पित्त एवं कफपित्तनाशक, कटुविपाकी
तथा विशेषता अग्निदीपन है॥९७-९८॥
अथ शशकस्य मांसम्
निरस्थिकृत्तं शलमेव शाशं सहिङ्गुनाऽऽज्येन कृतं सुपाकम्।
ससैन्धवं धूलनदत्तवासं करोति कोष्ठान्नमतिप्रकाशम्॥ ९९॥
शशः शीतो लघुः स्वादुग्राही पथ्योऽग्निदीपनः।
सन्निपातज्वरश्वासरक्तपित्तकफापहः ॥१००॥
शशक
क. शशक-शश (खरगोश) के मांस के टुकड़े (अस्थि रहित), हिंगुभृष्ट कर, घृत
में सुपक्व करते हैं, फिर उसमें सैंधवयुक्त मसाले का चूर्ण (उद्धूलन) मिश्रित
कर देते हैं; सुगन्धित स्वरूप का पक्व मांस।
ख. शशक मांस के गुण- शीतल, लघु (शीघ्रपाकी), स्वादु, ग्राही, पथ्य, अग्निदीपन,
सन्निपात ज्वर-श्वासवृद्धि रक्तपित्त कफ नाशक॥९९-१००॥
अथ पाठीमांसम्
पाठीमांसं बहुतरघृते स्वल्पवह्नौ विपक्वं
त्रैकं चूर्णं लवणसहितं शृङ्गबेरप्रभूतम्।
मध्ये तस्मिन् क्षिपति सुतरां कर्कशे हिङ्गु नाऽऽढ्यं
तेन घ्रातं नयति सुतरामाश्रयां संप्रकाशम्॥ १०१॥
पाठी
पाठी का मांस अधिक घृत में मन्दाग्नि से पाक करके, त्रिकटु (त्रैका चूर्ण,
सैंधव, आर्द्रक (अधिक मात्रा में) मिलाते हैं, तथा मांस के अर्धपक्व होने पर हिंगु
(पर्याप्त) डालते हैं।
इस पाठी मांस को सूंघने मात्र से (तेन घ्रातं नयति), उसके निकटतम व्यक्तियो
को अधिक प्रकाश या बल प्राप्त होता है (सुतरामाश्रयां संप्रकाशम्)॥१०१॥